मुनेश त्यागी
28 मई को मोदी सरकार ने नए संसद भवन का उद्घाटन करने का निर्णय लिया हुआ है। आखिर 28 मई को ही संसद भवन का उद्घाटन करने का निर्णय क्यों लिया गया? इसका मुख्य कारण है हिंदुत्ववाद के प्रतिपादक विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को हुआ था। क्योंकि आर एस एस और भाजपा मुख्य रूप से हिंदुत्ववाद के इर्द-गिर्द रची बसी हुई हैं, इसीलिए हिंदुत्ववाद के प्रतिपादक वी डी सावरकर के जन्मदिन को संसद के नए भवन के उद्घाटन के लिए चुना गया है।
यहां पर सावरकर के बारे में जानना बहुत जरूरी है। सावरकर अपने शुरुआती जीवन में अंग्रेज विरोधी क्रांतिकारी थे। सावरकर ने अंग्रेजों से लड़ने के लिए”अभिनव भारत” की स्थापना की। वे हिंदू मुस्लिम एकता के जबरदस्त हामी थे। वे हिंदू मुस्लिम को भारत की दो आंखें मानते थे। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर उन्होंने एक मशहूर किताब “1857 का भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम” लिखी थी। परंतु बाद में सावरकर ने अंग्रेजों के आगे अपने आप को पूरी तरह से नतमस्तक और समर्पित कर दिया। सावरकर ने द्विराष्ट्र के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया और हिंदुत्ववादी विचारधारा हिंदुत्व शब्द को लोकप्रिय बनाया। 1910 में सावरकर को हत्या के आरोपों में जेल भेजा गया और सन 1911 से ही सावरकर ने अपनी जेल से रिहा होने के लिए अपनी दया याचिकाएं लिखनी शुरू कर दी।
कर्जन वैली जो भारत राज के सेक्रेटरी का सहायक था और जैक्शन, जो नासिक का कलेक्टर था मारे गए थे। इन दोनों हत्याओं में सहायक होने के अपराध में विनायक सावरकर को अंडमान में दो उम्र कैद की सजाएं दी गई थीं। अंडमान निकोबार जेल की कठिन परिस्थितियों ने सावरकर की आत्मा और हौसले को तोड़ कर रख दिया था। जेल की सजा से वे डर गए, खौफजदा हो गए। इन कठिन परिस्थितियों से डरकर सावरकर ने अपनी राजनीतिक यात्रा का रास्ता बदल दिया। उन्होंने सन 1911 से लेकर 1920 तक 5 माफीनामे लिखें। अपने माफी नामों में सावरकर ने भूतकाल में अपने कार्यों को गलत मान कर माफी मांगी। उन्होंने अंग्रेजों की सरपरस्ती स्वीकार कर ली। उन्होंने अंग्रेजों से यह वादा किया कि “वह आगे से ब्रिटिश शासन से सहयोग करेंगे और अंग्रेज जिस तरह भी योग्य समझें, वे उनकी सेवा के लिए तत्पर रहेंगे।”
यहां पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि जेल से रिहा होने के बाद सावरकर को अंग्रेज सरकार से ₹60 प्रति माह पेंशन मिलती थी। सावरकर ने “वीर” की उपाधि अपने आपको स्वयं घोषित की थी। उन्हें यह उपाधि किसी अन्य ने नहीं दी थी। 1923 में लिखे अपने एस्से “हिंदुत्व” और हिंदू कौन” में सावरकर ने स्पष्ट किया था कि इस देश में दो राष्ट्र हैं,,,हिंदू और मुसलमान। ये एक साथ नहीं रह सकते और जेल से रिहा होने के बाद वे सारी जिंदगी, अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीतियों के अनुसार, हिंदू मुसलमान विभाजन की राजनीति करते रहे और भारत की जनता की एकता को तोड़ने के अभियान में लग गए।
हिंदू महासभा के अध्यक्ष के नाते उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन और उसके विभिन्न चरणों का विरोध किया, जो स्वतंत्रता समानता भाईचारा और सामाजिक न्याय पर आधारित थे। सावरकर ने भारतीय संविधान की आलोचना भी की थी। उन्होंने अपने माफी नामों में अंग्रेजों से वादा किया था कि अंग्रेज जैसा चाहेंगे उसी के अनुसार अंग्रेजों की सेवा करेंगे।
