
पवन कुमार (ज्योतिषाचार्य)
धर्मशास्त्र कहते हैं : दृश्यमान जगत भ्रम है. संसार माया है. हमारा – आपका और सबका अनुभव कहता है : जो दिखाया जाता है, वह सच नहीं होता. जो छुपाया जाता है, अनदेखा रहता है; सच वो होता है.
अपवाद को छोड़ दें तो इंसान जो होता है, वह अपने उस स्वरूप को नहीं दिखाता. वह वो दिखाता है, जैसा उसे होना चाहिए. यही पाखंड है. धीरे-धीरे यह पाखंड इतना मज़बूत हो जाता है की इंसान खुद भी, खुद का सच भूल जाता है.
फ़िल्म इंडस्ट्री में कला निर्देशक नितिन देसाई की आत्महत्या प्रदर्शित चकाचौंध के पीछे के आंतरिक खालीपन, टूटन, अतृप्ति, ख़ामोशी, अकेलेपन और आम जनमानस का इंडस्ट्री के लोगों को न समझ पाना भी दर्शाती है.
मैं भी फिल्म निर्देशन से संम्बद्ध हूँ. हम फ़िल्म नगरी में आने वाले स्वप्नदर्शी लोग किस मानसिक अवस्था मे जी रहे होते हैं : आम लोग इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।
हम यह काम छोड़कर जा भी नहीं सकते क्योंकि लगभग पूरी जवानी हम इसमें झोंक चुके होते हैं. दूसरा कोई काम सालों से हमने किया ही नहीं होता है. स्कूली मित्र और रिश्तेदार हमे नॉन प्रैक्टिकल और कुछ तो मूर्ख तक मान चुके होते हैं.
कु-समय भी हम लोगों का साथ नहीं छोड़ता. विषमता ऑक्सीजन की तरह जीवन पर्यंत हमारे साथ रहती है।
उम्मीद और ना उम्मीदी का आकस्मिक थपेड़ा हमे हमेशा अचंभित करता है.
भविष्य को लेकर हम हमेशा डरे हुए होते हैं। संघर्ष हमेशा परछाई की तरह साथ चलता है.
कभी सफलता के लिए संघर्ष तो कभी सफलता मिल जाने पर उसे यथावत बनाये रखने का संघर्ष. बड़ा काम, बड़ा पैसा, बडी टेंशन. इसी तरह बड़ा कर्ज़, बड़ी ज़िम्मेदारियाँ और अनियमित रोजगार के साधन. इन सबसे रोज दो-चार होना. उम्मीद और ना उम्मीद होना।
कई बार मनोनुकूल परिदृश्य नहीं साकार होने पर हताशा-निराशा, लोगों का उपहास हमारी अनदेखी फ़िल्म नगरी के लोगों को अवसादग्रस्त कर देती है.
फ़िल्म नगरी में काम करने वाले आम-अवाम की तरह साधारण लोग नहीं होते हैं। ये आम जन-जीवन भी नहीं जीते. फ़िल्म नगरी के अलावा इनका कोई सर्कल नहीं होता. सफल हो गए तो दुनिया सलाम करती है,
और अगर अपेक्षित सफलता न मिले या मिल कर पुनः विषमता से जूझना पड़े तो उस समय वो इंसान अकेला होता है, बिल्कुल तन्हा।
सपनों का पीछा करते-करते हमारे लगभग सब अपने सब छूट चुके होते हैं। सफलता मिलती भी है तो उसे स्थिर रखने के लिए यथासंभव प्रयास और परिवार से पृथक रहना पड़ता है. कई बार तो अंत समय मे भी कोई स्वजन हमारा साथ नहीं दे रहा होता है। हम जिसके लिए आजीवन जी-तोड़ मेहनत करते रहे उन्हें भी अंतिम समय मे देखना नसीब नहीं होता!
इसे कहते हैं फिल्मी दुनिया. हम खुद तक को स्वाहा करने की क़ीमत अदा करते हैं, तब आपको स्वस्थ मनोरंजन मिलता है.





