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*जब सरकार ही जज बन जाए : लोकतंत्र की सीमाओं पर बुलडोजर*

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-तेजपाल सिंह तेज

          लोकतंत्र का मूलभूत आधार सत्ता का विभाजन है — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इन तीनों स्तंभों का स्वतंत्र रहना केवल संवैधानिक आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अस्तित्व का श्वास है। पर जब कोई सरकार इतनी सशक्त, आत्ममुग्ध और निरंकुश हो जाए कि वह खुद ही न्यायाधीश बनने लगे — न केवल न्यायालयों की स्वायत्तता को निगल जाए, बल्कि जनमत, मीडिया और संस्थाओं की भूमिका भी हड़प ले — तब लोकतंत्र केवल एक दिखावा रह जाता है। आज भारत के सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक परिदृश्य में यह संकट गहराता जा रहा है। यह निबंध उसी तानाशाही प्रवृत्ति की पड़ताल करता है जिसमें “सरकार ही जज बन गई है।”

1. नकल से नाटक तक:

            एक कहावत है — “जब कौआ हंस की नकल करता है, तो न अपनी चाल संभाल पाता है, न हंस की नकल निभा पाता है।” यह कहावत आज की राजनीति और सत्ता की विडंबनाओं पर एकदम सटीक बैठती है। सत्ता की भूमिका सीमित और स्पष्ट है — जनसेवा, विकास, और कानून का शासन। लेकिन जब वह न्यायपालिका की नकल करने लगे, खुद ही जांच, फैसला और सजा देने लगे — तो वह सत्ता न रहकर तानाशाही की छाया बन जाती है। आज यही हो रहा है। सरकारें सीवर, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मूल कर्तव्यों को छोड़कर ड्रामाई गतिविधियों में लिप्त हैं। राजनीति अब प्रशासन नहीं, बल्कि एक थिएटर जैसा लगने लगी है — जहां सरकार मंच संचालक भी है, अभिनेता भी और निर्णायक भी।

2. न्यायपालिका की भूमिका पर सत्ता का हस्तक्षेप:

            लोकतंत्र का एक मुख्य स्तंभ है — न्यायपालिका, जिसकी स्वतंत्रता संविधान द्वारा सुनिश्चित की गई है। पर जब सरकारें खुद ही जाँच एजेंसियों को नियंत्रित करती हैं, आरोप तय करती हैं, और बिना सुनवाई के लोगों के घरों पर बुलडोजर चलवाती हैं — तो यह न केवल कानून की अनदेखी है, बल्कि संविधान की आत्मा पर सीधा प्रहार है।

            देश में एक नई परंपरा शुरू हुई — ‘बिना अदालत के, मौके पर ही सज़ा’। आरोप लगते ही किसी का घर गिरा देना, किसी विचारधारा विशेष के व्यक्ति को देशद्रोही करार देना, और कैमरों के सामने “न्याय” का तांडव दिखाना — यह सब उस राज्य सत्ता की पहचान बन गया है, जिसे लोकतांत्रिक नहीं, तानाशाही सत्ता कहा जाएगा।

          भारत का संविधान न्यायपालिका को पूर्ण स्वतंत्रता देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि उच्चतम न्यायालय तक सरकार के दबाव में आने के आरोपों से घिर चुका है। जज लोया की रहस्यमय मौत हो, राफेल की सुनवाई के दौरान अदालत की चुप्पी, चुनाव आयुक्तों और न्यायाधीशों की नियुक्तियों में सरकार की मनमर्जी — यह सब दर्शाता है कि सरकार चाहती है कि न्याय की कुर्सी पर वही बैठे। 2024 में मुख्य न्यायाधीश की बेंच द्वारा कई ऐसे जनहित याचिकाओं को “राजनीतिक याचिकाएं” कहकर खारिज करना, जिनका जनता के मौलिक अधिकारों से सीधा सरोकार था, यह दर्शाता है कि अदालत भी अब सत्ता के गले में बाँधी घंटी बनती जा रही है।

