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क्यों हो रहा है पूजा स्थल एक्ट का विरोध ?

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-सुसंस्कृति परिहार 

यदि माननीय उच्चतम न्यायालय अगामी 12 दिसम्बर को पूजास्थल एक्ट के विरोध में छै याचिकाओं पर सुको में  सुनवाई होगी।यदि अदालत ज्ञानवापी की तरह ही फैसला सुनाती है तो यकीन मानिए देश में खुदाई की सुनामी चल पड़ेगी तब जो हासिल होगा वह बहुत डरावना और कड़वे सच की तरह होगा। 

इससे सबसे ज़्यादा आहत हिन्दू मंदिर होंगे क्योंकि अभी चुप बैठे बौद्ध हज़ारों मंदिरों को तुड़वाकर उन्हें बौद्ध मठ में बदलने सक्रिय हो जाएंगे।वे इस वक्त विश्व के तीसरे बड़े धर्म के अनुयाई हैं। उनकी सक्रियता का भान इसी से हो जाता है कि उन्होंने भारत में हिंदुओं द्वारा कब्जे में लिए बौद्ध मठों की सूची तैयार कर ली है वे भी इस कार्रवाई के लिए याचिका लगा सकते हैं। पुरातत्व विभाग ने यह भी खोज कर ली है कि प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के नीचे बौद्ध तीर्थ स्थली है।

इसीलिए बहुत सोच-समझकर पीवी नरसिंह राव सरकार ने पूजा स्थल एक्ट बनाया था क्योंकि बाबरी आंदोलन शुरू हो चुका था।जिसकी दुखद परिणति बाबरी ध्वंस के रुप में सामने आई।भगवान राम को पंडाल में बैठना पड़ा।अब तो विशाल राममंदिर के निर्माण भी हो चुका है।एक ऐतिहासिक मस्जिद के साथ किया गया ये बरताव

 15अगस्त 1947 और पूजा स्थल अधिनियम की घोर अवज्ञा थी। संविधान में उल्लिखित था कि कोई भी धार्मिक स्थल जहां है उसे हटाया नहीं जाएगा। हालांकि साहिब जी ने तो इसके बाद  कभी कानून की धज्जियां उड़ाते हुए बनारस में कई ऐतिहासिक मंदिर ध्वस्त करा दिए।

बाबरी घटना के बाद जो एक्ट इस बाबत बना उसमे पुराने धर्म स्थलों की सुरक्षा के प्रावधान हैं। तथा तोड़ने वालों के लिए तीन साल की सज़ा का प्रावधान है।

विरोधियों ने पूजा स्थल अधिनियम, 1991 (‘अधिनियम’) की धारा 2, 3 और 4 को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की है। अधिनियम की धारा 3 किसी एक धर्म या संप्रदाय के पूजा स्थल को दूसरे धर्म या संप्रदाय में बदलने को अपराध मानती है। धारा 4 में कहा गया है कि पूजा स्थल का चरित्र 15 अगस्त 1947 को जैसा था, वैसा ही निर्धारित किया जाएगा।

 अब सर्वोच्च न्यायालय 12 दिसम्बर को यह तय करेगा कि क्या पूजा स्थल अधिनियम, 1991, जो पूजा स्थलों को 15 अगस्त, 1947 को उनके धर्म से अलग धर्म में परिवर्तित होने से रोकता है, संवैधानिक रूप से वैध है या नहीं। न्यायालय का यह निर्णय देश भर में अधीनस्थ न्यायालयों के समक्ष लंबित पूजा स्थलों की ‘वास्तविक प्रकृति’ से संबंधित अनेक चुनौतियों की दिशा भी तय करेगा।

यह निर्णय बहुत महत्वपूर्ण होगा क्योंकि यदि यह अधिनियम मान्य होता है तो ज्ञानवापी से लेकर मथुरा,संभल अज़मेर शरीफ़ और आने वाले कई विवादित स्थलों को जड़ से ख़त्म कर देंगे यानि यथास्थिति रखेंगे जिससे देश भाईचारे में बढ़ रहे तनाव को ख़त्म किया जा सकेगा।

अब तो आप समझ ही गए होंगे कि भक्तों को इस एक्ट पर आपत्ति क्यों है?वे नहीं चाहते देश में मोहब्बत कायम रहे।एक बात यह भी इससे तय होगी कि देश में ध्रुवीकरण की बदौलत बनी सरकार कभी सत्ता के करीब नहीं पहुंच पाएगी।देश राहत की सांस लेगा तथा भारतीय गंगा जमुनी तहज़ीब को को नफ़रत पैदा करने वाले लोग तोड़ नहीं पाएंगे और भारतीय संस्कृति बकौल अल्लामा इक़बाल कुछ बात  है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी को जीवंत रखेगी।

Ramswaroop Mantri

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