19240 में सावरकर पर से अंग्रेज़ सरकार द्वारा रत्नागिरी में नजरबंदी हटाए जाने के बाद, सावरकर 1937 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने। वे संपूर्ण रुप से राष्ट्रीय आंदोलन से अलग-थलग बने रहे, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन के सभी चरणों का विरोध किया था। सावरकर के अनुयाई यह भूल जाते हैं कि जेल से छूटने के बाद उन्होंने कभी भी अंग्रेजों के विरुद्ध बड़े आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया था।
सन 1942 में “भारत छोड़ो और करो या मरो” के आंदोलन में, उन्होंने हिंदू महासभा के अपने अनुयायियों को यह सूचना दी थी कि “वे नौकरी या अपने कार्य करते रहें। ऐसा कुछ भी ना करें जिससे अंग्रेज सरकार को असुविधा हो।” अंग्रेज सरकार के युद्ध अभियान में मदद करने के लिए उन्होंने लाखों हिंदुओं को अंग्रेजी फौज में भर्ती होने के लिए अंग्रेजों की सहायता की थी।
ऐसे कई हिंदू राष्ट्रवादी हैं जो भारत विभाजन के लिए मुसलमान और गांधी को दोषी ठहराते हैं। मगर सच्चाई यह है कि हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग करके बंगाल, सिंध और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में मंत्रिमंडल का गठन किया था और इन दोनों ने मिलकर सरकारी चलाई थी। मजेदार बात यह है कि जब सिंध में हिंदू महासभा मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन की सरकार में शामिल थी तब उन्होंने पाकिस्तान के गठन के लिए समर्थन देते हुए प्रस्ताव पारित किया था।
महात्मा गांधी के नाम की हत्या में भी गोडसे और सावरकर का नाम दूसरे अभियुक्तों के साथ शामिल था। सावरकर पर गांधी की हत्या का मुकदमा चला और इसमें गोडसे को फांसी की सजा दी गई, मगर सावरकर को ठोस और पुख्ता सबूतों के अभाव रिहा कर दिया गया। मगर यह बात बहुत लोगों के गले में नहीं उतरी और यह विवाद जारी रहा। 1970 में गांधी की हत्या में सावरकर की भागीदारी को लेकर जस्टिस जीवनलाल कपूर कमिशन का गठन किया गया जिसकी रिपोर्ट कहती है कि “सारे तथ्यों को एक साथ देखने पर यह बात साबित होती है कि गांधी की हत्या की साज़िश में सावरकर और उसके साथी शामिल थे।”
गांधी जी की हत्या का आरोप सावरकर पर लगाया गया था। इस बारे में सरदार पटेल का स्पष्ट कहना था कि गांधी की हत्या हिंदू महासभा के कट्टरपंथियों द्वारा की गई थी। सरदार पटेल क्योंकि आपराधिक साइड के एक बहुत अच्छे वकील थे। निजी तौर पर वे सावरकर को अपराधी मानते थे, वरना वे सावरकर पर मुकदमा चलाने के लिए राजी नहीं होते। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “सावरकर के नेतृत्व में हिंदू महासभा के कट्टरपंथियों ने यह षड्यंत्र रचा था और उस पर अमल किया था।” बाद में जस्टिस जीवनलाल कपूर ने भी इसी बात को सिद्ध किया कि गांधी की हत्या की साजिश सावरकर ने ही रखी थी।
सावरकर मूल रूप से सांप्रदायिक थे और उन्होंने अपने जीवन का अधिकतम हिस्सा अंग्रेजों की सहायता करने में बिताया। मुस्लिम लीग के साथ मिलकर भारत के विभाजन का तर्क दिया, जो अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की नीति के एक हिस्से के रूप में अंग्रेजों का लक्ष्य और उद्देश्य था। यहां पर यह जानना भी जरूरी है कि आखिर हिंदू राष्ट्र का एजेंडा क्या है?
