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स्वयंभू आदिवासी नेता भूरिया ने नेमावर कांड पर क्यों साधा मौन .. ?

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भोपाल। इस प्रदेश का दुर्भाग्य है कि चाहे सत्ता कांग्रेस की हो या भाजपा की जब-जब किसी समाज पर दबंगों द्वारा अत्याचार किये जाते हैं तो उसी समाज से जुड़े लोग उस मामले में कुछ भी बोलने से चुप्पी क्यों साध लेते हैं? इसी बात को लेकर इन दिनों राजनैतिकों में वर्षों तक आदिवासी नेताओं के हक पर डाका डालने वाले स्वयंभू आदिवासी नेता होने का ढिंढोरा पीटने वाले कांतिलाल भूरिया और उनके वह डॉक्टर पुत्र विक्रांत भूरिया जिनके हाथों में आजकल युवक कांग्रेस की कमान है, वह क्यों नेमावर कांड जैसे मामले पर मौन साधे हुए हैं?

लोग इन दोनों स्वयंभू आदिवासी नेताओं के इस तरह के रवैये से को लेकर उसका हल खोजने में लगे हुए हैं यह सभी जानते हैं कि प्रदेश के आदिवासी वर्ग के स्वयंभू नेता बनकर भूरिया वर्षों तक झाबुआ की राजनीति करते रहे हैं उनकी राजनीति के चलते जहां झाबुआ ही नहीं बल्कि धार, बड़वानी, अलीराजपुर सहित आसपास के तमाम आदिवासी समाज का कोई नेता उभरकर सामने नहीं आ सका, मजे की बात तो यह है कि जहां आदिवासियों के स्वयंभू पिता-पुत्र की जोड़ी जो अपने आपको आदिवासियों के शुभचिंतक होने का ढिंढोरा पीटते हों लेकिन चाहे झाबुआ सहित प्रदेशभर के आदिवासियों पर जब जब भी अत्याचार हुआ तब-तब कांतिलाल भूरिया मौन धारण करे रहे, जब इस प्रदेश में कमलनाथ की सरकार सत्ता पर काबिज थी तो उस समय शायद सही वजह थी कि इन्हें मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं किया गया क्योंकि कमलनाथ कांतिलाल भूरिया की राजनीति से अच्छी तरह से परिचित हैं,

मजे की बात तो यह है कि आदिवासियों के स्वयंभू नेता होने का वह ढिंढोरा वह पीटते तो हैं लेकिन जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तो उस समय मनमोहन सिंह ने देशभर के आदिवासियों के हितों में वन संरक्षण भूमि को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया था लेकिन अपने ही प्रधानमंत्री के निर्णय का पालन कराने के लिये कांतिलाल भूरिया कभी आगे नहीं आये, क्योंकि वह जानते हैं कि जितना आदिवासियों का विकास होगा उतनी उनकी राजनीति कमजोर होगी, यदि आदिवासी कमजोर रहेगा तो उनके स्वयंभू आदिवासी नेता होने पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं कर पाएगा,

यही वजह है कि उनकी इस तरह की कार्यशैली के चलते आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिये धार और झाबुआ में डॉक्टर हीरालाल अलावा ने जयश की स्थापना कर कांग्रेस और भाजपा की नींद उड़ा दी थी, यही नहीं कमलनाथ सरकार में डॉ. हीरालाल अलावा ने एक बार नहीं अनेकों बार पांचवीं अनुसूची को लेकर कई बार राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र तक लिखे थे, लेकिन जैसे दोनों ही दलों के सत्ता के मुखिया आदिवासी हितैषी होने का ढिंढोरा पीटते हैं वैसा हीरालाल अलावा को अपनी ही पार्टी जिसका उन्होंने बाद में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली थी उसकी सत्ता के मुखिया कमलनाथ ने भी आदिवासियों के हितों और उनके संरक्षण की ओर ध्यान नहीं दिया, जहां तक बात भूरिया की करें तो उन्होंने कभी पांचवीं अनुसूची या आदिवासियों के संरक्षण के लिये कभी कोई मांग उठाने की भी जुर्रत नहीं की आज जब झाबुआ के निकट धार जिले के नेमावर में हुई जघन्य आपराधिक घटना को लेकर प्रदेशभर में कांग्रेस से लेकर हर विपक्षी दल बयानबाजी करने में लगा हुआ है ऐसे समय में कांतिलाल भूरिया और उनके पुत्र डॉ. विक्रांत भूरिया इस मामले में मौन साधे हुए हैं हालांकि कांग्रेस के मध्यप्रदेश आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय शाह ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डालकर भाजपा के आदिवासी विधायकों को नेमावर कांड को लेकर चुप्पी साधे जाने को लेकर प्रश्न उठाये हैं? सवाल यह उठता है कि अजय शाह ने भले ही दलगत राजनीति के चलते भाजपा के आदिवासी विधायकों पर प्रश्न उठाये हों लेकिन सवाल यह भी उठता है कि कांतिलाल भूरिया जैसे अनेकों कांग्रेसी विधायक तो इस मामले पर कुछ भी बोलने से परहेज कर रहे हैं

