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वंदे मातरम पर विवाद की वजह क्या…इसमें ऐसा क्या जो धार्मिक मुद्दा बन जाता है?

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 देश का राष्ट्रगीत वंदे मातरम चर्चा में है. चर्चा की दो वजह हैं. पहली, पीएम मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि वंदेमातरम के एक हिस्से को धार्मिक आधार पर हटा दिया. दूसरी, महाराष्ट्र में वंदे मातरम को स्कूल में गाने के आदेश का समाजवादी पार्टी के नेता अबू आजमी ने विरोध किया है. जानिए, वंदे मातरम पर विवाद की वजह क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की 150वीं जयंती पर कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि उसे गुलाम मानसिकता अंग्रेजों से मिली है. बंगाल विभाजन के समय वंदे मातरम देश की एकजुटता की आवाज बना तो अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की पर असफल रहे. पर जिस काम में अंग्रेज सफल नहीं हुए, उसे कांग्रेस ने कर दिखाया और वंदेमातरम के एक हिस्से को धार्मिक आधार पर हटा दिया. इसी बीच महाराष्ट्र में वंदेमातरम का मुद्दा उठ खड़ा हुआ है और इस पर विवाद शुरू हो गया है.

आइए जान लेते हैं कि वंदेमातरम पर विवाद कब-कब उठा और कांग्रेस ने इसका एक हिस्सा क्यों हटाया था? आखिर इसमें ऐसा क्या है जो यह धार्मिक मुद्दा बन जाता है?
किसने रचा वंदे मातरम?
वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने की थी. उन्होंने अपने संस्कृतनिष्ठ बांग्ला उपन्यास आनंदमठ में यह पूरा गीत लिखा है और बेहद इतनी कम पंक्तियों में पूरी मातृभूमि और इसकी महानता का वर्णन किया है. साल 1870 में इसकी रचना हुई और साल 1882 में यह प्रकाशित हुआ. साल 1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे गाया था. हालांकि, उसी दौर से इसका विरोध भी शुरू हो गया था. मुस्लिम नेताओं ने कहा कि इस गीत में देवी का वर्णन किया गया है. यह एक तरह से मूर्तिपूजा है और इस्लाम में यह मंजूर नहीं है.

आजादी से पहले ही उठा था विवाद
वंदे मातरम आजादी के आंदोलन के दौरान शुरू में तो केवल बंगाल में गाया जाता था पर धीरे-धीरे यह गीत पूरे देश में लोकप्रिय हो गया और कांग्रेस के अधिवेशनों का तो अनिवार्य हिस्सा बन गया था. खुद मोहम्मद अली जिन्ना शुरू में इस गीत को पसंद करते थे. बाद में कुछ मुसलमानों को इस पर आपत्ति होने लगी, क्योंकि इस गीत में देश को देवी दुर्गा के रूप में देखा गया है. उन्हें रिपुदलवारिणी यानी दुश्मनों का संहार करने वाला कहा गया है.

इस रिपुदलवारिणी शब्द को लेकर काफी विवाद हुआ था. मुसलमानों को लगा कि इसमें रिपु यानी दुश्मन शब्द का इस्तेमाल उनके लिए किया गया है, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि उस समय अंग्रेजों को रिपु यानी दुश्मन माना गया होगा. हालांकि मुसलमानों का विरोध बढ़ने लगा तो आपत्तियों की पड़ताल के लिए साल 1937 में कांग्रेस ने एक समिति बनाई थी. उसमें गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और पंडित जवाहरलाल नेहरू शामिल थे.

कांग्रेस ने गाने पर लगाई पाबंदी
बाद में अफवाह उड़ी कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को लेकर आपस में चर्चा की और गुरुदेव की सहमति से इस गीत के अंश हटाए गए हैं. इस गीत के पहले दो चरण ही स्वीकृत किए गए, जिनको समावेशी और धर्मनिरपेक्ष माना गया. दरअसल, समिति का मानना था कि इस गीत के शुरुआती दो पद मातृभूमि की प्रशंसा में हैं. बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का जिक्र है. इसलिए फैसला लिया गया कि वंदे मातरम के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में इस्तेमाल किया जाए. इस पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की लोगों ने आलोचना की तो उन्होंने 2 नवंबर 1937 को एक पत्र लिखा कि कांग्रेस के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में यह गीत खुद मैंने गाया था.

