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मध्यप्रदेश में गौमाता की मौतों पर सन्नाटा क्यों ?

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*सुसंस्कृति परिहार
अभी कुछ रोज पहले रतलाम से एक खबर आई कि एक मुस्लिम ने गौ माता के पास अपने को हल्का कर लिया। वहां कूड़ा करकट पड़ा हुआ था।उस बेचारे बुजुर्ग की ऐसी धुनाई की गई कि तमाम बुजुर्ग जिन्होने भी देखा दिल दहल गया।उम्र के इस पड़ाव पर इसको साधना आसान नहीं होता। कोई महिला या बुजुर्ग इस ज़रुरत के लिए कहीं भी बैठ जाता है उस तरफ लोग देखते ही नहीं।टोकते भी नहीं। हां ये कहीं कहीं ज़रुर लिख दिया जाता है कृपया यहां——-ना करें।इस शालीनता के बरअक्स रतलाम में मारपीट के साथ सम्बंधित तथाकथित गौभक्त उसकी टोपी गिराता और उसे  लात मरवाता नज़र आता है।कुल मिलाकर बात यहीं आ जाती है कि ये वे लोग हैं जो एक वर्ग विशेष से नफरत करते सर उठाकर घूमते हैं क्या गौमाता से इनका कोई लेना देना नहीं है।यदि गौमाता के प्रति इतना ही प्रेम होता तो भोपाल के बेरसिया वसई गांव के गौसेवा भारती में 850 से अधिक मरने वाली गायों की संरक्षिका निर्मला शांडिल्य का जीना मुश्किल कर दिया होता।जिसने गाय माताओं का भी वर्ग विभाजन कर रखा था दूध देने वाली और अनुपयोगी गाय।दूध देनेवाली गाय माताओं को शेड था चारा,भूसा था और दूसरे वर्ग की गायों की हालत तो इतनी बदतर थी कि उनमें से बहुत ठंड और भूख से मर गईजिनके नसीब में पानी भी नहीं था। पत्रकारों के सामने भी यह सिलसिला जारी रहा है। गायों की मौत पर बेशर्मी से हंसते हुए यह कहा गया कि सरकार अनुदान बहुत कम देती है।एक गाय पर मात्र1.50₹ जबकि पशु चिकित्सा विभाग की जानकारी के मुताबिक प्रति गाय 20₹शासकीय अनुदान आता है।
5 गायों की मौत, लापरवाही के चलते गई जान - CHHATTISGARH XPRESS NEWS