3. जब न्यायपालिका जागती है : जस्टिस बी.आर. गवई का ऐतिहासिक वक्तव्य

            ऐसे समय में, जब लोकतंत्र की आत्मा दबाई जा रही हो, तब अगर भारत के मुख्य न्यायाधीश यह कहें कि — “सरकारें न तो जज हो सकती हैं, और न ही न्याय करने वाली संस्थाएं बन सकती हैं”, तो यह केवल एक बयान नहीं, बल्कि संविधान की पुनर्स्थापना का उद्घोष है। जस्टिस बी.आर. गवई ने इटली के मिलान में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में स्पष्ट कहा — “न्यायपालिका को न्यायपालिका बने रहने का अधिकार है। यह मंच नहीं है जहां राजनीतिक भाषण दिए जाएं।” उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 — “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार” — का उल्लेख करते हुए सरकार को उसकी संवैधानिक सीमाओं की याद दिलाई।

4. बुलडोजर न्याय : एक राजनीतिक तांडव:

            ‘बुलडोजर’ अब महज़ एक मशीन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक बन चुकी है — बिना सुनवाई, बिना अपील, बिना कानून के सीधी सज़ा देने का प्रतीक। “कभी किसी बाबा का बुलडोजर चलता है, कभी किसी चाचा का, कभी असम के किसी भाई का…” जस्टिस गवई ने न सिर्फ इस प्रवृत्ति को पहचाना, बल्कि उसे तांडव कहकर उसकी संवैधानिक व्याख्या भी की। उन्होंने संकेत किया कि सरकारी बुलडोजर अक्सर गरीबों, दलितों, मुसलमानों, या असहमत लोगों के घरों पर ही क्यों चलता है? जब सरकारें न्याय का अभिनय करने लगती हैं, तो अदालतें सिर्फ इमारतें रह जाती हैं। फिर कानून की व्याख्या व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी करती है और फैसला सड़कों पर या सोशल मीडिया पर सुनाया जाता है।

5. सरकार और संविधान के बीच संघर्ष

जस्टिस गवई का बयान केवल एक आलोचना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। एक समय जब सरकारें संविधान में फेरबदल के मूड में हैं, तो किसी मुख्य न्यायाधीश का सार्वजनिक मंच से संविधान की मूल भावना की ओर लौटना, एक साहसिक और ऐतिहासिक कदम है। डीबी लाइव की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई के बयान लगातार चर्चा में हैं। वह आए दिन ऐसे बयान दे रहे हैं जो चर्चा का विषय बन रहे हैं। और अब एक बार फिर CJI गवई ने बड़ी बात कही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का ज़िक्र किया कि सरकार कभी भी न्यायपालिका की जगह नहीं ले सकती। तो, CJI गवई ने ऐसा क्यों कहा? और इसका क्या मतलब है? उन्होंने कहा कि सरकार कभी भी न्यायपालिका की जगह नहीं ले सकती। सीजेआई बी आर गवई इटली के मिलान में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे। इस दौरान उन्होंने भाषण देते हुए कहा कि न्यायपालिका कभी भी न्यायपालिका की जगह नहीं ले सकती।

            इस संबंध में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले की जानकारी दी। सीजेआई गवई ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करने में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर ज़ोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट के बुलडोज़र न्याय पर रोक लगाने का फ़ैसला सुनाया। जस्टिस गवई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्धारित किया है कि न्यायपालिका कभी भी न्यायपालिका की जगह नहीं ले सकती। और सरकार कभी जज और जूरी नहीं बन सकती।  इस दौरान, सीजेआई गवई ने पिछले 75 वर्षों में गरीब और कमजोर लोगों को न्याय दिलाने में सुप्रीम कोर्ट के योगदान पर चर्चा करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में बुलडोजर न्याय पर रोक लगाने का एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। जस्टिस गवई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका के जज और जूरी बनने पर रोक लगा दी है।

