चंचल भू
- नाम ?
- चंचल
- पूरा नाम बोलो
- पुलिस के बच्चे ! इतना ही नाम है तो आगे क्या बोलूँ ?
- क्या बोला , पुलिस का बच्चा ? वह उठने ही वाला था क़ि पर्दे की आड़ में खड़ा कमरा सावधान हो गया और उसने सावधान के स्वर में बोला – दि। वा नजी !
- सर !
- पोलिटिकल मामला है , जल्दी से वारंट बना कर रवानगी दिखा दीजिए , डिपेरिस भेज दीजिए ।
- धारा ?
- गांधी के पीछे है ।
दीवान जी उठे , दीवार से गांधी जी को उठाया , पलट के बग़ल खड़े सिपाही को पकड़ा दिया । पढ़ते जाओ , मैं लिख रहा हूँ
एक सौ चौबीस बी , एक सौ बीस ये , - सर सब लगेगा ? डी आइ आर भी ?
- सब लगेगा जितना लिखा है सब लगेगा
और दर्जन भर धाराओं के साथ एक रस्सी में बांध दिया गया पहले कमर , फिर दोनो हाथ और रस्सी का दूसरा सिरा सिपाही की कमर में बांधा गया । इस तरह पाँच सिपाहियों के साथ हमारा जूलूस चला भेलूपुर से कचहरी तक पैदल ।
- ये कहाँ तक पैदल ले चलोगे भाई ?
- कचहरी तक !
-दस किलो मीटर पैदल ? - हवाई जहाज़ से चलोगे ?
यार रिक्सा वग़ैरह कुछ कर लो - भाड़ा तुम दोगे की तुम्हारा
बाप ही बोलता , लेकिन तब तक पीछे से एक पुलिस की जीप आ गयी । ए सी पी पी पी सिंह बैठे थे , पूर्व परचित थे लेकिन दिल्ली ने हवा का रुख़ बिगाड़ दिया था , आपातकाल पुलिस को शहंशाह बना दिया था, लेकिन आँख का पानी मरा नही था , गाढ़ा ज़रूर हो गया था , वरना हम बग़लगीर होते, लेकिन दिल्ली ?
पूरे कायनात में ख़ौफ़ था , पुलिस भी खौस से बाहर नही थी – कोई शिकायत न हो जाय ! – पीछे बैठाओ , तुम लोग भी बैठ जाओ । भेलूपुर में मट्टू पांडे का घर है , लबे सड़क दोनो तरफ़ सहमी आँखों का बिखरा मजमा हमे इस नज़र से देख रहा था जैसे हम भगत सिंह हैं और फाँसी के फंदे पर लटकाने के लिए ले जा रहा है । उन आँखों का प्रतिविंब हमे उत्साह दे रहा था ।
लेकिन सवारी ने सब बिगाड़ दिया ।
यह 75 की गिरफ़्तारी थी । इसके पहले गिरफ़्तारी का इतिहास शुरू होता है 67 भाषा आंदोलन से । अपनी जेल ज़िंदगी का रिकार्ड़ निकालूँ तो यकीनन महात्मा गांधी , पंडित नेहरु , डॉक्टर लोहिया , से ज़्यादा बार जेल गया हो ऊँगा । यह बात दीगर है क़ि कितने दिन जेल में रहा हूँ इसका हिसाब निश्चित रूप से हमारे इन पुरखों से बहुत कम होगा । और जहां तक यातना की बात है , तो गिरफ़्तारी के बाद जो यातना हमारे हिस्से में आनी चाहिए उसे हमारे ये पूजनीय पुरखे भोग गये हैं , हमारे हिस्से में तो जेल यातना की जगह पिकनिक का सुख दिया है । कुछ एक छिटपुट घटनाओं को छोड़ दिया जाय तो आज़ादी के बाद कांग्रेसी निज़ाम ने हमे जितनी बार जेल में डाला उससे ज़्यादा बार खुद मुक़दमा वापस लेकर बाहर निकाला है । IPC की हर सम्भव धारा जो किसी वैचारिक विरोधी पर लगाया जा सकता है सब लगा है हम लोंगो पर । 144.से लेकर 124 तक ,सब । सबसे बड़ी जेल यात्रा रही आपातकाल की , तक़रीबन दो साल और सबसे छोटी सजा रहती थी “ अदालत उठने तक “ । और अदालत उठने तक कहने के बाद अदालत खुद उठ जाती थी , बुदबुदाते हुए क़ि जाओ भाई जान छोड़ो सुबह से एक चाय तक नही मिली है ।
“ यह अदालत उठने तक की सजा “ या “एक दिन की साधारण सजा “ अपराधियों की ओर से माँगी गयी सजा होती थी । इन अपराधियों में तमाम युवजन सभाई मिलेंगे । श्याम कृष्ण पांडे , सतीश जायसवाल , विनोद दुबे , देव्वरत मजूमदार pro राजकुमार जैन , रमा शंकर सिंह , मार्कण्डेय सिंह , राम वचन पांडे , गणेश दीक्षित , कल्पनाथ राय , जगदीश शीवास्तव , मोहन प्रकाश , राधेश्याम सिंह , विजय शंकर पांडे , यह पीढ़ी ज़िंदा है , और इस नयी पीढ़ी से ज़्यादा ज़िंदा दिल है , आज भी इसका दिल जेल के लिए उछलता है ।