उनपर भी कुछ लिखने की जुर्रत अजय शाह करते तो बेहतर होता हालांकि अजय शाह ने अपनी पोस्ट में जागो, भाईयों, अब तो जागो? बीजेपी से हिसाब मांगो।। का यह नारा देकर सिर्फ भाजपा विधायकों पर ही सवाल उठाये हैं अच्छा होता कि वह वषों से आदिवासियों का शोषण करने में प्रसिद्धि पाकर स्वयंभू आदिवासी नेता होने का दावा करने वाले पूर्व कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष, सांसद विधायक इन्हीं आदिवासियों की दम पर रहे कांतिलाल भूरिया से यह प्रश्न किये गये होते कि उनकी अपनी स्वार्थ की राजनीति के चलते उन्होंने अपने क्षेत्र के आदिवासी नेताओं ही नहीं बल्कि प्रदेश के आदिवासी नेताओं को कभी आगे नहीं बढऩे दिया और न ही आदिवासी नेताओं के हितों को लेकर कभी उन्होंने कोई मांग उठाई, हाँ यह जरूर है कि ऊलजलूल बयानबाजी करके वह समाचार पत्रों की सुर्खियों में जरूर बने रहते हैं और अपने पिताश्री की कार्यशैली के अनुरूप अब भले ही दिग्विजय सिंह ने प्रदेश के योग्य आदिवासियों के हकों पर डाका डालकर डॉ. विक्रांत भूिरया को युवक कांग्रेस की कमान सौंप दी हो लेकिन जबसे उनके पास युवक कांग्रेस की कमान आई है तबसे लेकर ऐसा भी नहीं लगता कि वह आदिवासियों के हितों के लिये आगे आये हों उसे देखकर तो लोग यही कहते हैं कि पिता की तरह यह भी युवा आदिवासियों के हक पर डाका डालकर स्वयंभू राजनेता बने हैं जबकि इनका पेशा चिकित्सा का है और यदि झाबुआ में जाकर देखा जाए तो यही देखने को मिलेगा कि अपने पिता और उनके प्रभाव के चलते वहां के सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों और कर्मचारियों पर दबाव बनाकर सरकारी अस्पताल के मरीज इनके अस्पताल में भेजे जाकर अपने ही समाज के आदिवासी को लम्बा चौड़ा बिल थमाकर उनका शोषण करने की भी चर्चायें सुनने को मिल जाएंगी? पिता-पुत्र की इस तरह की राजनीति को लेकर झाबुआ से लेकर प्रदेश भर के आदिवासी नेताओं में तरह-तरह की चर्चायें लोग चटकारे करते नजर आ रहे हैं और यह नेता यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि वर्षों तक झाबुआ से आदिवासियों की राजनीति करने वाले कांतिलाल भूरिया ने आदिवासियों का कितना विकास किया यह तो आजादी के बाद से लेकर आज तक झाबुआ जिले के लिये आवंटित राशि और उपयोजनाओं के लिये आवंटित की गई राशि का हिसाब लगाकर ही कि केंद्र व राज्य सरकार द्वारा आवंटित की गई राशि से यदि उसका सही उपयोग होता तो आज झाबुआ किसी महानगर से कम नहीं दिखाई देता

