~ पुष्पा गुप्ता
अगर पूर्वोत्तर में सबकुछ सही चल रहा था, तो संघ को अपनी ही सोने की लंका में आग लगाने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? राजकुमार बीर टीकेंद्रजीत और जनरल थंगल वहां के सबसे सम्मानित फ्रीडम फाइटर माने जाते हैं। 13 अगस्त 2019 को 128 वें पेट्रियट दिवस के दिन दोनों महापुरूषों की तस्वीरों के बीच संघ ने भारत माता की तस्वीर लगवा दी थी, जिसे मणिपुर की ज्वाइंट स्टूडेट कोऑर्डिनेशन कमेटी ने काफी बुरा माना था, और मांग की थी कि आरएसके नेता सार्वजनिक रूप से माफी मांगें, वरना उन्हें हम प्रतिबंधित कर पूरे राज्य में उनका कोई कार्यक्रम नहीं चलने देंगे।
मणिपुर का छात्र विंग अबतक राष्ट्रवाद और भारत माता को स्वीकार नहीं कर पा रहा है, यह केंद्र, विशेषकर संघ की भृकुटियां चढ़ा देने के वास्ते काफी था। विगत चार वर्षों में मणिपुर का समाज वैसे ही बंट गया, जैसे दक्षिण-पूर्वी यूरोप का बाल्कन बंटा है।
क्या आप गुवाहाटी को पूर्वोत्तर का द्वार मानेंगे, जिसके बरास्ते ईसाईयत और हिन्दुत्व की इंट्री हुई? 13वीं सदी तक उत्तर-पूर्व भारत यूरोप के लिए अनजान सा था। सिउ काफा असम के पहले अहोम राजा थे, जिनका कालखंड था 1228 से 1268। उन्हीं के वंशज गौरीनाथ सिंह ने 1792 में ब्रिटिश शासकों से अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए मदद मांगी। कैप्टन वेल्श अहोम शासकों की मदद के लिए पहली बार असम आये। दोस्त बनकर आये, दगाबाज़ी करने लगे।
अंग्रेज़ शासकों ने 1824 से 1826 तक एंगलो-बर्मा युद्ध में अपना दबदबा दिखाया। यांदाबो संधि की, और बर्मा के एकाधिकार से पूर्वोत्तर को मुक्त कराया। उसके प्रकारांतर 1826 में असम, 1832 में कछार, नगा हिल्स 1877 में, लुशाई हिल्स 1892 में, इस्टर्न फ्रंटियर समेत बचे-खुचे इलाका़ें को 1898 आते-आते अपने प्रभाव क्षेत्र में लिया। अंग्रेज आये, साथ में ईसायत भी लाये। चर्च का प्रभाव पूर्वोत्तर की जनता पर पड़ना प्रारम्भ हुआ।
जो ईसाई मिशनरी शुरूआती दिनों में पूर्वोत्तर आये, उनमें रोमन कैथलिक का उल्लेख मिलता है, जो सबसे पहले असम में 1829 में आये। उन दिनों गुवाहाटी के कमिश्नर डेविड स्कॉट ने सीरमपुर मिशन को अपना काम करने की अनुमति दी।
दिलचस्प यह है कि असम में पांव रखने के कुछ वर्ष पहले 1819 में न्यू टेस्टमेंट का असमी अनुवाद आरंभ हुआ। 1833 में असमी भाषा में एक संपूर्ण बाइबल मुकम्मल हो चुका था। उससे पहले 1824 में खासी-जंतिया लोगों के लिए बंगाली में भी बाइबल प्रकाशित हुआ। मतलब, ईसाई मिशनरियों ने पूरी तैयारी के साथ पूर्वोत्तर भारत में क़दम रखा था।
1835 में ब्रिटिश कमिश्नर फ्रांसिस जेनकिंस ने बर्मा में कार्यरत अमेरिकन बैपटिस्ट यूनियन को आमंत्रित किया। 1850 आते-आते अमेरिकन बैपटिस्ट यूनियन के प्रचारक कार्बी बहुल इलाकों में सक्रिय हो गये। कालांतर में बैपटिस्ट, प्रेसबाइटेरियन, लुथेरन, आंगेलिकन चर्च के लोग पूर्वोत्तर आते गये। कैथलिक धर्मगुरूओं का कंट्रोल टावर था तिब्बत।
1889 में ल्हासा स्थित ‘वेकारिएट अपोस्टिक‘ से जुड़े मिशनरी के लोगों ने असम, भूटान और मणिपुर में ईसाईयत के विस्तार के लिए ‘प्रिफेक्चर अपोस्टिक‘ जैसी संस्था का गठन किया। पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में से मिज़ोरम, नगालैंड और मेधालय को लोग ईसाई बहुल मानते हैं। इनके धर्मगुरूओं को इंगलैंड, वेल्स, जर्मनी, इटली, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड ने भरपूर आर्थिक मदद दी, परिणामस्वरूप पूर्वोत्तर की ईसाई बहुल आबादी 16.5 प्रतिशत हो चुकी थी। इन आठ राज्यों 220 से अधिक जातीय समूह दीखते हैं।
