अग्नि आलोक
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जिन्होंने अपनी लेखनी से जगाई
राष्ट्रवाद की अलख

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चाहिए स्वराज्य के लिए एक संपादक। वेतन- दो सूखी रोटियां, एक
गिलास ठंडा पानी और प्रत्येक संपादकीय के लिए 10 साल जेल।”
साल

1884 में निकाला गया यह विज्ञापन शायद दुनिया का इकलौता विज्ञापन
होगा जिसमें वेतन में 10 साल जेल की बात की कही गई थी। यह
विज्ञापन दर्शाता है कि गुलामी के दौर में भारत में पत्रकारिता कितनी
मुश्किल थी। उसी दौर में 30 मई 1826 ही वह दिन है जब भारत में
उदन्त मार्तण्ड नाम से पहला हिंदी का अखबार प्रकाशित हुआ था। इस
दिन को हर वर्ष हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है।
जननायकों के साथ-साथ पत्रकारों ने उस दौर में अपनी कलम से सिर्फ
अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई ही नहीं लड़ी, बल्कि कुरीतियों पर भी प्रहार कर
से सामाजिक चेतना की अलख भी जगाई। सकारात्मक पत्रकारिता देश
और समाज के विकास के लिए ऊर्जा का कार्य करती है। अमृत काल में
जब स्वर्णिम भारत के संकल्प को साकार करने की दिशा में राष्ट्र आगे
बढ़ रहा है, ऐसे में नए भारत के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
का वह कथन महत्वपूर्ण हो जाता है, जिसमें वे कहते हैं, ”130 करोड़
भारतीयों के कौशल, ताकत और रचनात्मकता दिखाने के लिए हमारी
मीडिया का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सकता है।”

कवयित्री महादेवी वर्मा ने कहा था, “पत्रकारों के पांव के छालों से इतिहास
लिखा जाता है।” महादेवी वर्मा के कहे ये शब्द बताते हैं कि भारतीय
स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारों की भूमिका क्या थी। इन पत्रकारों का
उद्देश्य आम जन को जागृत करना और सामाजिक सुधार के साथ-साथ

राष्ट्रीय आंदोलन के लिए प्रेरित करना था। उस समय अखबार निकालना
बहुत हिम्मत का काम था क्योंकि अंग्रेजों को उसमें प्रकाशित बात अगर
बुरी लग गई तो पत्रकारों को कड़ी से कड़ी सजा भुगतनी पड़ती थी।
आजादी के आंदोलन में अखबारों को लड़ाई का एक सशक्त माध्यम और
हथियार माना जाता था। औपनिवेशिक शासन के खिलाफ देश के लोगों
को एकजुट करने के लिए पूरे भारत में स्थापित समाचार पत्र और
पत्रिकाओं की एक गौरवशाली परंपरा रही है। कहा भी गया है- खींचो न
कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार
निकालो। यह पंक्ति बताती है कि एक अखबार की ताकत क्या होती है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बहुत से ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने
पत्रकारिता के माध्यम से देश की सेवा की। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान
लगभग हर बड़ा नाम, कहीं न कहीं लेखन से भी जुड़ा था। वर्तमान
समय में भारत में पत्रकारिता का दायरा बहुत विस्तृत हो गया है और
इसकी जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ गई है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी भी पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्र उत्थान पर अक्सर जोर
देते रहते हैं। वह कहते हैं कि पत्रकारिता, सकारात्मकता से ही सार्थकता
तक पहुंचती है।
आजादी के अमृत महोत्सव में इस बार के अंक में राजा राममोहन राय,
माखनलाल चतुर्वेदी और अजीमुल्लाह खान की कहानी
जिन्होंने

पत्रकारिता के माध्यम से समाज सुधार और आजादी के आंदोलन को
एक नई दिशा देने का काम किया।