            सीजेआई गवई ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी ज़िक्र किया जिसमें सरकार को कानूनी प्रक्रिया पर रोक लगाने और मनमाने ढंग से अभियुक्तों के घर गिराने पर रोक लगाने का आदेश दिया गया था। यह कथन संविधान के लोकतांत्रिक चरित्र और न्यायिक स्वतंत्रता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है।  (-https://www.Youtube.com/watch? v=Rx  CdjQBbv74)

6. निष्कर्षत : लोकतंत्र की आत्मा बचाने की पुकार:

          आज जब लोकतंत्र का रूपक बुलडोजर हो गया है, और जनता के बीच भय, चुप्पी और असहायता बढ़ती जा रही है — तब जस्टिस गवई जैसे व्यक्तित्व की आवाज़ लोकतंत्र की उस धीमी पड़ती साँस को फिर से जीवित करती है। हमें पूछना चाहिए —

·        क्या घर गिराना न्याय है?

·        क्या बिना सुनवाई की कार्रवाई संविधान सम्मत है?

·        क्या सरकार खुद को न्यायपालिका मान सकती है?

यह सवाल केवल पत्रकारों या विपक्ष के नहीं हैं, बल्कि हर नागरिक के हैं। क्योंकि अगर आज अदालतें मौन हुईं, तो कल हर नागरिक का घर, विचार और अधिकार — सिर्फ संदेह के आधार पर गिराया जा सकता है। अर्थात जब सत्ता तांडव मचाए और बुलडोजर न्याय का प्रतीक बन जाए, तो एक न्यायाधीश का सटीक, संवैधानिक और निर्भीक वक्तव्य — लोकतंत्र की अंतिम पुकार बन जाता है। हमें चुनना है — नाटक या न्याय। क्योंकि लोकतंत्र तब तक जीवित है जब तक अदालतें जिंदा हैं।

लोकतंत्र बनाम सत्ता-सर्वाधिकार:

          लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके स्तंभ — विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस — कितने स्वतंत्र, पारदर्शी और उत्तरदायी हैं। जब इनमें से कोई एक स्तंभ, विशेषकर सरकार (कार्यपालिका), अन्य स्तंभों की भूमिका में हस्तक्षेप करने लगे, विशेषतः न्यायपालिका की, तब लोकतंत्र का संतुलन टूटने लगता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता ने न्यायपालिका को अपने अधीन करने की कोशिश की, देश को तानाशाही की ओर धकेला गया। आज भारत इसी खतरनाक मोड़ पर खड़ा है — जहाँ सरकार खुद ही जज बनने की भूमिका में आ चुकी है।

1. ऐतिहासिक संदर्भ: इंदिरा गांधी और न्यायपालिका का अपमान

          1975 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध ठहराया, तो उन्होंने आपातकाल लागू कर दिया और न्यायपालिका को कठपुतली बना दिया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए.एन. रे को वरिष्ठता क्रम को तोड़कर मुख्य न्यायाधीश बनाया गया, जिससे न्यायपालिका की स्वायत्तता को गहरी चोट पहुँची। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब सरकार को न्यायपालिका से खतरा महसूस होता है, तो वह उसे नष्ट करने में देर नहीं करती।

2. समकालीन उदाहरण: 2014 के बाद का दौर:

          2014 के बाद सरकार और न्यायपालिका के रिश्तों में भारी बदलाव आया। न्यायालयों की स्वायत्तता लगातार संदेह के घेरे में आई। उदाहरणार्थ:

·        जस्टिस लोया की मृत्यु: एक बेहद संवेदनशील मामले में, जिसमें भाजपा के बड़े नेता अमित शाह अभियुक्त थे, उस केस के मुख्य न्यायाधीश की रहस्यमयी मौत हुई। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया, लेकिन न्याय की जगह चुप्पी छा गई।