उत्तर में नगालैंड, दक्षिण में मिजोरम, पश्चिम में असम और पूरब में म्यांमार सीमा तक 8 हज़ार 628 वर्गमील में फैला मणिपुर 15 अक्टूबर 1949 में भारतीय संघ में विलय से पहले प्रिंसली स्टेट हुआ करता था।
ईसाईयत की ज़मीन ज़रखे़ज़ होने की वजह से मणिपुर कभी ‘क्रिश्चिएन पॉपुलेटेड स्टेट‘ माना जाने लगा था, लेकिन विगत दस वर्षों में जनसांख्यिकी बदलाव के परिणामस्वरूप अब वह हिंदू बहुल आबादी से पीछे चलने लगा है।
“इंडिया सेंसस डॉट नेट” की रिपोर्ट को मानें, तो मणिपुर में हिंदू आबादी 41.39 प्रतिशत है, और ईसाइयों की जनसंख्या घटकर 41.29 पर आ चुकी है। मैतेई, नगा, कुकी, मैतेई-पंगल, थादोउ, थांकुल, कागोई, पोमाई, इंपुई, रोंगमेई जैसे अलग-अलग जातीय समूहों को सही से देखा जाए, तो इनमें सर्वाधिक इंडो-बर्मी मूल के हैं।
दरअसल, समूचा उत्तर-पूर्व विभिन्न कबीलों में बंटा समाज है। माहौल ऐसा बन गया कि मणिपुर में एक कबीला, अपने से असहमत दूसरे कबीले के ख़ून का प्यासा दीखता है। मणिपुर की 53 प्रतिशत आबादी मैतेई है, जिनके पूर्वज म्यांमार और आसपास से आने के बावज़ूद यहां का मूल निवासी होने का दावा करते हैं। इनका बड़ा हिस्सा हिंदू धर्म के प्रति आस्थावान है, जो बाद में बीजेपी की राजनीति के लिए ऊर्जावान साबित हुआ।
लगभग 16 प्रतिशत मैतेई पारंपरिक सनमाही धर्म का पालन करते हैं। इनमें 8 फीसद वो लोग भी हैं, जो इस्लाम धर्म को मानते हैं। 1.6 प्रतिशत मैतेई ईसाई भी हैं।
मणिपुर की कुल आबादी के 16.2 प्रतिशत कुकी हैं। सिक्किम और अरूणाचल को छोड़कर कुकी आबादी की उपस्थिति मेधालय, नगालैंड, त्रिपुरा, मिज़ोरम और असम में भी है। इस वजह से बहुसंख्यक मैतेई मणिपुर में यदि कुकी को दबाते हैं, पड़ोस के इलाकों में बसे मैतेई समुदाय से स्कोर सेटल करना शुरू हो जाता है।
म्यांमार और मिज़ो हिल से आये कूकी का अधिकेंद्र चूड़ाचंद्रपुर रहा है। मणिपुर के चंदेल, कांगपोकपी, तेंगनोपल और सेनापति ज़िलों में कूकी आबादी बहुमत में हैं। मैतेई की तरह कूकी भी मार्शल रेस में शुमार होते हैं। 1993 में नगा अतिवादी समूह एनएससीएन‘ इसाक-मुइवा, और कूकी नेशनल आर्मी के बीच 16 माह तक चले संघर्ष में 400 लोग मारे गये, 200 घायल हुए थे।
1200 घरों को जला दिया गया, तब एक लाख से अधिक लोगों को विस्थापित होना पड़ा, जिसमें कूकी की संख्या अधिक थी।
उस दौर में कांग्रेस के राजकुमार दोरेंद्र सिंह मणिपुर के मुख्यमंत्री थे। लगातार हो रही हिंसा रोक पाने में जब वो नाकाम साबित हुए, केंद्र के कहने पर 10 अप्रैल 1993 को दोरेंद्र सिंह को इस्तीफा देना पड़ा, बाद में मणिपुर में दोबारा से राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। 30 साल बाद नरसंहार की वही कहानी नगा के साथ नहीं, मैतेई के साथ दोहराई जा रही है।
इसमें चर्च से अधिक डबल इंजन की सरकार और संघ की भूमिका होने से इंकार नहीं कर सकते।
तीस साल बाद की कहानी में फर्क़ यही है कि देश का प्रधानमंत्री चुप है, यूरोपीय संघ में निंदा प्रस्ताव पास हो चुका है, सड़क से संसद तक गर्माया हुआ है, लेकिन न तो मुख्यमंत्री पद से एन. बीरेन सिंह इस्तीफ़ा दे रहे हैं, न ही वहां राष्ट्रपति शासन लागू हो रहा है। तीन दशकों में राजनीति की खाल इतनी मोटी हो चुकी है।
