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सत्ता के कर्णधार कटुयथार्थ से डरते क्यों है ?

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निर्मल कुमार शर्मा,

संस्कृति और साहित्य दोनों समाज के दर्पण होते हैं,साहित्य मतलब कहानियों,लेखों, उपन्यासों, कविताओं आदि और संस्कृति मतलब नाटकों,रूपकों,लोकसंगीतों,लोकनृत्यों, पारंपरिक गीतों के ही रूप हैं। इन दोनों विधाओं में तत्कालीन समाज में घटित हो रही विकृतियों, विसंगतियों,व्यभिचारों,शोषण,जातिवादी और धार्मिक वैमनस्यताओं तथा शासकों द्वारा जनता पर किए जा रहे जुल्मों और उनके द्वारा बोलेजाने वाले अंतहीन झूठ आदि का पर्दाफाश व वर्णन ही साहित्य व संस्कृति होती है।

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इसीलिए असली साहित्यकार,कवि,लोकगायक,रंगकर्मी,नाट्यकर्मी आदि जो समाज और राजनीति की विद्रूपताओं को निर्भीकता से अनावृत कर रहे होते हैं,वे कभी भी सत्ता के कर्णधारों को नहीं सुहाते,चाहे जातिवादी दंंश से मर्माहत भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जानेवाले,निरक्षर भिखारी ठाकुर हों या विद्वान राहुल सांकृत्यायन हों या असमय अपने प्राण गंवाने वाले प्रोफेसर कलबुर्गी हों, कामरेड पानसारे हों,डॉक्टर नरेन्द्र दाभोलकर हों,प्रखर पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हों,गौरी लंकेश हों या बिहार की वर्तमान समय की हकीकत बयां करनेवाली ‘बिहार में का बा ?’ और अब ‘ यूपी में काबा ? ‘आदि जैसे व्यंग्य लोकगीतों को गाकर वर्तमान समय की सत्ता को सीधे आइना दिखाने वाली ग्रेजुएट युवा लोक-गायिका नेहा सिंह राठौर हों,ये सभी सत्ता के लिए बहुत ही असुविधाजनक व कंटक होते हैं !आज के वर्तमान छद्मावेशी लोकतंत्र में उक्त सभी लोगों का क्रूरतापूर्ण दमन और हत्याएं यह संशय पैदा करने को बाध्य कर देता है कि हम एक ऐसे मॉफिया,बर्बर,क्रूर, अमानवीय,वीभत्स कबीलाई युग में जी रहे हैं,जिसमें हम पर लोकतंत्र के छद्मावेश में क्रूर और बर्बर तानाशाही थोपी जा रही है !

यह भी कटुयथार्थ है कि सत्ता की अपवित्र जुगलबंदी धर्म का लबादा ओढ़े कथित बाबाओं,गुरूओं, धर्माध्यक्ष बने शातिर और अपराधी भेड़ियों से जरूर रहता है,क्योंकि ये कथित धर्माध्यक्ष सत्ता के भेड़ियों के लिए अपने करोड़ों अंभक्त,मूर्ख भक्तों का थोक वोट बैंक का लाजवाब चारा डाल देते हैं,तो उसके बदले सत्ता में आकर सत्तासीन राजनीतिक उनके हर अपराध पर उन्हें अभयदान देने का कुकृत्य कर देतें हैं मतलब भारत जैसे धर्मांध देश में कथित धर्म और कुटिल राजनीति सहजीवन जीने का एक अलिखित सिद्धांत अपनाए हुए हैं,बेचारी देश की जनता पिछले कई सदियों से  मूर्ख और बेबसीभरी जिन्दगी जीने को अभिशापित होती है ! अब समय आ गया है कि भारतीय समाज के प्रबुद्ध लोग सत्ता और कथित धर्म के इस नापाक गठबंधन की बदनीयतभरी चाल को समझें और इनको पूरी तरह अनावत्त कर इनकी नग्न और शातिर चाल को अपनी बुद्धिमत्ता, सजगता और संगठन से तोड़ें ।-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र

Ramswaroop Mantri

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