·        जनवरी 2018 की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस: सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों (जस्टिस चेलमेश्वर, मदन लोकुर, कुरियन जोसेफ और रंजन गोगोई) ने पहली बार प्रेस के सामने आकर मुख्य न्यायाधीश पर सरकार के दबाव में काम करने के आरोप लगाए। यह न्यायपालिका के भीतर लोकतंत्र की मौत की घोषणा थी।

3. नियुक्तियों पर नियंत्रण: कॉलेजियम बनाम केंद्र सरकार:

          न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली को बरकरार रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद केंद्र सरकार ने जानबूझकर कई नामों को महीनों-बरसों तक लटका कर रखा। जस्टिस केएम जोसेफ, जस्टिस एस. मुरलीधर जैसे न्यायप्रिय जजों के ट्रांसफर और नियुक्ति के मामले दर्शाते हैं कि सरकार न्यायपालिका पर नियंत्रण चाहती है।

4. जांच एजेंसियों का दुरुपयोग: CBI, ED और आयकर विभाग:

          सरकार अब केवल जज नहीं, अभियोजन पक्ष भी है। सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स विभाग जैसे संस्थानों का दुरुपयोग विपक्षी नेताओं को डराने और चुप कराने के लिए किया जा रहा है। 2019 के बाद ED की छापेमारी में 95% से अधिक मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ थे। महाराष्ट्र, झारखंड, दिल्ली और बंगाल जैसे गैर-भाजपाई राज्यों में विपक्ष के नेताओं पर जांच एजेंसियों की बाढ़ सी आ गई है। जब अभियुक्त चुनने का आधार राजनीतिक हो, और न्यायालय केवल दर्शक बनकर खड़ा हो, तब न्याय नहीं, सत्ता का स्वेच्छाचार होता है।

          ऐसा लगता है कि जांच एजेंसियां सरकार की कठपुतली बन गई हैं।  CBI, ED, NIA, IT — ये वे संस्थाएं हैं जो कानून और न्याय के निष्पक्ष प्रहरी मानी जाती थीं। लेकिन जब विपक्ष के नेताओं पर चुनाव से पहले रेड पड़ती है और वही नेता सत्ता पक्ष में आते ही क्लीन चिट पा जाते हैं, तो सन्देह नहीं रह जाता कि सरकार ने केवल विधायिका नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का भी निजीकरण कर लिया है। बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और दिल्ली — हर राज्य में जहां विपक्षी सरकार है, वहाँ ED और CBI की दस्तक आम हो गई है। यह दस्तक कानून की नहीं, सत्ता की धमक बन चुकी है।

5. मीडिया ट्रायल: टीवी स्टूडियो बनाम अदालतें:

        मीडिया ने अपनी निष्पक्षता खोकर सरकार के पक्ष में एक न्यायिक मंच बना लिया है। अर्णब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, अमीश देवगन जैसे पत्रकार जज की भूमिका में आकर “देशद्रोही” तय करते हैं। तब्लीगी जमात से लेकर उमर खालिद, स्टेन स्वामी और कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को मीडिया ने पहले ही दोषी घोषित कर दिया, अदालत की प्रक्रिया बाद में आई। यह “मीडिया-न्यायपालिका” सरकार के इशारे पर काम करती है, और जनता के मानस को नियंत्रित करने का काम करती है। टेलीविज़न डिबेट में एंकर अब जज की भूमिका निभाते हैं — “देशद्रोही कौन?”, “राष्ट्रभक्त कौन?”, “गद्दार कौन?” ये सब तय करने का अधिकार अब जनता या अदालत के पास नहीं, बल्कि अर्णब गोस्वामी, अमीश देवगन और सुधीर चौधरी जैसे पत्रकारों ने अपने पास रख लिया है। गैर-सरकारी आवाज़ों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, छात्रों, पत्रकारों और मुस्लिम, दलित, आदिवासी समुदायों को टीवी पर ही अपराधी घोषित कर दिया जाता है। TRP की अदालत में सरकार जज होती है, मीडिया वकील और जनता कटघरे में खड़ी होती है।

6. धार्मिक भावनाएँ: न्याय का नया पैमाना:

          अब अपराध कानून नहीं, “धार्मिक भावनाओं की ठेस” से तय होता है। नूपुर शर्मा ने जब पैगम्बर मोहम्मद पर आपत्तिजनक टिप्पणी की, तो सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें “देश को आग में झोंकने” वाला करार दिया, लेकिन सरकार ने कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की। वहीं, धार्मिक कट्टरता का विरोध करने वालों पर UAPA और देशद्रोह जैसे गंभीर मुकदमे लगाए जाते हैं। यह सरकार-निर्दिष्ट न्याय है, जिसमें धर्म, जाति और राजनीति तय करती है कि कौन दोषी है।

          धार्मिक भावनाओं पर आधारित न्याय: “Sentiments hurt” — यह एक ऐसा वाक्य है जो अब कानून बन चुका है। धार्मिक भावनाओं के नाम पर किसी की किताबें जलाना, फिल्में बैन करना, कलाकारों को धमकाना, शिक्षकों को निलंबित करना, इन सबको न्याय का रूप दे दिया गया है। जब नूपुर शर्मा के बयान से पूरा देश दंगों की चपेट में आ गया और सुप्रीम कोर्ट ने उसे “देश को आग में झोंकने” के लिए दोषी बताया — तब सरकार ने उसे संरक्षण दिया। दूसरी ओर, उमर खालिद जैसे छात्र नेता बिना किसी दोषसिद्धि के वर्षों से जेल में हैं। यानी, अपराध अब सरकार नहीं, आस्था तय करती है। किसका धर्म नाराज होगा — यह तय करता है कौन जेल में जाएगा और कौन नहीं।

7. चुनावी बांड और न्यायपालिका की चुप्पी:

          चुनावी बांड योजना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी क्योंकि इससे राजनीतिक चंदों की पारदर्शिता खत्म हो गई। 6 साल तक अदालत ने सुनवाई नहीं की। जब चुनावी बांड पर निर्णय आया, तो साबित हुआ कि 90% से अधिक बांड भाजपा को दिए गए। यह देरी और चुप्पी, न्यायपालिका की स्वायत्तता पर प्रश्नचिन्ह है।

8. आर्थिक न्याय भी अब सत्ता का खिलौना बन गया है:

           देखा तो यह जा रहा है कि आर्थिक न्याय भी अब सत्ता का खिलौना बन गया है। “हमने मुफ्तखोरी बंद कर दी”, “हम देश की संपत्ति गरीबों तक पहुँचा रहे हैं” — ये सब बड़े-बड़े दावे हैं। लेकिन आज जिनपर सबसे ज्यादा टैक्स का बोझ है, वे गरीब, मजदूर और निम्न-मध्यमवर्ग हैं। अम्बानी, अडानी जैसे उद्योगपतियों को टैक्स छूट, बैंकों से कर्जमाफी और ज़मीनों की नीलामी का लाभ मिलता है। जो किसान अपने हक़ की मांग करता है, वह आतंकवादी कहलाता है। पर जो कॉर्पोरेट सरकार की गोद में बैठा है, वह देश निर्माता बन जाता है। आर्थिक न्याय भी अब उसी की जेब में है, जिसके पास सत्ता की पहुंच है।

9. जनमत को भी अदालत बनाना: भीड़तंत्र का न्याय:

          जब सरकार न्यायालय बनती है, तब जनता को भी न्याय का भ्रम देकर उसे हिंसा के लिए उकसाया जाता है। गौ-रक्षा के नाम पर भीड़ हत्या कर देती है, दलितों को निर्वस्त्र कर सार्वजनिक रूप से पीटा जाता है, और वीडियो वायरल कर दिया जाता है — ताकि “न्याय हुआ” महसूस हो। यह भीड़तंत्र, सरकार के चुप्पी भरे समर्थन से, “लोकतंत्र की जगह राजतंत्र” बना रहा है। यहाँ भीड़ ही अभियुक्त है, भीड़ ही जज, और भीड़ ही जल्लाद।

