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*दुनिया भर में क्यों संकट में हैं लोकतंत्र और उसकी संस्थाएँ?*

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स्वदेश कुमार सिन्हा

साठ‌ और सत्तर के दशक में जब दुनिया भर में शीतयुद्ध का दौर था, तब अमेरिका और पश्चिमी दुनिया यह कहती थी, कि‌ उदारवादी लोकतंत्र और मुक्त बाज़ार के लिए साम्यवाद या कम्युनिज्म एक बड़ा ख़तरा है। कई बार तो इसकी तुलना फ़ासिज़्म से भी की गई तथा सोवियत संघ, पूर्वी यूरोपीय देशों तथा चीन आदि देशों में कथित रूप से मानवाधिकारों का उल्लंघन तथा प्रेस की आज़ादी जैसे मुद्दे पश्चिमी दुनिया जोर-शोर से उठाती थी। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद यह घोषणा की जाने लगी कि शीतयुद्ध का अंत हो गया है और उदारवादी लोकतंत्र की हमेशा के लिए जीत हो गई है।

अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान रेड कॉर्पोरेशन से जुड़े एक समाजशास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा ने तो इतिहास के अंत तक की घोषणा कर दी और कहा कि पश्चिमी उदारवादी लोकतंत्र की हमेशा के लिए जीत हो गई है, परन्तु यह अवधारणा बहुत जल्दी ही ध्वस्त हो गई। आज दुनिया भर में लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं का बहुत तेजी से पतन हो रहा है। यूरोप-अमेरिका सहित सारी दुनिया में दक्षिणपंथी फासीवाद बहुत तेजी से हावी हो रहा है। केवल भारत ही नहीं दुनिया में हर जगह लोकतांत्रिक चुनाव संदिग्ध होते जा रहे हैं, उनमें हेराफेरी करके जनमत की इच्छा का अपहरण किया जा रहा है।‌ अभी आई एक ताजा रिपोर्ट में इस तथ्य का बहुत अच्छी तरह से खुलासा किया गया है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक रुझानों के अनुसार पिछले साल दुनिया भर में लोकतंत्र कमजोर हुआ है। स्टॉकहोम स्थित थिंक टैंक इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (आईडीईए) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट “द ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी 2025” ने 2024 में 173 देशों के लोकतांत्रिक प्रदर्शन का विश्लेषण किया। रिपोर्ट के मुताबिक 94 देशों में यानी आधे से अधिक में 2019 और 2024 के बीच कम से कम एक प्रमुख लोकतांत्रिक संकेतक में कमी देखी गई।

आईडीईए के महासचिव केविन कैसास जमोरा ने कहा, “दुनिया में लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति चिंताजनक है।” 2019 की तुलना में सबसे बड़ी गिरावटों में से कुछ विश्वसनीय चुनावों के आयोजन, न्याय तक पहुँच और सक्रिय संसद से संबंधित मामलों में देखी गई। अफ्रीका 33 प्रतिशत वैश्विक गिरावट के सबसे बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार था, इसके बाद यूरोप 25 प्रतिशत के साथ है। पश्चिम एशिया को लोकतांत्रिक प्रदर्शन के मामले में सबसे निचले स्तर पर रखा गया।

बोत्सवाना और दक्षिण अफ्रीका जैसे कुछ सकारात्मक उदाहरणों पर भी प्रकाश डाला गया है, जिन्होंने पारदर्शी चुनावों में निरंतर प्रगति दिखाई है। 2024 में दोनों देशों के चुनावों के साथ ऐतिहासिक बदलाव हुए।

अध्ययन में शामिल डेनमार्क एकमात्र ऐसा देश था, जो सभी पाँच लोकतांत्रिक श्रेणियों में शीर्ष पर रहा, इनमें प्रतिनिधित्व, कानून का शासन, भागीदारी और अधिकार शामिल हैं। इन रैंकिंग में ज्यादातर जर्मनी, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और लक्जमबर्ग जैसे यूरोपीय देश शामिल थे, जबकि कोस्टा रिका, चिली और ऑस्ट्रेलिया ने भी अच्छा प्रदर्शन किया।

केविन कैसास जमोरा के अनुसार,”प्रेस फ्रीडम में बहुत तेज गिरावट” देखने को मिली है। 2019 और 2024 के बीच दुनिया ने “पिछले 50 वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट देखी।” सभी महाद्वीपों के 43 देशों में प्रेस फ्रीडम में गिरावट आई, जिसमें अफ्रीका के 15 और यूरोप के 15 देश शामिल थे। हमने कभी भी लोकतंत्र के स्वास्थ्य के एक महत्वपूर्ण संकेतक में इतनी गंभीर गिरावट नहीं देखी है।” अफगानिस्तान, बुर्किना फासो और म्यांमार, जो पहले से ही मीडिया में सबसे कमजोर प्रदर्शन पर थे, सबसे अधिक प्रभावित थे, इसके बाद दक्षिण कोरिया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण कोरिया में सरकार और उसके राजनीतिक सहयोगियों ने पत्रकारों के खिलाफ़ मानहानि के मामलों को बढ़ा दिया और पत्रकारों के घरों पर छापा मारा।

इस रिपोर्ट में जनवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के सत्ता संभालने से पहले के डाटा को शामिल किया गया है, लेकिन रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है,कि “आईडीईए ने ऐसे उदाहरण दर्ज किए हैं, जिनमें ट्रंप प्रशासन ने उन नियमों, संस्थानों और परंपराओं को क्षतिग्रस्त और समाप्त कर दिया जिन्होंने अमेरिकी लोकतंत्र को आकार दिया है।” अमेरिका प्रतिनिधित्व के मामले में 35वें और अधिकारों के मामले में 32वें स्थान पर है, जो अन्य ओईसीडी देशों के पीछे है। इसका स्कोर साझेदारी के मामले में अधिक है और इस श्रेणी में वह छठे स्थान पर है। केविन कैसास जमोरा ने कहा, “पिछले साल के अंत में और 2025 के शुरुआती महीनों में हमने चुनावों के दौरान जो कुछ देखा था, वह विशेष रूप से परेशान करने वाला था।” उन्होंने कहा, “चूँकि अमेरिका में जो होता है, वह दुनिया पर भी प्रभाव डालता है, यह विश्व स्तर पर लोकतंत्र के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है।”

यद्यपि इस रिपोर्ट में भारत की सीधी चर्चा नहीं है, लेकिन अगर हम इन संकेतकों का विश्लेषण करें, तो भारत की स्थिति भी बहुत खराब है। हमारे यहाँ लोकतंत्र पर भारी ख़तरा मौजूद है। लोगों के जनवादी अधिकारों का हनन हो रहा है, प्रेस की स्वतंत्रता और सोशल मीडिया को लगातार बाधित किया जा रहा है। चुनाव की निष्पक्षता लगातार संदेह के घेरे में है।

(स्वदेश कुमार सिन्हा लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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