स्वतंत्र पत्रकारिकता के जनक राजा राममोहन राय
भारत में आजादी के आंदोलन को अपनी पत्रकारिता के माध्यम से एक
नई दिशा देने वाले राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत के
पुनर्जागरण का पिता माना जाता है जिन्होंने राष्ट्र सेवा के लिए अपना
सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। 22 मई, 1772 को बंगाल के राधानगर में
एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में जन्मे राजा राममोहन राय ने अंग्रेजी,
बांग्ला और उर्दू में भी अखबार निकाला था। उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता का
जनक भी माना जाता है। इतना ही नहीं, उन्होंने लेखन और अन्य
गतिविधियों के माध्यम से भारत में स्वतंत्र प्रेस के लिये आंदोलन का
समर्थन किया और कठिन संघर्ष किया। भारत में ब्रिटिश शासन की
स्थापना के बाद छापेखाने की शुरूआत 1778 में हो चुकी थी। जिस
समय राजा राममोहन राय पत्रकारिता के क्षेत्र में आए उस समय
भारतीय समाचारपत्रों पर ब्रिटिश सरकार ने अंकुश लगा रखा था। ऐसे में
उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए प्रथम आंदोलन का शंखनाद किया।
जब 1819 में लॉर्ड हेस्टिंग्स ने प्रेस सेंसरशिप में ढील दी, तो राममोहन
राय ने तीन पत्रिकाओं- ब्राह्मणवादी पत्रिका (वर्ष 1821); बंगाली
साप्ताहिक- संवाद कौमुदी (वर्ष 1821) और फारसी साप्ताहिक- मिरात-

उल-अकबर का प्रकाशन किया। भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत और
आधुनिक भारत के जनक कहे जाने वाले राजा राममोहन राय ने न
सिर्फ ब्रह्म समाज की स्थापना की बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन और
पत्रकारिता के माध्यम से जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन को
एक नई दिशा भी प्रदान की। उनके आंदोलनों ने जहां पत्रकारिता को
चमक दी, वहीं उनकी पत्रकारिता ने आंदोलनों को सही दिशा दिखाने का
कार्य भी किया। अपने जीवन काल में राजा राममोहन राय ने कई
स्तरीय पत्रों का संपादन-प्रकाशन किया। इसमें बंगदूत एक अनोखा पत्र
था जिसमें बांग्ला, हिंदी और फारसी भाषा का प्रयोग एक साथ किया
जाता था। उनके जुझारू और सशक्त व्यक्तित्व का अंदाजा इस बात से
लगाया जा सकता है कि 1821 में एक अंग्रेज जज ने एक भारतीय
प्रताप नारायण दास को कोड़े लगाने की सजा दी जिसके कारण उनकी
मृत्यु हो गई। इस बर्बरता के खिलाफ राय ने लेख लिखा था। उनके
प्रयासों से भारतीय पत्रकारिता को एक मजबूत आधार मिला और उनके
प्रयासों से भारतीय पत्रकारिता को नये आयाम मिले। वह जानते थे कि
मानव सभ्यता का आदर्श स्वतंत्रता से अलगाव में नहीं है, बल्कि राष्ट्रों
के आपसी सहयोग के साथ-साथ व्यक्तियों की अंतर-निर्भरता और
भाईचारे में है।

अजीमुल्लाह खान

ने क्रांति-विद्रोह का प्रचार करने के लिए निकाली थी ‘पयाम-ए-आजादी’

Azimullah Khan - Wikipedia

एक बार एक अंग्रेज अधिकारी ने अजीमुल्लाह के पिता नजीब मिस्त्री को
घोड़ों का अस्तबल साफ करने को कहा। उनके इंकार करने पर अधिकारी
ने नजीब को छत से नीचे गिरा दिया और फिर ऊपर से ईंट फेंककर
मारी। इसके परिणामस्वरूप नजीब छह महीने तक बिस्तर पर पड़े रहे
और उनका निधन हो गया। इस तरह, देसी रियासतों और सिपाहियों की
लड़ाई को एक सूत्र में पिरोने में अहम भूमिका निभाने वाले अजीमुल्लाह
खान के सिर से बचपन में ही पिता का साया उठ गया। साथ ही इस
घटना ने उनके मन-मस्तिष्क पर जबर्दस्त प्रभाव छोड़ दिया। 1857 के
विद्रोह में अजीमुल्लाह खान की भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक
मामलों तक ही सीमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण
विचारक भी थे। वह 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कानपुर
से नेतृत्व करने वाले महान क्रांतिकारी और रणनीतिकार थे। कानपुर के
शासक नाना साहब पेशवा के पहले सलाहकार और बाद में प्रधानमंत्री रहे
अजीमुल्लाह जब यूरोप यात्रा पर गए तो वह वहां से अपने साथ प्रिंटिंग
प्रेस ले आए। इस प्रिंटिंग प्रेस से उन्होंने एक अखबार ‘पयाम-ए-आजादी’
निकाली जिससे क्रांति और विद्रोह का प्रचार होता था। कहा जाता है कि
1857 में जो विद्रोह हुआ था, उसकी रणनीति अजीमुल्लाह ने ‘पयाम-ए-
आजादी’ समाचार पत्र के माध्यम से ही गुप्त रूप से बनायी थी। इस