10. संसद और अदालत के बीच की दीवार गिराई जा रही है:

          जब सुप्रीम कोर्ट CAA-NRC, तीन कृषि कानूनों, चुनावी बॉन्ड, अनुच्छेद 370 हटाने, नोटबंदी जैसे फैसलों पर महीनों तक चुप रहे या केवल सरकार के पक्ष में फैसला दिए, तब यह स्पष्ट हुआ कि संसद और अदालत के बीच की दीवार अब कृत्रिम रह गई है। विपक्ष, जो कभी इन संस्थाओं के माध्यम से न्याय की मांग करता था, अब या तो जेल में है या निलंबित। संसद में बहस नहीं होती, सड़क पर प्रदर्शन पर लाठी चलती है और अदालतें मौन हैं। इस नये दौर में सरकार संसद भी है, पुलिस भी, और अदालत भी।

11. संविधान को पलटने की साजिश:

          सरकार ने अब संविधान संशोधन के जरिये न्याय की परिभाषा को ही बदलना शुरू किया है। CAA, NRC, कृषि कानून, श्रम कानून संशोधन, अनुच्छेद 370 की समाप्ति जैसे कदमों में संसद में बहुमत के बल पर कानून पास कर दिए गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने महीनों तक चुप्पी साधे रखी या केवल वैधानिकता पर विचार किया, सामाजिक न्याय पर नहीं।

निष्कर्षत: सरकार की अदालत में जनता कटघरे में है। आज की स्थिति यह है कि —

·        सरकार ही अभियोजन पक्ष है,

·        सरकार ही जज है,

·        सरकार ही पुलिस है,

·        सरकार ही मीडिया है, और

·        सरकार ही धर्म है।

          ऐसे में आम नागरिक, विपक्ष, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट — सभी कटघरे में खड़े हैं। यह लोकतंत्र नहीं, सत्ता द्वारा नियंत्रित “न्याय का तमाशा” है।

          डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था — “संविधान केवल एक दस्तावेज है, असली सवाल यह है कि उसे लागू करने वाले कौन लोग हैं।” आज वही लोग संविधान की आत्मा का गला घोंट रहे हैं, जिन्हें उसकी रक्षा करनी थी। जब सरकार ही जज बन जाए, तब न्याय केवल एक सजावटी शब्द रह जाता है। सारांशत: “न्याय वह नहीं जो सत्ता तय करे, न्याय वह है जो सत्ता से प्रश्न कर सके।” यह कथन भारत के वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक संकट की न्यायिक परछाइयों को समझने का एक गंभीर प्रयास है।

          निष्कर्षत: जब न्याय सरकार के पास गिरवी हो और जब सरकार ही जज बन जाए, तब लोकतंत्र केवल एक तमाशा बनकर रह जाता है। ऐसी व्यवस्था में संविधान एक दस्तावेज़ नहीं, एक बाधा बन जाता है — जिसे हटाना सत्ता की प्राथमिकता बनती है। और यही आज भारत में हो रहा है। डॉ. आंबेडकर ने चेताया था — “If I find the Constitution being misused, I shall be the first to burn it.” आज संविधान का दुरुपयोग हो रहा है, और सबसे पहले वही संस्थाएं जल रही हैं, जिनका निर्माण संविधान ने किया था — न्यायालय, स्वतंत्र प्रेस, शिक्षा व्यवस्था, और जनता का विवेक।

          अब समय है कि हम यह सवाल पूछें — क्या सरकार को जज बनने देना चाहिए? अगर नहीं, तो हमें उस भूमिका में लौटना होगा जहाँ जनता स्वयं लोकतंत्र की असली जज बने, न कि सत्ता की भेड़। अर्थात — “अदालत जब सरकार के नीचे झुकती है, तो कानून खड़ा नहीं हो पाता।

और जब न्याय भी सत्ता का मुखबिर बन जाए, तब अन्याय ही राष्ट्रीय नीति बन जाता है।”

Ramswaroop Mantri

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