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हरित भविष्य : किसकी चलेगी दुनिया में?

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कुमार सिद्धार्थ

आज की दुनिया ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ जलवायु संकट मानव सभ्यता के भविष्य को तय करने वाला बड़ा प्रश्न बन चुका है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि कोयला, तेल और गैस पर हमारी निर्भरता जल्द कम नहीं हुई तो धरती का तापमान ऐसे स्तर तक पहुँच जाएगा, जहाँ जीवन की वर्तमान संरचनाएँ टिक नहीं पाएँगी। इसके बावजूद वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आज भी जीवाश्म ईंधनों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। इस पूरी व्यवस्था की भयावह बात यह है कि जब कोई सरकार पर्यावरण और जनता के हित में कदम उठाने की कोशिश करती है, तो उसे ‘न्याय’ के नाम पर दंडित किया जाता है।

पिछले कुछ दशकों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश समझौतों के ज़रिये एक ऐसा कानूनी ढांचा खड़ा किया गया है, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सरकारों पर मुकदमा कर सकती हैं। इसे ‘निवेशक–राज्य विवाद निपटान प्रणाली’ (आईएसडीएस) कहा जाता है। इसके तहत यदि कोई सरकार पर्यावरण, स्वास्थ्य या सामाजिक हित में ऐसा निर्णय लेती है, जिससे किसी कंपनी के मुनाफे पर असर पड़ता है, तो वह कंपनी सरकार से न केवल अपने निवेश की भरपाई, बल्कि ‘संभावित भविष्य के मुनाफे’ का भी दावा कर सकती है। ये मुकदमे सामान्य अदालतों में नहीं, बल्कि गुप्त ट्रिब्यूनलों में चलते हैं, जहाँ न पारदर्शिता होती है, न जनता की भागीदारी और न ही लोकतांत्रिक जवाबदेही।

यह व्यवस्था अपने आप में लोकतंत्र के लिए एक गहरा खतरा है। सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं, ताकि वे जनता और पर्यावरण के हित में फैसले लें। लेकिन आईएसडीएस जैसे प्रावधानों के कारण वही सरकारें कंपनियों के डर से पीछे हटने लगती हैं। आईएसडीएस की मार सबसे पहले उन देशों पर पड़ी है, जिन्होंने पर्यावरण और जनता के हित में साहसिक फैसले लिए। जर्मनी ने जब परमाणु ऊर्जा से बाहर निकलने का निर्णय किया तो ऊर्जा कंपनी वाटनफॉल ने उस पर अरबों यूरो का दावा ठोक दिया। पाकिस्तान ने एक खनन परियोजना को पर्यावरणीय कारणों से रोका तो उस पर छह अरब डॉलर से अधिक का जुर्माना लगाया गया, जो उसके पूरे शिक्षा और स्वास्थ्य बजट से भी ज़्यादा था। स्लोवेनिया में एक ब्रिटिश कंपनी को केवल यह कहने पर कि फ्रैकिंग से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन ज़रूरी है, सरकार पर 120 मिलियन यूरो का मुकदमा कर दिया गया और अंततः सरकार को झुकना पड़ा। कोलंबिया में आदिवासी समुदायों के संघर्ष से एक कोयला खदान परियोजना रुकी, लेकिन कंपनियों ने ब्रिटेन–कोलंबिया संधि के तहत सरकार से मुआवज़ा वसूल लिया।

इन उदाहरणों का खतरनाक असर यह है कि सरकारें पर्यावरण बचाने से पहले अब यह सोचने लगती हैं कि कहीं उन्हें अंतरराष्ट्रीय अदालतों में अरबों डॉलर का हर्जाना न भरना पड़ जाए। इसे ‘रेगुलेटरी चिल’ कहा जाता है, यानी कानून बनाने की हिम्मत तो रहती है, मगर उन्हें लागू करने का साहस नहीं बचता। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ ने इस व्यवस्था को ‘कानूनी आतंकवाद’ निरूपित किया है, क्योंकि यह सरकारों को डराकर लोकतांत्रिक फैसलों को पलटने का हथियार बन चुकी है।

लेकिन यह प्रक्रिया केवल कानूनी तंत्र तक सीमित नहीं है। इसका एक और, उससे भी अधिक क्रूर रूप वेनेजुएला में देखने को मिलता है। वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं। लंबे समय से यह देश अमेरिकी साम्राज्यवाद और वैश्विक तेल कंपनियों की नज़र में खटकता रहा है, क्योंकि उसने अपने तेल संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की। अमेरिका ने वहाँ की निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने के लिए आर्थिक प्रतिबंध लगाए, उसकी अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने की कोशिश की और खुले तौर पर सत्ता परिवर्तन की राजनीति चलाई। तेल के लिए एक संप्रभु देश के लोकतंत्र को कुचल देना और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियाँ उड़ाना यह दिखाता है कि जब संसाधनों का सवाल आता है, तो लोकतंत्र और मानवाधिकार कितने बौने साबित हो जाते हैं।