यही नहीं वहां के जो आदिवासी आज फटेहाल घूम रहे हैं वह भी सम्पन्न होते लेकिन लोग यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि यदि कांतिलाल भूरिया के चलते आदिवासी सम्पन्न हो जाता तो स्वयंभू आदिवासी नेता होने का दावा करने वाले कांतिलाल भूरिया और उनके पुत्र विक्रांत भूरिया अपनी राजनीति कैसे चमका पाते? इस सवाल का जवाब भी वहां के लोग खोजने में लगे हुए हैं, यह सभी जानते हैं कि झाबुआ और अलीराजपुर जिसके वह वर्षों तक सांसद रहे हैं इन जिलों में अवैध शराब का कारोबार करने वाले कारोबारी दिन-दूने रात चौगुने पनप रहे हैं लेकिन अवैध शराब के कारोबार पर चाहे उनकी पार्टी की सरकार रही हो या भाजपा की कभी भी उन्होंने अवैध शराब के खिलाफ कोई सवाल तक नहीं उठाया, इसे अपवाद ही मान लें कि उनकी भतीजी कलावती भूरिया ने एक समय अवैध शराब के कारोबारियों के खिलाफ संघर्ष करने की घोषणा की थी लेकिन वह भी अपने चाचा कांतिलाल भूरिया की राजनीति की तरह राजनीति से प्रभावित होकर कुछ दिनों तक बयानबाजी कर सुर्खियां बटोरने के बाद ठीक उसी तरह से मौन साध लिया था जिस प्रकार से शिवराज सिंह की सरकार के कार्यकाल के दौरान इन आदिवासी बाहुल्य जिला झाबुआ और अलीराजपुर के प्रभारी मंत्री होने के नाते जब विश्वास सांरग ने वहां के विश्राम गृह में अधिकारियों और राजनेताओं की एक बैठक बुलाई थी उस बैठक के दौरान अधिकांश उनकी ही पार्टी के नेताओं ने विश्वास सारंग का इस ओर ध्यान आकर्षित किया था कि इन जिलों में अवैध शराब के माफियाओं के प्रभाव के चलते पुलिस द्वारा भाजपा के पंच, सरपंचों और जनप्रतिनिधियों पर झूठे प्रकरण बनाकर जेल में डाल लिया जाता है,

मजे की बात यह है कि आदिवासियों के स्वयंभू नेता कांतिलाल भूरिया की तरह उस बैठक में भाजपा के नेताओं के द्वारा उठाये गये इस मुद्दे पर विश्वास सारंग ने भी चुप्पी क्यों साध ली थी इसको लेकर भी कई दिनों तक तरह-तरह की चर्चायें सुर्खियां में रहीं यह सभी जानते हैं कि धार से लेकर अलीराजपुर और झाबुआ के जिलों में जो भी राजनेता राजनीति करता है वह अवैध शराब के कारोबारियों के साथ गलबहियां कर मसरूफ हो जाते हैं यही नहीं इन जिलों के प्रभारी मंत्रियों और राजनेताओं की शराब कारोबारियों से भागीदारी होने की चर्चायें भी खूब सुर्खियों में रहीं। इन जिलों में अवैध शराब के कारोबारियां के पनपते मायाजाल को स्थानीय लोग कांतिलाल भूरिया को ही दबी जुबान से दोषी मानते हैं? लोग यह भी जानते हैं कि कोरोना जैसी महामारी के संक्रमण के दौर में जब इस प्रदेश में कमलनाथ की सरकार अंतिम पड़ाव पर थी उस समय भी इन्हीं भूरिया के दबाव के चलते इन जिलों के आदिवासियों को बांटे जाने वाले खाद्यान्न में भी जमकर इन्हीं के शुभचिंतकों द्वारा खेल किया गया जिसका खुलासा कमलनाथ सरकार जाने के बाद हुआ तो वहीं अप्रवासी मजदूरों के नाम पर भी जमकर खेल खेला गया बात जहां तक आदिवासियों के स्वयंभू नेता बनने का दावा करने वाले कांतिलाल भूरिया की करें तो यदि जिले के राजस्व विभाग की भूमियों का ठीक से किसी जांच एजेंसी द्वारा जांच करा ली जाए तो इस बात का भी खुलासा होगा कि इन झाबुआ जिलों के नेताओं की बदौलत ने वहां केे कलेक्टरों ने १६५(ख) के अंतर्गत आदिवासियों की भूमि का भी जमकर बंदरबांट करके अपनी स्वार्थपूर्ति कर भजकलदारम् का खेल जमकर खेला,

पर इन सबके बावजूद भी कांतिलाल भूरिया उनके ही जिले में हो रहे आदिवासियों के हकों पर डाका डालने के मामले में भी चुप्पी साधे हुए हैं तो फिर नेमावर कांड की तो बात ही कुछ अलग है क्योंकि नेमावर जघन्य हत्याकांड के मामले में उनकी कुर्सी को हिला देने वाले डॉ. हीरालाल अलावा ने इस मुद्दे को उठाने में अहम भूमिका निभाई है और आज भी वह निभा रहे हैं…?

Ramswaroop Mantri

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