शशिकांत गुप्ते
हम,भारत के लोग,भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न
समाजवादी ,पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए,तथा उन सब में,व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बन्धुता बढ़ाने के लिए,दृढ़ संकल्पित है।अपने देश की प्रास्तावना की शुरुआत ही हम से हुई है।
उत्तर भारत के कुछ प्रान्तों में हम शब्द का प्रयोग स्वयं के लिए किया जाता है।जैसे हम जाता हूँ।
व्यक्तिगत पहचान में हम का प्रयोग अहंकार का दर्शाता है।
बहरहाल हम का महत्व समझना जरूरी है।
समाज में व्याप्त कुरीतियों,दकियानूसी रूढ़ियों
के विरुद्ध विद्रोह करते समय हम शब्द का लोप हो जाता है।मसलन हम दूसरों पर आश्रित हो जातें हैं।
महापुरुषों,चिंतकों,विचारकों,
सामाजिक कुरूतियो के विरुद्ध क्रांति करने वाले महान व्यक्तियों की पुस्तकों को किताबी कीड़ों की तरह चाटने वालों की कमी नहीं है?जो भी विचार पढतें हैं उस पर मनन चिंतन कर आचरण में उतारने के लिए जो साहस चाहिए उसकी कमी है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग सिर्फ आलोचना के लिए किया जाता है।सिर्फ आलोचना करने की मानसिकता का मतलब होता है,मानसिक रूप से दूसरों पर अवलंबित होना।मसलन सर्वांग सम्पन्न होकर भी बैसाखियों के सहारे चलना।
दूसरों पर उंगली उठाने के साथ अपनी शेष तीन उंगलियों को अंगूठे से बंद कर लेतें हैं। अंगूठा दिखाने का भी साहस जुटा नहीं पातें हैं।
वर्तमान में तो अंगूठा दिखाना उपलब्धि का संकेत माना जाता है।
दूसरों की सिर्फ आलोचना करना मतलब अपने कर्तव्य से मुह मोड़ना,इस आचरण को पीठ दिखाना भी कहतें हैं।
महात्मा गांधीजी ने एकला चलो के नारे को बुलंद किया था।
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी का यह शेर याद रखना चाहिए।
कथित बुद्धिजीवियों की आदत होती है सिर्फ आलोचना करना।
लेखक को स्वयं के व्यंग्य की कुछ पंक्तियों का स्मरण हो रहा है।
“एक व्यक्ति ने बुद्धिजीवियों के बीच एक प्रश्न उपस्थित किया?
भ्रष्ट्राचार का उदगम कहाँ से होता है?प्रश्न सुन बुद्धिजीवियों में बहस छिड़ गई,इस बात को लेकर कि, यहाँ उदगम शब्द ग़लत है।ए नाम के बुद्धिजीवी ने अपनी राय प्रकट की।बी नाम के बुद्धिजीवी ने कहा गंगोत्री कैसा रहेगा? सी नाम के बुद्धिजीवी ने तत्काक बी की बात काटते हुए कहा, भ्र्ष्टाचार के साथ गंगोत्री जैसे पवित्र शब्द को नहीं जोड़ना चाहिए।अंतः बुद्धिजीवियों की बहस का नतीजा यह निकला कि,प्रश्न वाचक को पुनः लिख कर लाया जाए। प्रश्नकर्ता पूर्ण रूप से समझ गया कि,बुद्धिजीवियों को भ्रष्ट्राचार से ज्यादा चिंता वाक्य रचना पर है।”
उपर्युक्त मुद्दों पर विचार करने पर यह स्पष्ट होजाता है कि,संविधान के प्रारम्भ के हम शब्द को भूल कर मैं क्यों किसी पचड़े पडू वाली मानसिकता ही परावलंबी होने के भाव को स्पष्ट करती है।
लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है।जनता मतलब देश का हरएक नागरिक।
हम जबतक जनप्रतिनिधियों पर अवलंबित होंगे तबतक हम अचेतन स्थिति में ही रहेंगे।
जिस दिन जनप्रतिनिधि हमसे खुद आकर पूछेगा बताइए क्या समस्या है?तब हम समझ सकतें है कि हम जाग गएं हैं।
एक खेल में देश की टीम क्या हर गई,कथित बुद्धिजीवियों को आलोचना का अवसर मिल गया।
यदि भावावेश में किसी ने विरोधी टीम की जीत की खुशी मनाई भी तो उसकी आलोचना करने के पूर्व अपने जेहन में झांक कर देख लेना चाहिए। ईमादारी से जेहन में झाकेंगे तो हमें यह भी स्मरण हो जाएगा कि हमारे जनसेवक कितने उदारमना हैं।बिल बुलाएं भी बिरयानी का स्वाद चखने चले जातें हैं?
हम कामयाब होंगें एक दिन मन हो विश्वास।जब हमें इस बात का एहसास हो जाएगा कि यदि देश की आबादी एक सौ चालीस करोड़ है तो मैं भी एक बटा एक सौ चालीस करोड़ हूँ।
हम होंगे कामयाब कब…..जब?





