~ रीता चौधरी
हमारे संबंध इसलिए नहीं मरते कि हम प्रेम से बाहर आ चुके होते हैं, इसलिए मर जाते हैं कि हमने परवाह करनी छोड़ दी होती है।
देखभाल, परवाह और सँवारने-संभालने को हम घर-गृहस्थी और नौकरी में महत्वपूर्ण मानते हैं पर पता नहीं क्यों रिश्तों, खासकर प्रेम और दोस्ती वाले में इसे दूसरे-तीसरे या फिर अंतिम दर्जे में रख देते हैं।
प्यार हुआ या किया और मान लेते हैं कि अब तो हो गया और फिर हुआ सा ही रहेगा। दरअसल कई लोगों के लिए दोस्ती और प्यार जीवन में एक टिक की तरह ही होता है। हमें टिक लगाने की आदत होती है। प्यार हो गया, साथ आ गए और शादी भी हो गई- अब भला क्या होगा? ऐसे सोचने की आदत भी हममें ज्यादा लोगों की है।
क्या बार-बार याद दिलाना और फिल्मी तरीके से जताते रहना जरूरी है? शायद नहीं! तरीका फिल्मी
लेकिन प्यार और दोस्ती की देखभाल और साज-संभाल भी जरूरी है। हम एक बार जुड़ गए लेकिन क्यों जुड़े हम। दो लोग जब एक दूसरे से जुड़ते हैं तो दोनों की जरूरतें होती हैं।
अब जरूरत या need को इतना नकारात्मक रुख देने की जरूरत नहीं कि इसकी मनाही कर दी जाए। जरूरत तो होती है। वह मनाही के बाद, छिपाव के बाद और विकराल हो जाती है इसलिए स्वीकार से शुरू करें तो बेहतर। किसी की जरूरत प्यार को जताने से शुरू होती है और किसी के मौन से। लाड़-दुलार, पैम्परिंग किसे भली नहीं लगती? कोई शब्दों के रूप में रुई का फाहा चाहता है तो कोई शब्द के बगैर साथ से भी संतुष्ट रहता है।
हाँ! तो जरूरतें सबकी होती हैं। सबसे पहले जरूरी होता उनका स्वीकार और फिर उनको कह-जता देना। आप साफ-साफ कह कर कई बातों को बिगड़ने से पहले बचा सकते हैं। झेंप तो होती है पर बच्चा मां-बाप से कहता है न कि उसे क्या चाहिए, हम घर में सामान की जरूरतों की लिस्ट बनाते साझा करते हैं न?
फिर भावात्मक जरूरतों को कह-सुन लेना इतना मुश्किल नहीं होना चाहिए। मेरी जरूरत है कि मुझे सुना जाए, या अपनी भावनाओं को ठीक शब्दों में कहा जाए या एक hug ही-इसे कहना मुश्किल है। पर कहें तो रिश्ते आसान होंगे।
अक्सर स्त्रियों की बातें, उनकी वेदना और शिकायतें मेरे पास आती हैं कि साथी बदल गए। साथी बेवफ़ा नहीं पर पहले जैसा नहीं। पहले वाला एफर्ट या पहले के भाव नहीं दिखते। पुरुषों द्वारा ऐसा कुछ साझा नहीं किया गया तो मैं उनके बारे में कुछ बता नहीं सकती।
रही स्त्रियों की शिकायतें तो अब सच बात यही कि किसी भी संबंध में पहले वाली आवेगशीलता बाद में बचती नहीं है। पर ठहराव भी तो प्रेम है। उस ठहराव में उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। फिर भी अगर आपको बदलाव और ठहराव से इतनी तकलीफ है कि मन बेचैन रहता है तो कहिए, जताइए, इसे दबा के मत रखिए।
एक ठोस उदाहरण से समझाती हूँ। जब हम किसी से अपनी बात कह रहे होते हैं और वह फोन देखते हुए हमारी बात सुनता/सुनती है और हमारे झुँझलाने पर उसका उत्तर होता है-अरे कुछ नहीं! सुन तो रहे हैं। ऐसे में फिर बात कहने वाला उपेक्षित महसूस करता है.
उसे बोलने का मन नहीं होता। भले सुनने वाला सुन रहा होता हो पर सुनने का यह तरीका नहीं है।
इससे उपेक्षा महसूस होती है। है भी।
अब आपको लगेगा इसमें क्या है? यहाँ कोई दिखावा नहीं है, दोस्तों,प्रेमियों या पति-पत्नी इतना तो होना चाहिए कि सामने वाला समझ जाए कि बात सुनी जा रही, फोन बस किसी काम से देखा जा रहा। क्या इस पर झगड़ा किया जाए? झगड़ा नहीं! पर करीबी संबंधों में भी परवाह और चेष्टा की जरूरत होती है।
सिर्फ कहना काफी नहीं। अपने कार्यों से जताना भी जरूरी है कि परवाह है। अगर इससे कोई आहत हो रहा तो इस पर ध्यान देने की जरूरत तो है न?
आज प्रेम के संबंधों में सिर्फ हॉलीवुड की फिल्मों में ही नहीं, विदेशी समाज में ही नहीं अपने आसपास भी हम देखते हैं कि दोस्ती, प्रेम और विवाह से शुरू किए किसी सुंदर साथ और सफ़र में एक अरसे के बाद लोग या तो विरक्त हो रहे हैं या फिर अलगाव के रास्ते पर चल पड़ते हैं।
कुछ लोग इसे मिड लाइफ क्राइसिस कह देते हैं कुछ किसी और बहाने से कैम्पीटिबिलिटी की कमी बताते। सदा तो नहीं लेकिन अधिकतर प्रेम से बाहर निकल जाने का जो मामला है वह समय पर रिश्ते को खाद-पानी नहीं देने का नतीजा होता है। संबंध की प्रगाढ़ता के बाद उनकी केयर करना छोड़ेंगे तो फिर धीरे-धीरे वे छीज ही तो जाएँगे न।
रिश्ते पौधों से कम तो नहीं। पौधों में आप उनकी प्रकृति, मौसम और मात्रा के अनुरूप पानी, खाद और मिट्टी न दें मर जाते हैं। रिश्ते भी मरते हैं।
इसीलिए एक बार प्यार हो गया, साथ हो गया तो वह सर्वकालिक नहीं होगा जब तक आप उसपर काम नहीं करेंगे, उसकी देखभाल नहीं करेंगे। काम करना दूसरे पर या दूसरे के लिए ही काम करना नहीं होता, अपने पर भी होता है। कई बार अपनी जरूरतें इतनी हावी हो जाती हैं कि सामने वाला चाह कर भी उन्हें शतप्रतिशत पूरी नहीं कर सकता।
प्रेम हो या दोस्ती अपने, सामने वाले और रिश्ते के लिए सतत काम करना पड़ता है नहीं तो अक्सर हमारी शिकायत रहती कि लोग बदल गए। लोग बदलते नहीं बस संबंध सूख जाते हैं।