मणिपुर जैसे सूबे में आबादी का धार्मिक कायांतरण स्वतःस्फूर्त नहीं हुआ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सुविचारित योजना के साथ पूर्वोत्तर में अपना विस्तार किया है। संघ ने बहुसंख्यक हिंदू आबादी को भरोसे में लेकर राष्ट्रवाद, संप्रदायवाद को हथियार बनाया।
बहुसंख्यक मैतेई रासलीला, जन्माष्टमी, होली, हराओबा, चेइराओबा, याओसांग, जगन्नाथ रथ यात्रा, होली, दिवाली, रामनवमी पूरे उत्साह से मनाते हैं। मैतेई की तरह कुकी की जड़ें म्यांमार में हैं।
मंगोल मूल के कूकी आदिवासियों का बड़ा हिस्सा ईसाई मतावलंबी है। मैतेई ज़्यादातर इंफाल घाटी में रहते हैं, जबकि कुकी आस-पास की मिजो पहाड़ियों और उससे आगे दक्षिणी असम के हिस्से में रहते हैं। चर्च की शह पर बोड़ो, नगा, कूकी, चिन, मैतेई नेता और उनके अलगाववादी समूह अरसे से अलग होमलैंड की मांग करते रहे।
असम की राजधानी गुवाहाटी को तो मानकर चलें कि उत्तर-पूर्व में यह धार्मिक राजनीति का प्रवेशद्वार है। 77 साल पहले 27 अक्टूबर 1946 को संघ के प्रचारक दादाराव परमार्थ, वसंतराव ओक और कृष्णा परांजपे गुवाहाटी आये। कुछ दिन इस इलाक़े में संपर्क विकसित करने के बाद, गुवाहाटी के साथ-साथ शिलांग और डिबू्रगढ़ में शाखा लगाना आरंभ किया। संघ को सबसे अधिक मज़बूत ज़मीन त्रिपुरा में दिखी, जहां 83 फीसद हिंदू आबादी थी।
1952 में ‘उदबस्तु सहायता समिति‘ के ज़रिये संघ ने अपने विचारों का बीजारोपण प्रारंभ किया। फिर 1956 से त्रिपुरा में शाखा लगना शुरू हुआ।
त्रिपुरा में 83.40 प्रतिशत सनातन घर्म को मानने वाले, और 1978 से 1988 तथा 1993 से 2018 तक कुल जमा 35 साल लेफ्ट फ्रंट ने शासन किया। फिर भी संघ को कम्युनिस्टों से सत्ता छीनने में 66 साल लगे।
त्रिपुरा में आज की तारीख़ में डेढ़ सौ से अधिक शाखा लगते हैं, 60 मिलन और उतने ही मंडली का आयोजन होता है। संघ से संबद्ध स्कूल ‘संस्कार केंद्र‘ की 250 से अधिक नेटवर्क पूरे त्रिपुरा में है। विद्या भारती के 11 और 60 एकल विद्यालय त्रिपुरा में चल रहे हैं। त्रिपुरा के 500 गांवों में लाखों प्रचारक संघ ने खड़े कर रखे हैं। विहिप ने 1984 से त्रिपुरा में अपने पांव जमा लिये थे।
80 और 90 के दशक में संघ ने आदिवासी बहुल राज्यों अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मेघालय और मिज़ोरम में वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से कई कल्याणकारी कार्यक्रम स्थापित किए। संघ का फोकस शिक्षा के क्षेत्र में जड़ें जमाना रहा है, जहां उन्हें ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों का प्रभामंडल निस्तेज करना था। 1990 के मध्य तक वनवासी कल्याण आश्रम और एकलव्य विद्यालय का विस्तार हो चुका था। इसके बरक्स केंद्र में कांग्रेस लीडरशिप सोती रही।
संघ ने असम और त्रिपुरा के बाद अपनी रणनीति का अधिकेंद्र नगालैंड और मणिपुर को ही बना रखा था। तीन दशकों में संघ की 15 अनुषंगी इकाइयों जिनमें सेवाश्रम, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, किसान संघ, एबीवीपी, विद्या भारती, फ्रेंड्स ऑफ ट्राइबल सोसाइटी या वन बंधु परिषद, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय जन सेवा संस्थान, भारत कल्याण प्रतिष्ठान, बाल संस्कार केंद्र, और राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ प्रमुख हैं।अकेले मणिपुर में लगभग 3000 एकल विद्यालय, 120 से अधिक शाखाएँ और मंडलियाँ हैं।