अखबार के माध्यम से वह क्रांतिकारी बलों के साथ मिलकर फिरंगियों के
खिलाफ विद्रोह की रणनीति बनाने लगे। यह अखबार हिंदी, उर्दू और
मराठी में निकलता था। इसी अखबार में लिखा उनका एक गीत ‘हम हैं
इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा, पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी
प्यारा’ आगे चलकर 1857 के विद्रोहियों का झंडा गीत बना। यह गीत
1857 के क्रांतिकारी आदर्श और लक्ष्य को भलीभांति प्रकट करता है। इस
गीत में राष्ट्रीयता निहित था और 1857 की लड़ाई में जन-पक्ष को
उजागर करता था। कहा जाता है कि 1857 के क्रांतिकारी सिपाहियों का
यह अभियान-गीत राष्ट्रीय गीतों का मुकुट मणि है। यह सीधा, सरल,
साफ है। इसमें केवल देश का स्तुतिगान ही नहीं, स्वतंत्रता-संघर्ष के लिए
आह्वान और ललकार भी है। इस गीत को पढ़कर अगर अजीमुल्लाह
खान को आधुनिक भारत का पहला राष्ट्रवादी कहा जाए तो वह
अतिश्योक्ति नहीं होगा।

Makhanlal Chaturvedi | Kavishala Sootradhar

पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित अपराजेय
योद्धा थे माखनलाल चतुर्वेदी

युगपुरुष माखनलाल चतुर्वेदी एक ऐसे विरल योद्धा पत्रकार और
साहित्यकार थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में न केवल बढ़-चढ़कर हिस्सा
लिया बल्कि देश की खातिर जेल भी गए। युवाओं के सच्चे हितैषी और
मार्गदर्शक होने के अलावा राष्ट्र के प्रति उनका लगाव और समर्पण
अद्भुत था। देश के आजाद होने से पूर्व उन्होंने अपनी कलम और वाणी
से पूरे युग को प्रभावित किया। आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण के लिए
प्रेरित करते रहे। माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 को मध्य
प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बावई गांव में हुआ था। दादा के रूप में
पहचाने और स्वतंत्रता संग्राम के अपराजेय योद्धा के रूप में स्वीकारे
जाने वाले माखनलाल चतुर्वेदी ने जब पत्रकारिता शुरु की तो सारे देश में
अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत हो गई थी। उस समय
राष्ट्रीयता और समाज सुधार की चर्चाएं होने लगी थी और अंग्रेजों को
देश के बाहर निकालने की भावनाएं जोरों पर थी। 1913 में खंडवा के
हिंदी सेवी कालूराम गंगरांडे ने मासिक पत्रिका प्रभा का प्रकाशन आरंभ
किया, जिसके संपादन का दायित्व माखनलाल चतुर्वेदी को सौंपा गया।
1913 में उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से
पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित हो गए।

माखनलाल चतुर्वेदी ने एक उच्चकोटि की साहित्यिक पत्रिका प्रभा के
माध्यम से आजादी के आंदोलन में अपना योगदान देना शुरु कर दिया।
जल्दी ही लोगों को झकझोरने एवं जगाने वाली रचनाओं के माध्यम से
प्रभा हिंदी जगत का एक जरूरी नाम बन गई। गणेश शंकर विद्यार्थी ने
जब कानपुर से साप्ताहिक प्रताप का संपादन प्रकाशन आरंभ किया तो
माखनलाल चतुर्वेदी उससे जुड़ गए। महात्मा गांधी द्वारा आहूत 1920 के
असहयोग आन्दोलन में महाकौशल में पहली गिरफ्तारी देने वाले
माखनलाल ही थे। इसी वर्ष 17 जुलाई 1920 को इनके नेतृत्व में
‘कर्मवीर’ का संपादन शुरू हुआ जो बड़ी निर्भीकता से देसी रियासतों का
कच्चा चिट्ठा खोल रहा था। इस पत्रिका में आलेख निडर होकर
प्रकाशित किए जाते थे। ऐसे में कुछ राजाओं ने पत्र को सहयोग देना
बंद कर दिया था। पत्र ने बड़े साहस के साथ सभी विषमताओं को सहा
लेकिन कभी भी अपनी अस्मिता का सौदा नहीं किया। स्वाधीनता के
अतिरिक्त असहयोग, प्रजातंत्र, खिलाफत, रौलट एक्ट, पंचायती राज, देशी
राज्य, हिंदू मुस्लिम भेद नीति, क्रांतिकारी आंदोलन और गरम एवं नरम
दल जैसे अनेक धधकते हुए प्रश्नों और विषयों पर कर्मवीर में प्रकाशित
विचार पूरे भारत को उद्वेलित करता था। माखनलाल चतुर्वेदी कर्मवीर के
माध्यम से असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से दाखिल हो गए जिसके
कारण वह ब्रिटिश शासन की आंखों में किरकिरी बन गए। जब उनकी
गिरफ्तारी हुई तो उसकी निंदा करते हुए महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में
और गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप में एवं देशभर के अखबारों ने कठोर