अब सवाल यह है कि भारत इस पूरी तस्वीर में कहाँ खड़ा है? क्या हम खुद को इस खतरे से सुरक्षित मान सकते हैं? शायद नहीं। भारत आज तेज़ी से वैश्विक पूंजी और निवेश के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। कोयला खनन, तटीय औद्योगिक परियोजनाएँ, परमाणु संयंत्र, बड़े बाँध, तेल और गैस की खोज ये सभी क्षेत्र पहले से ही पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को लेकर विवादों में घिरे हुए हैं। यदि भविष्य में भारत ऐसे निवेश समझौतों का हिस्सा बनता है, जिनमें आईएसडीएस जैसे प्रावधान होंगे, तो हमारी सरकारों पर भी वही दबाव आएगा, जो आज कई अन्य देशों पर है।

भारत में पर्यावरणीय मंज़ूरी की प्रक्रियाओं को “विकास में बाधा” बताकर कमजोर किया जा रहा है। कई बार परियोजनाओं को तेजी से मंज़ूरी देने के लिए नियमों में ढील दी जाती है, जनसुनवाई को औपचारिकता बना दिया जाता है और स्थानीय लोगों की आपत्तियों को अनदेखा कर दिया जाता है। यदि इसके ऊपर अंतरराष्ट्रीय मुकदमों का डर भी जुड़ गया, तो पर्यावरण संरक्षण लगभग असंभव हो जाएगा। तब सरकारें जनता और प्रकृति के नहीं, बल्कि निवेशकों और कंपनियों के प्रति जवाबदेह होंगी।

भारत जैसे देश के लिए यह विशेष रूप से खतरनाक है, क्योंकि यहाँ विकास की कीमत पहले गरीब, आदिवासी और हाशिए पर पड़े समुदाय चुकाते हैं। जंगलों से विस्थापन, खनन से प्रदूषण, नदियों के सूखने और ज़मीन के बंजर होने से उनकी आजीविका छिन जाती है। यदि सरकारें अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर पर्यावरणीय फैसलों से पीछे हटने लगेंगी, तो इन समुदायों के अधिकार पूरी तरह कुचल दिए जाएँगे।

वेनेजुएला का उदाहरण और आईएसडीएस जैसी कानूनी व्यवस्थाएँ मिलकर यह साफ कर देती हैं कि आज का वैश्विक तंत्र संसाधनों की रक्षा के नाम पर नहीं, बल्कि संसाधनों की लूट को वैध ठहराने के लिए खड़ा किया गया है। एक तरफ़ कहा जाता है कि दुनिया को जलवायु संकट से बचाना है, दूसरी तरफ़ उन कंपनियों को कानूनी और राजनीतिक संरक्षण दिया जाता है जिनका अस्तित्व ही इस संकट को गहराने पर टिका है।

भारत को इस पूरे परिदृश्य से गंभीर सबक लेना चाहिए। हमें ऐसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते से सावधान रहना होगा जो हमारी लोकतांत्रिक संप्रभुता और पर्यावरण संरक्षण की क्षमता को कमजोर करता हो। संसद को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह व्यापार और निवेश समझौतों की पूरी तरह समीक्षा करे, उन पर बहस करे और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें अस्वीकार भी कर सके।

भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह संदेश देना चाहिए कि जलवायु कार्रवाई को ‘निवेशकों के अधिकार’ के नाम पर कुचला नहीं जा सकता। पर्यावरण रक्षा कोई आर्थिक बाधा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न है। यदि सरकारें डर और दबाव में आकर सही फैसले नहीं ले पाएँगी, तो लोकतंत्र केवल एक खोखला ढांचा बनकर रह जाएगा। भारत जैसे देशों के लिए यह समय चेतने का है। विकास का अर्थ केवल जीडीपी बढ़ाना नहीं, बल्कि जीवन, पर्यावरण और लोकतंत्र की रक्षा करना भी है।

कुमार सिद्धार्थपिछले चार दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय है। आप पर्यावरणशिक्षासामाजिक आयामों पर देशभर के विभिन्‍न अखबारों/पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं। 

Ramswaroop Mantri

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