ये सब के सब अपने जमाने के “राज द्रोही हैं “ (नीचे तस्वीरें हैं ) पहली तस्वीर हमने रेखांकित किया है यह स्केच है हेनरी डेविड थ्योरो का । अमरीकन दार्शनिक जिसने प्रकृति के नियम की वकालत करते हुए सिविलडिसओबीडीयेंस का नाम करण किया । थ्योरो खुद कहता है यह सिविलड़िसओबीडिएँस तो पहले से ही प्रकृति में उपस्थित है , न्याय प्राकृतिक हो । इस एक शब्द ने दुनिया ही बदल दी । अनेक लोग इस सिविल ड़िस ओबीडिएँस से प्रभावित हुए उसमें टालस्टाय , ज़ार्ज़ बर्नाड शा , मार्टिन लूथर किंग वग़ैरह के अलावा एक और बड़ा नाम है जिसने दुनिया को रोशनी दी उसका नाम है मोहनदास करम चंद गांधी , सिविलनाफ़रमानी को एकऐसा अहिंसक हथियार बना कर , आख़िरी पायदान पर बैठे मजबूर और मज़लूम को सौंप दिया । यह अहिंसक हथियार देकर क्रूर से क्रूर ज़ालिम को घुटने तक झुका देता है । न मारेंगे न मानेंगे ।
छ साल का टैक्स न जमा करने की ज़िद पर थ्योरो अड़ गये । प्रशासन ने जेल भेज दिया । थ्योरो जेल चले गये लेकिन अपनी बात पर अड़े रहे । ये बात दीगर हैकी दूसरे दिन थ्योरो के एक निकट रिश्तेदार ने टैक्स जमा कर दिया और थ्योरो जेल से बाहर आ गये । दोस्तों ने पूछा था – कैसी रही जेल यात्रा ?
थ्योरो ने कहा – हमने उसे जेल माना ही नही ।
अब वहाँ चलिए जब पिछली पोस्ट में हमने लिखा कांग्रेस से समाजवादी कांग्रेस , अपना बड़ा हिस्सा वहीं छोड़ कर एक टुकड़ा बाहर आ गया था । डॉक्टर लोहिया इस इस समाजवादी ग्रुप को कुजात गांधीवादी बोलते थे । डॉक्टर लोहिया का मानना था , गांधी की मृत्यु के बाद भारत का गांधी वाद तीन हिस्से में बँटा १- सरकारी गांधी वादी जिसके नेता पंडित नेहरु बने २- मठी गांधीवादी इसके नेता बने विनोवा भावे और ३- तीसरा कुजात गांधीवादी । तीनो के हिस्से गांधी जी की सम्पत्ति का भी बँटवारा हो गया – पंडित नेहरु को सत्ता , विनोवा को मठ और डॉक्टर लोहिया को राजनीति का परिमार्जन , यानी साफ़ सफ़ाई । चूँकि भारत की सत्ता ही नही , राजनीति भी कांग्रेस यानी पंडित नेहरु के इर्द गिर्द घूमती थी और पंडित नेहरु और कांग्रेस राजनीति के केंद्र बिंदु बन गये इस लिए डॉक्टर लोहिया कांग्रेस के परिमार्जन में लग गये । उस जमाने तक समाजवादी – आंदोलन था , पार्टी थी ही नही , और समाजवादी सिद्धांत के वाहक रहे युवजन । जब जब कांग्रेस एकाधिकार वाद की तरफ़ बढ़ी है या बढ़ने की कोशिश की है समाजवादी आंदोलन ने नकलेल खींचा है । दिलचस्प बात है क़ि कांग्रेस और समाजवादी आंदोलन का आपसी रिश्ता ग़ज़ब का विरोधाभाश लिए हुए है । कई बार इस रिश्ते को पटरी से उतारने के लिए चर्चा चलायी गयी , अटकल लगे की समाजवादी सत्ता में जाना चाहते हैं । अगर सत्ता मोह होता तो पटेल की मृत्यु के बाद कांग्रेस का दरवाज़ा समाजवादियों के लिए , और सदैव के लिए खोल दिए गये । पंडित नेहरु के ख़त जो उन्होंने अपने अज़ीज़ राममनोहर या जे पी को लिखे हैं बहुत भावुक और मार्मिक हैं , उन खातों को पढ़ कर रोनाआता है जब पंडित नेहरु लिखते है प्रिय राममनोहर ! अब तुम देखने में कैसे लगते होगे , वही लापरवाही , वहाई अक्खड़ पन , बहुत दिन हुआ तुम्हें देखे हुए । रात रात भर दोनो बतिआते हैं सुबह नहर रेट कम हो का आंदोलन शुरू होता है डॉक्टर लोहिया जेल में ।
