पुष्पा गुप्ता
पाकिस्तान को अपनी हार अनेक आईनों में देखनी चाहिए। उसके भीतर पनप रहे आतंकी ठिकानों ने उसकी पहचान मिटा दी है। वह भारत के हमले के जवाब में कहीं से भी सहानुभूति तक नहीं बटोर सका।दुुनिया भर के अख़बारों की रिपोर्टिंग और विश्लेषणों में पाकिस्तान का ज़िक्र इस तरह से किया गया है जैसे में यह मानी हुई बात हो कि आतंक के ठिकाने वहां हैं तो हमला और कहाँ होगा। इसकी भनक तक नहीं कि पाकिस्तान को ग़लत समझ लिया गया होगा।
यह साबित करने की बात रही और न दोहराने की। यही पाकिस्तान की निरंतर हार है। पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के लोगों ने इंस्टाग्राम पर भारत के हमले में जवाब में ख़ूब रील बनाए। अपनी रचनात्मक शक्ति और प्रतिभा का प्रदर्शन किया। कहते हैं कि उनके सीरीयल अच्छे होते हैं। मैं नहीं देखता लेकिन मान लेते हैं कि बहुत अच्छे होते हैं। तो इन कथा कहानियों में उन्हें अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल आतंकवाद की निंदा में करना चाहिए।
आतंकी और इसे शह देने वाली संस्थाओं का मज़ाक उड़ाना चाहिए, जिनमें वहां की सेना और सरकार भी शामिल है।गंभीर सीन रचे जाने चाहिए कि इसने उन्हें कहाँ पहुंचा दिया है। आतंक को लेकर ख़ुद पर हँसना चाहिए। रोना चाहिए। वैसे भी रील बनाने वाले ज़्यादा दिन ख़ाली नहीं बैठ सकते हैं। वे उठें और रील बनाकर आतंकवाद और उसके पीछे खड़ी सेना और सरकार की आलोचना करें।
कुछ ऐसा बनाएं कि हम दिन भर की मेहनत के बाद अपनी कमाई से थाली सजा कर खाते रहे, पार्टियाँ करते रहे लेकिन हुकूमत हमारे टैक्स के पैसे से आतंकियों को मुर्गा खिलाती रहे ताकि वे भारत में धमाका करें और जवाब में भारत हम पर स्ट्राइक करे।
हम क्या खा रहे हैं और हमें कौन खा रहा है। इस मुल्क के शहरी क्या करें? आतंकी बनने की ट्रेनिंग लें या रील बनाएँ? अगर पहलगाम हमले के बाद बनाए गए रील किसी प्रोपेगैंडा वॉर की रणनीति का हिस्सा थे तो वहाँ भी पाकिस्तान मात खा गया।
वह अपने लिए दुनिया में समर्थन हासिल नहीं कर सका। लोगों ने उसे केवल हँसी मज़ाक और लाइक करने भर के लिए देखा।
पाकिस्तान प्रोपेगैंडा वॉर से इसे नहीं झुठला सका कि आतंकी ठिकानों के लिए उसका नाम ग़लत लिया जाता है। अगर यह प्रोपेगैंडा वॉर नहीं था और वहां के नागरिकों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी तब भी वे इस सच्चाई को नहीं बदल पाए।
बल्कि इस सच्चाई से भागने के लिए भारत के हमले का मज़ाक बना रहे थे। क्या ऐसा भी कोई रील था जो पहलगाम के आतंकी हमले में मारे गए लोगों के पक्ष में और आतंकवाद की आलोचना में बना हो? मैने देखा नहीं लेकिन देखना चाहूँगी।
कहा जाता है कि पाकिस्तान आतंकवाद को शह इसलिए देता है क्योंकि युद्ध से सस्ता विकल्प है। ऐसा है नहीं। एक आतंकी तैयार करने में भले ही सैनिक तैयार करने से कम ख़र्चा आता हो लेकिन एक आतंकी देश की शान गिराता है।
एक सैनिक जान देकर भी युद्ध हारकर भी शान बढ़ाता है। आतंकी ठिकानों को पनपने देने या सीधे ट्रेनिंग देने की रणनीति से क्या पाकिस्तान को वह सम्मान मिला? सम्मान छोड़िए वह देश मिला जो किसी भी देश को होना चाहिए, जैसा किसी देश को बनना चाहिए?
वहाँ के सेनाध्यक्ष राजनीति की भाषा बोलते हैं। यहां भी एक सवाल पूछा जा सकता है। क्या अपने दम पर बोल रहे हैं? या कभी अमरीका या चीन के दम पर? मेरा मानना है कि जब पाकिस्तान के लोग आतंकवाद के ख़िलाफ़ रील बनाने लग जाएंगे तो एक शुरूआत होगी। धीरे धीरे यह बात फैलेगी कि आतंक की नीति ने पाकिस्तान को कहाँ पहुंचा दिया है। कहा जाता है कि चीन पाकिस्तान के पीछे है।
हो सकता है, लेकिन चीन वैसे ही पाकिस्तान के साथ है जैसे पाकिस्तान आतंकी संगठनों के पीछे। सामने तो नहीं है। वर्ना युद्ध और विनाश की निंदा करने के बाद भी इसकी स्थिति पैदा होती रहेगी क्योंकि अगली आतंकी कार्रवाई फिर से इसी मोड़ पर दोनों देशों को खड़ा कर देगी।
पाकिस्तान का काम इससे नहीं चलेगा कि वह भी आतंक का शिकार रहा है,फिर आतंकी ठिकानों को शह क्यों मिलती है? अगर वह अपने लिए आतंक की पीड़ा समझ रहा है तो दूसरों के ख़िलाफ़ आतंकवाद का इस्तेमाल कैसे कर सकता है।