इसके अलावा गौ-शाला  में गोबर, कंडा, खाद एवं मूत्र का व्यवसायिक स्तर पर भी उपयोग हो रहा जिससे गौशालाओं को इन उत्पादों से लाभ भी मिल रहा है प्रदेश सरकार ने गौ-काष्ठ एवं गमलों के लिए एक लाख रूपये प्रति गौ-शाला की राशि भी स्वीकृत की गई है।आर टी आई से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2019में सरकार ने गौ शालाओं के लिए 21.09लाख ₹प्रदान किए थे।एक बड़ी समस्या यहां यह है कि  सरकारी गौवंश रक्षण  केंन्द्रों का फायदा बड़े किसानों के जानवर ले रहे हैं वे यहां नाममात्र का अनुदान देकर अपना भूसा वगैरह ऊंचे दामों पर बेचते हैं जो पशु दूध देने वाले हो जाते हैं उन्हें ले जाते हैं।जिससे उनके दूध का लाभ गौशाला को नहीं मिल पाता । यहां भी राजनीति और निजी लाभ का बोलबाला है। यहां से गौवंश बड़े पैमाने पर स्लाटर हाऊस मुंबई और नागालैंड भेजा जाता है।
मध्यप्रदेश में इक्का-दुक्का केंद्र ही शायद यहां ऐसे हों जहां परित्यक्त गाय  माता की सेवा की जाती होगी।बाकी तो पूरी तरह राजनीति से जुड़े भाजपाइयों के रोजगार केंद्र बन गए हैं।शायद भारत का दुर्भाग्य ही है कि मातावादी इस देश में माताएं ही सर्वाधिक परेशान हैं।हां यहां उन सबकी पूजा का महत्व है लेकिन उपेक्षा और बदहाली में वे अव्वल हैं।भारत को भी माता कहते हैं उसका हाल कितना बुरा है कि उसके बेटों के बीच धर्म और जाति की खाई खोद दी गई है।नदी माता का भी वही हाल है उसके स्वच्छ जल को लोग तरसने लगे हैं। हमारी जननी माता का हाल बुढ़ापे में क्या हो रहा है ये बढ़ते वृद्धाश्रम बता रहे हैं। फिर गौ माता का भला कैसे हो सकता है ?वह तो वोट बैंक है। हिंदू मुस्लिम लड़ाने का साधन बनी हुई है।बहरहाल मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र को बहुत दिनों से हिंदु मुस्लिम कराने की चेष्टा सुराना  रतलाम से लेकर सेंधवा उज्जैन, इंदौर तक की गई लेकिन तमाम लहरें शांत हो गई लेकिन जब आधे हजार के लगभग गायों के साथ इस तरह का जुर्म हुआ तब चारों तरफ सन्नाटा है।याद कीजिए गौमांस के नाम पर कितने जुनैद जान से मारे गए। इतनी गायों की मौत पर हंसती निर्मला शांडिल्य को शर्म भी नहीं आई।ये भाजपा की 2001से सक्रिय कार्यकर्ता हैं।वे ब्लाक अध्यक्ष और मंडी सदस्य भी रही हैं। फिलहाल गौशाला वाली मेडम थीं । उन्हें गौ सेवा भारती के संचालक पद से हटा दिया गया है वहां  का संचालन प्रशासन ने हाथ में ले लिया है।
लेकिन गौ सेवकों और गौभक्तों की यह खामोशी उचित नहीं।यह तो सिद्ध करता है कि गौ सेवा आपका लक्ष्य नहीं  आपको भी सरकार ने सिर्फ एक विशेष उद्देश्य के लिए ही तैयार किया है।इसे समझने की जरूरत है।बच्चे न गौ सेवको आइए ऐसी गौशाला से परिचित कराएं जो वास्तव में सेवा कार्य में लगी हैं ।आज जब गौशालाएं खुद गोमाता पर होने वाले अत्याचारों की साक्षी हैं वहीं माधवबाग के पास बाम्बे पिंजरापोल के हृष्ट-पुष्ट और सेहतमंद 1500 गोवंश किसी भी गोशाला के लिए एक सबक हो सकते हैं। गायों का जिनमें हर एक का अपना नाम है उनका पेट खराब न हो और उन्हें शूगर की बीमारी न लग जाए इसके लिए पिंजरापोल की गायों को बाहर का खाना खिलाना मना है। गोभक्तों के लिए पिंजरापोल से ही घास, अनाज या वहीं बनने वाले लड्डू खरीदना जरूरी है। दो एकड़ हवादार जगह में फैली इस गोशाला के गौवंश में बूढ़ी और परित्यक्त गाएं ही नहीं ज्योतिहीन और विकलांग गाएं भी हैं। दुधारू तो बहुत ही कम। यहां उन्हें अच्छी खुराक और इलाज ही नहीं मिलता बूढ़ी हो जाने पर उन्हें बाम्बे पिंजरापोल ट्रस्ट के ही अन्य केंद्रों में भेज दिया जाता है जहां उनके इलाज के लिए अलग से डाक्टर हैं।घाटकोपर (प.) में श्री रणछोड़ राय मंदिर की गायों की नियमित जांच के लिए भी पशु चिकित्सकों की नियमित ड्यूटी है। अनागांव, भिवंडी श्री गोपाल गोशाला में 450 से ज्यादा गायों में कई खुद उनके मालिकों द्वारा यहां लाकर छोड़ी गई हैं कुछ अवैध कत्लखानों से मुक्त कराई हुई हैं और कई बीमारी और रास्तों में वाहनों से घायल होने के बाद यहां पहुंची हैं। इस गोशाला में मृत्यु के बाद गायों की अंत्येष्टि के लिए एक पुजारी भी है।माटुंगा (पूर्व) के नीलकांत महादेव मंदिर की गौशाला में उनके लिए पंखों की भी व्यवस्था है। संन्यास आश्रम, विलेपार्ले का एक बड़ा आकर्षण तो इसकी गौशाला ही है। चार एकड़ में फैली भायंदर की केशव सृष्टिï की गौशाला अपने सुप्रबंधित गोपालन से एक मिसाल बन गई है। उत्तर प्रदेश में गायों की सेवा में एंबुलेंस भी है।
गौसेवा की जिम्मेदारी निभाएं।बेशक गाय वृक्ष की तरह जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत तक हम सब के लिए उपयोगी है इसलिए उसका दर्जा मां से ज्यादा है।उसकी रक्षा करना हमारा पावन कर्त्तव्य है किंतु गायों के साथ निर्मला की यह ज्यादती हज़ारों हज़ार हत्याओं के बराबर है।उधर मामला दर्ज तो हुआ है पर गौसेवकों का दायित्व है वे उस पर नज़र रखें और कोशिश करें उन्हें इसी तरह की मौत की सज़ा सुनाई जाए जैसा उन्होंने इन बेजुबान गौ माताओं को भूखा प्यासा रखकर मौत के घाट उतारा है। मुख्यमंत्री से भी अपेक्षा है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कराएं और गौमाताओं के साथ  हुए त्रासद व्यवहार की कड़ी सजा मुकर्रर कराने पहल करें।याद रखें यह वक्त भाजपा कार्यकर्ता को बचाने का नहीं। 

Ramswaroop Mantri

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