हालांकि, आंशिक रूप से इस गीत के अंश हटाए जाने पर मुस्लिम लीग से जुड़े नेता संतुष्ट नहीं हुए. खुद मोहम्मद अली जिन्ना ने 17 मार्च 1938 को पंडित नेहरू से मांग की कि वंदे मातरम को पूरी तरह से त्याग दिया जाए. यही मांग उन्होंने मुंबई में महात्मा गांधी से भी की. हालांकि महात्मा गांधी ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया. हरिजन पत्रिका में उन्होंने जरूर लिखा कि हिंदू और मुसलमान जहां एकत्रित होंगे, वहां वंदे मातरम को लेकर मैं कोई बवाल बर्दाश्त नहीं करूंगा. हालांकि, साल 1940 में कांग्रेस की नियमावली में वंदे मातरम को गाने पर पाबंदी लगा दी गई.

आजादी के बाद बना राष्ट्रीय गीत
तमाम विवाद के बावजूद देश की आजादी के बाद साल 1950 में इस राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया. 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने का वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया.


सपा विधायक अबू आजमी ने महाराष्ट्र सरकार के फैसले का विरोध किया है.

महाराष्ट्र में खड़ा हुआ ताजा विवाद
इन सबके बावजूद समय-समय पर वंदे मातरम को लेकर विवाद खड़ा होता रहता है. ताजा उदाहरण महाराष्ट्र का है. दरअसल, 31 अक्तूबर (2025) को वंदे मातरम गीत के 150 साल पूरे हो गए हैं. इस पर देवेंद्र फडणवीस की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार ने आदेश जारी किया है कि राज्य के सभी स्कूलों में 31 अक्तूबर से 7 नवंबर तक राष्ट्रगीत का पूरा संस्करण गाया जाएगा. राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग ने 27 अक्तूबर को इस संबंध में आदेश जारी किया है.

इस आदेश का समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता अबू आजमी ने विरोध किया है. उन्होंने कहा है कि वंदे मातरम को गाना अनिवार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि सबकी आस्थाएं अलग-अलग होती हैं. अबू आजमी ने कहा है कि इस्लाम मां के सम्मान को अत्यधित महत्व देता है पर उसके सामने सजदा करने की इजाजत नहीं देता है.

साल 2019 में मध्य प्रदेश में इसको लेकर विवाद खड़ा हुआ था, तब कमलनाथ की अगुवाई वाली सरकार ने इसकी अनिवार्यता पर अस्थायी रूप से बैन लगा दिया था. हालांकि, बाद में अपना फैसला पलटते हुए आदेश जारी किया था कि इसका आयोजन पुलिस बैंड के साथ किया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट दे चुका है फैसला
वंदे मातरम का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है. इससे जुड़ी एक याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का सम्मान करता है पर उसे गाता नहीं, तो इसका यह आशय नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है. इसलिए इसे नहीं गाने के लिए किसी व्यक्ति को दंडित अथवा प्रताड़ित नहीं किया जा सकता है. चूंकि वंदे मातरम राष्ट्रगीत है, इसलिए इसको जबरदस्ती गाने के लिए मजबूर करने पर भी यही नियम लागू होगा.

साल 2017 में उत्तर प्रदेश में वंदे मातरम को लेकर विवाद हुआ था. कई शहरों में इसको गाए जाने को लेकर वाद-विवाद होने लगा था. खासकर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) और मेरठ नगर निगम में इसको गाने को लेकर विवाद हुआ था.
साल 2023 में भी महाराष्ट्र में वंदे मातरम को लेकर विवाद हुआ था. तब भी अबु आजमी ने ही राज्य विधानसभा में वंदे मातरम गाने से इनकार किया था. उनका तर्क वही था कि अल्लाह के अलावा इस्लाम में किसी और के आगे झुकने की इजाजत नहीं है.

Ramswaroop Mantri

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