हिंदू राष्ट्र की अवधारणा भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा के खिलाफ है। भारतीय राष्ट्रवाद औपनिवेशिक युग में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के मूल्यों पर आधारित सभी धर्मों, विभिन्न जातियों, भाषाओं और प्रदेशों के लोगों के समावेशी राष्ट्रवाद के रूप में विकसित हुआ था। भारतीय संविधान में समता समानता स्वतंत्रता और भाईचारे के रूप में स्थापित किए गए थे। हिंदुत्ववादी इन मूल्यों के बिलकुल खिलाफ थे और संविधान के भी खिलाफ थे, उन्होंने संविधान का विरोध किया था और मनुस्मृति को अपना संविधान मानने की बात कही थी।
हिंदू राष्ट्र को लेकर भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि “यदि यदि हिंदू राष्ट्र बनता है तो इसमें कोई शक नहीं कि वह इस देश के लिए सबसे बड़ी विपदा होगी।” धर्म के बारे में अपने समय के बड़े हिंदू महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत में हर एक मनुष्य को समानता का दर्जा प्राप्त होगा, चाहे उसका धर्म कोई भी हो। राज्य पूर्ण रूप से धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए और धर्म राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं है, बल्कि यह ईश्वर और मनुष्य के बीच निजी मामला है और धर्म प्रत्येक व्यक्ति का निजी व्यवहार है। इसे राजनीति या राष्ट्रीय गतिविधियों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
आजादी के बाद हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति भारतीय राष्ट्रवाद के खिलाफ लगातार काम करती रही और वह मुख्य रूप से भारत के मुख्य स्तंभ भाईचारे को तोड़ने के लिए लगातार कार्य करती रही। भारत की तमाम हिंदुत्ववादी ताकतें आज भी भारतीयता के मुख्य स्तंभ हिंदू मुस्लिम भाईचारे के खिलाफ काम कर रही हैं। वे हिंदू मुस्लिम नफरत की मुहिम को जारी रखे हुए हैं। उनका भारत की जनता की समस्याओं रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य गरीबी भ्रष्टाचार महंगाई भुखमरी और आम जनता के विकास से कोई लेना देना नहीं है। आज उनका मुख्य काम भारत की जनता यानी हिंदू मुस्लिम एकता को तोड़ कर किसी भी तरह से सत्ता में बने रहना है।
वे आज अपनी इन्हीं नीतियों के माध्यम से भारत के चंद औद्योगिक घरानों की मदद कर रही हैं, जबकि आम जनता बहुत सारी समस्याओं से परेशान है। आज हमारा समाज सदियों पुराने मूल्यों प्रेम और मेलजोल को नष्ट किए जाने के कारण दुविधा में है, कष्ट में है, परेशानी में है। गरीबी, निरक्षरता, रोजगार, भूख और स्वास्थ्य मुद्दों को नीति निर्माण के हाशिए पर धकेल दिया गया है। समग्र रूप से यह सब हिंदुओं के हितों के खिलाफ है। आम हिंदू जनता इस हिंदुत्ववादी एजेंडे से बेहद परेशान है और जनता की इन समस्याओं को दूर करने के लिए तमाम हिंदुत्ववादियों के पास कोई एजेंडा नहीं है।
ऐसे विवादित व्यक्तित्व के जन्मदिन पर, प्रजातंत्र के मुख्य स्तंभ संसद के नए भवन के उद्घाटन की क्या जरूरत थी? क्योंकि भाजपा और आर एस एस की मुख्य बुनियाद हिंदुत्ववाद है और हिंदुत्ववाद की परिकल्पना और प्रस्तुतीकरण हिंदुत्व के प्रणेता सावरकर ने किया था, इसलिए मोदी सरकार अपने इष्ट देव को कैसे भूल सकती थी? इसीलिए उसने सावरकर के जन्मदिन को चुना है। भारत की जनता पर या विदेशों में इसका क्या असर होगा, इससे इन हिंदुत्ववादी ताकतों को कुछ लेना देना नहीं है।