संपादकीय टिप्पणियां लिखी थी। ‘कर्मवीर’ के माध्यम से माखनलाल ने
जिन मूल्य आधारित पत्रकारिता के मानक गढ़े वे भारतीय पत्रकारिता
की अनमोल विरासत है। माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने पत्रकारिता जीवन
में प्रभा, प्रताप और कर्मवीर के माध्यम से देश में जागृति लाने का
अथक प्रयास किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कई कार्यक्रमों के दौरान
देश के प्रसिद्ध कवि माखनलाल चतुर्वेदी की कविता पढ़, अक्सर उन्हें
याद कर नमन करते रहे हैं।

गौरी शंकर राय ने स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती देने के लिए पत्रकारिता
के माध्यम से लड़ी लड़ाई

साल 1866 में भयंकर अकाल के समय अंग्रेजों का पोल खोलने और
ओडिशा के नौजवानों को जागरूक करने के लिए गौरी शंकर राय ने
पहली ओड़िया पत्रिका उत्कल दीपिका प्रकाशित की थी। कहा जाता है
कि इस अकाल से ओडिशा के विभिन्न भागों में उस समय दस लाख से
अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी। उस समय लोगों को लगा कि यदि हम
स्वतंत्र होते तो इस तरह अकाल का सामना नहीं करना पड़ता। ऐसे में
वहां स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई बढ़ती गई। इसी अकाल के दौरान गौरी
शंकर राय और बाबू बिचित्रनंदा दास ने उड़िया भाषा में उत्कल दीपिका
पत्रिका छापना आरंभ किया। इससे लोग जागरूक होने लगे और उन्हें
पता चलने लगा कि इस अकाल का असल कारण क्या है। 13 जुलाई

1838 को कटक में जन्मे गौरी शंकर राय की अगुवाई में पहली बार यह
पत्रिका 4 अगस्त 1866 को उड़िया भाषा में प्रकाशित हुई और यही
कारण है कि इस तारीख को उड़िया पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है।
जब ओडिशा विभिन्न प्रकार की कठिनाईयों का सामना कर रहा था उस
समय स्वतंत्रता की हवा को और मजबूती देते इस पत्रिका ने राज्य में
अकाल और गरीबी की बातों को छापना शुरू कर दिया। राष्ट्रवाद पर
आधारित इस पत्रिका के माध्यम से गौरी शंकर राय ने भारतीयों के हित
में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। पत्रिका में वह अंग्रेजों के खिलाफ बातें
लिखते थे और उनके समक्ष लोगों की मांग रखते थे। साथ ही वह
पत्रिका में बाढ़ जैसे प्राकृतिक आपदा को रोकने के लिए अपने सुझाव भी
प्रकाशित करते थे। बाद में उन्हीं से प्रभावित होकर शशिभूषण रथ 1913
में बरहमपुर से दैनिक ओड़िया पत्रिका छापने लगे और गोपाबंधु दास ने
सत्यबती नामक पत्रिका उड़िया साहित्य को बढ़ावा देने शुरू किया। इस
पत्रिका के प्रकाशन के लिए उन्होंने कटक में एक प्रिंटिंग प्रेस की
स्थापना की जिसका नाम कटक प्रिंटिंग कंपनी था। जब अंग्रेज बाइबल
छाप कर घर-घर पहुंचाने के काम में लगे थे उसी समय वह अपनी
प्रिंटिंग कपंनी में ओड़िया भाषा में महाभारत, रामायण और प्राचीन धर्म
ग्रंथों का प्रकाशन कर रहे थे। ब्रह्म समाज से जुड़े रहने वाले गौरी शंकर
राय ने राज्य में संगीत और नाटक को बढ़ावा देने में भी अहम भूमिका
निभाई और समाज के सांस्कृतिक उत्थान में भी महत्वपूर्ण योगदान
दिया।

Ramswaroop Mantri

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