माउंटबेटन चाहते थे कि महाराजा हरिसिंह 15 अगस्त से पहले कश्मीर को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय करें। जब माउंटबेटन यह प्रस्ताव लेकर कश्मीर पहुंचे तो महाराजा ने पेट दर्द का बहाना कर उनसे बात नहीं की। क्योंकि महाराजा अपनी रियासत को हर कीमत पर स्वतंत्र रखने के सपने देख रहे थे।
उन्होंने अपनी रियासत को स्वतंत्र बनाये रखने के लिए
श्रीनगर स्थित जगमगाते हुए दरबार हाल में एक भव्य सामारोह का आयोजन किया। उन्होंने इस कार्यक्रम में अपनी रियासत के सभी प्रतिष्ठित लोगों से राजभक्ति का वचन लिया। रियासत के सभी प्रतिष्ठित लोग एक एक करके उनके सिंहासन के पास आते और रेशमी रूमाल में लिपटी हुई स्वर्ण मुद्रा का नजराना राजसी हाथों में रखकर अपनी राजभक्ति का प्रमाण दे रहे थे।
जिस समय यह भव्य कार्यक्रम चल रहा था ठीक उसी समय श्रीनगर से 50 मील दूर कुछ पाकिस्तानी घुसपैठियों ने एक विद्युत केंद्र के कन्ट्रोल रूम में डायनामाइट लगाकर जोर का विस्फोट किया और महाराजा हरिसिंह के भव्य महल के बिल्लूरी फानूसों में जगमगाती हुई सैकड़ों बत्तियां अचानक गुल हो गईं। डल झील के झिलमिलाते पानी पर फूलों से सजी हुई कमरे के आकार की नावों पर अचानक सन्नाटा पसर गया। यह अपशकुन पाकिस्तानी कबायली हमले के कारण हुआ और कबायली एक दो दिन में महाराजा के महल पर हमला करने वाले थे।
माउंटबेटन को यह समाचार दिल्ली में उस समय मिला जब वे थाईलैंड के विदेश मंत्री के सम्मान में भोज दे रहे थे। इस कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे। जब सब अतिथि चले गए तब वाइसराय ने नेहरू को कुछ देर रुकने को कहा और कश्मीर के सारे बदलते हालात की जानकारी दी।
पाकिस्तान के कबायली हमले से घबराए महाराजा हरिसिंह ने 24 अक्टूबर 1947 को भारत सरकार से सैनिक सहायता के लिए संदेश भेजा। 25 अक्टूबर को सुबह प्रधानमंत्री नेहरू की अध्यक्षता में सुरक्षा समिति की बैठक हुई जिसमें यह तय किया गया कि वी पी मेनन को तत्काल कश्मीर भेजा जाए। उसी दिन मेनन हवाई जहाज से श्रीनगर पहुंचे और सीधे कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन के घर गए। मेनन ने महाराजा हरिसिंह को कश्मीर से जम्मू भाग जाने की सलाह दी क्योंकि उनकी जान को खतरा था।
26 अक्टूबर को मेहरचंद महाजन, वीपी मेनन के साथ दिल्ली पहुंचे । सुरक्षा समिति की दूसरी बैठक बुलाई गई जिसमें माउंटबेटन, प. नेहरू, सरदार पटेल भी मौजूद थे। माउंटबेटन ने सलाह दी कि सेना भेजने से पहले महाराजा हरिसिंह के विलय पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए जाएं।
मेनन तत्काल जम्मू रवाना हुए जहां एक महल में महाराजा हरिसिंह ने शरण ले रखी थी। जब मेनन महल में पहुंचे तो महाराजा गहरी नींद में सो रहे थे। वे एक दिन पहले ही श्रीनगर से जम्मू आये थे और अपने सहायक से यह कहकर सोए थे कि अगर वीपी मेनन सुबह तक नहीं आएं तो मुझे रिवाल्वर से गोली मार देना। लेकिन मेनन इसके पहले ही उनके पलंग के पास पहुंच गए और विलय पत्र पर उनके हस्ताक्षर करा लिए गए।