युवजन सड़कों पर ।
दम है कितना दमन में तेरे
देख लिया फिर देखेंगे ॥
बापू ज़िंदा है न ! सिविल नाफ़रमानी । उनके हत्यारे ख़ंजर की बाज़ार सजा रहे हैं । अकेला गांधी चलेगा । आकाश में केवल धुन गूंजेगी – जदी केऊ डाक शुने ना तोर , इकला चलो
लेख पढ़कर 56 साल पहले हुई गिरफ्तारी याद आ गई
चंचल भाई नमस्कार
तुम्हारा लेख पढ़कर 56 साल पहले हुई गिरफ्तारी जिसमें डॉ राम मनोहर लोहिया के साथ दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद था से लेकर अनेकों बार की गिरफ्तारी ओं के मंजर आंखों के सामने घूमने लगे फिलहाल एक रोचक गिरफ्तारी का जिक्र करना जरूर चाहूंगा
एक बार दिल्ली के समाजवादियों ने तय किया कि दिल्ली के मशहूर मॉडर्न स्कूल बाराखंबा रोड जो कि उस जमाने का बड़े लोगों के साहबजादो का स्कूल था उस पर प्रदर्शन किया जाए उन दिनों नारा लगता था डॉक्टर लोहिया का अरमान सबको शिक्षा एक समान राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की संतान सबको शिक्षा एक समान उस जमाने में प्रदर्शन होने से पहले ही दिल्ली पुलिस अपने साजो समान लोहे की बंद लारी अश्रु गैस लाठी वगैरह से लैस होकर मुस्तैदी के साथ प्रदर्शन स्थल पर तैनात मिलती थी और क्योंकि यह हिंदुस्तान के बड़े मालदा रो सियासतदानो अफसरों के बच्चों के पढ़ने का स्कूल था इसलिए पूरी मुस्तैदी के साथ दिल्ली पुलिस वहां पर तैनात थी
प्रदर्शन का समय दिन के 11:00 बजे निश्चित हुआ था समय से पहले ही कुछ सोशलिस्ट मॉडल स्कूल के गेट पर पहुंच गए थे एक थी हमारी अम्मी जान डॉक्टर सलीमन हालांकि वे पेशे से दाई का काम करती थी पर हम लोग उन्हें अदब से डॉक्टर साहिबा कह कर पुकारते थे उस जमाने के प्रदर्शनों में एक डॉक्टर सलीमन तथा दूसरी हमारे साथी मदनलाल हिंद की माताजी अक्सर हर प्रदर्शन में शामिल रहती थी प्रोफेसर विनय कुमार हमारे नेता थे नारा लगा इंकलाब जिंदाबाद डॉ लोहिया जिंदाबाद कमाने वाला खाएगा लूटने वाला जाएगा नया जमाना आएगा अंग्रेजी स्कूल बंद करो गरीबों के बच्चों की तालीम का इंतजाम करो वगैरा-वगैरा
थोड़ी देर की रस्साकशी के बाद प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर पुलिस की बख्तरबंद गाड़ी में बैठा कर तिहाड़ जेल में ले जाकर बंद कर दिया गया
2 दिन बाद दिल्ली की जज जनक जुनेजा की अदालत में हमको पेश किया गया अदालत की कार्यवाही अभी चली रही थी कि किसी ने अम्मी जान को बताया की इस जज की अभी तक शादी नहीं हुई है यह कुंवारी है ना जाने अम्मी जान को क्या उन्होंने कड़क आवाज में जज को मुखातिब करते हुए कहा बेटी तूघबरा मत तू फैसला हमारे हक में कर दे मैं तेरा निकाह अपने खूबसूरत बेटे विनय कुमार के साथ करवा दूंगी अदालत में सन्नाटा छा गया वैसे भी जज साहिबा बड़े सख्त मिजाज की थी उन्होंने आव देखा न ताव फटाक से 1 महीने की सजा का ऐलान कर दिया
भयंकर गर्मी उन दिनों पड रही थी रात को मोटे मोटे मच्छर खून के प्यासे थे हमारे वरिष्ठ समाजवादी साथी मदनलाल हिंद जी मच्छर काटने पर कहते थे कि विनय कुमार जी की तस्वूर
ंँ मैं शादी हो गई हम बाराती मुफ्त में ही मारे गए रात के अंधेरे में जोर का ठहाका लगता था 28 दिन के बाद जेल से रिहाई हुई रिहाई के hai फिर नारा लगा डॉक्टर लोहिया का अरमान सबको शिक्षा एक समान
राजकुमार जैन