जिस समय कश्मीर का यह पूरा मसला चल रहा था महात्मा गांधी उस समय आसाम में थे। वे 1 अगस्त 1947 को जम्मू कश्मीर का दौरा करने गए थे और वहां उन्होंने कश्मीर की पूरी नब्ज समझ ली थी और वहां से लौटकर उन्होंने माउंटबेटन सहित नेहरू व पटेल को पूरी स्थिति की जानकारी दे दी थी।
जब सरदार पटेल ने कश्मीर में फौज भेजने की बात महात्मा गांधी को तार द्वारा बतलाई तो महात्मा गांधी ने कश्मीर में फौज भेजने के कदम का स्वागत किया। उन्होंने आसाम से खबर भेजी कि पाकिस्तान की बदमाशी का मुकाबला करो , फौज भेजो कश्मीर और वहां से पाकिस्तान को खदेड़ कर बाहर कर दो।
सरदार पटेल ने महात्मा गांधी को तार से यह भी सूचित किया कि भारत सरकार ने पाकिस्तान के हिस्से का शेष बचा 55 करोड़ रुपया न देने का फैसला किया है क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया है। अगर हम इस 55 करोड़ पाकिस्तान को देते हैं तो वे लोग इससे हथियार व गोलाबारूद खरीदेंगे और हमारे ही लोगों को मारेंगे। सरदार पटेल ने कहा कि ये बेवकूफी तो मैं नहीं कर सकता। बिल्कुल बाजिव तर्क था सरदार पटेल का।
गांधीजी ने एक दूसरा स्टैंड लिया । उन्होंने आसाम से खबर भेजी कि ये बात गलत है। 55 करोड़ रुपया अपनी जगह पर है और पाकिस्तान की ये बदमाशी अपनी जगह पर है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का मुकाबला करो , फौज कश्मीर भेजो और वहां से पाकिस्तान खदेड़ कर बाहर कर दो। लेकिन 55 करोड़ रुपये को उससे क्यों जोड़ते हो? ये तो एक अलग तरह की संधि में तुमने खुद ने तय किया है। विभाजन भी तुमने ही स्वीकार किया था मुझसे पूछे बगैर। ये संधि का रुपया है, पाकिस्तान की देनदारी है, देश अभी अभी आजाद हुआ है दुनिया में तुम क्या मुंह दिखाओगे कि तुम अपनी बात से भी पीछे हट जाते हो? इतना बेसिक नैतिक सवाल उन्होंने खड़ा किया कि ये पैसा पाकिस्तान को देकर ये झंझट हमेशा के लिए खत्म करो और पाकिस्तान को कश्मीर से बाहर खदेड़ दो।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अहिंसा के पुजारी ने पाकिस्तान से लड़ने वाली फौज को आशीर्वाद दिया और कहा कि जाइये और लड़िये और पाकिस्तान को वहां से खदेड़ दीजिये। अन्तराष्ट्रीय सीमा पर देश की रक्षा कैसे होगी, अहिंसा से ये रास्ता मैं अभी तक नहीं खोज पाया हूँ। इसलिए जो रास्ता तुमको (फौज) मालूम है उससे देश की रक्षा करो। उन्होंने फौज से कहा कि तुम केला खाने को नहीं रखे गए हो। तुम्हारा काम है देश की रक्षा करना।
इसलिए जो लोग यह समझते हैं कि गांधीजी क्या सीमा पर जाकर चरखा कातकर देश की रक्षा करते ? उन्हें यह प्रसंग पढ़ना चाहिए कि गांधीजी देश की सीमा के उल्लंघन को देश की देह की मर्यादा का उल्लंघन या देश की अस्मिता का चीरहरण मानते थे।
सन्दर्भ- फ्रीडम एट मिडनाइट
गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत के भाषण का अंश
गांधी दर्शन





