अग्नि आलोक
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परिवार का व्यापक स्वरूप

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शशिकांत गुप्ते

वसुधैवकुटुम्बकम का शाब्दिक अर्थ सम्पूर्ण विश्व एक ही परिवार है। इनदिनों यह बार बार याद करना पड़ रहा है।
परिवार एक ही संरक्षण में रहने वाले लोगों के समूह को कहतें हैं। बगैर पति-पत्नी के परिवार सम्भव ही नहीं है।
अपने भारत में जो लोग भारतीय संस्कृति और संस्कारों में पलतें बढतें हैं,वे लोग स्वयं के परिवार के साथ जिस जगह रहतें हैं,उस मौहल्ले को या कॉलोनी को एक परिवार ही मानतें हैं।
भारतीय सुसंस्कारित लोग अपने घर में कार्य करने वाले कर्मचारी चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, को भी परिवार का सदस्य ही मानतें है।
परिवार को व्यापक दृष्टि से समझने की आवश्यकता है।
जहाँ कथनी करनी में भिन्नता होती है,वहाँ दृष्टिकोण व्यापक हो ही नहीं सकता है।
कथनी करनी में फर्क होने का कारण यह निम्न कहावत है।
जाके पांव न फटी बिवाई,
वो क्या जाने पीर पराई

बहुत से लोग सिर्फ उपदेश देतें रहतें हैं। इस संदर्भ में तुलसीबाबा रचित निम्न चौपाई एकदम सटीक है।
पर उपदेश सकल बहु तेरे
जे आचरहिं ते नर न घनेरे

भावार्थ दूसरों को उपदेश देने वाले बहुत मिलेंगे,स्वयं आचरण करने वाले व्यक्ति बहुत कम होतें हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व.लाल बहादुर शास्त्रीजी ने देश में अनाज की कमी को देखते हुए ,देश वासियों से हफ्ते में एक दिन एक समय उपवास रखने का आह्वान किया था। शास्त्रीजी ने पहले स्वयं छः माह उपवास रखा अपने परिवार को उपवास रखने को कहा, बाद में देशवासियों से अपील की।
इस संदर्भ में महाराष्ट्र में जन्में संत तुकारामजी की यह सूक्ति प्रासंगिक है।
आधी केले मग सांगितले
Practise before you Preach
अर्थात दूसरों को धर्म उपदेश देने के पूर्व स्वयं आचरण करना।
इस सुवाक्य को विस्तार से यूँ समझना है।
अपने स्वयं को जिस किसी क्षेत्र में कार्य करना हो,उस क्षेत्र की सूक्ष्मता को समझकर, उस कार्य को सीखना चाहिए। जो कोई व्यक्ति उक्त सम्बंधित क्षेत्र की सूक्ष्म जानकारी प्राप्त कर कार्य करतें हैं, वे लोग उस कार्य में पैदा होने वाली बाधाएं, उन बाधाओं को दूर करने के लिए लगने वाला समय, जानने के बाद यह निश्चित कर लेतें हैं कि, वे स्वयं उक्त कार्य करने के लिए परिपक्व हो गएं है,उपरांत वे दूसरें लोगों को सलाह देने के लिए सक्षम हो जातें हैं।ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। इसीलिए किसी को भी अपना सार्वजनिक वक्तव्य देने पूर्व बहुत गम्भीरता से सोचना चाहिए।
तात्पर्य यही है कि, परिवार को व्यापक स्वरूप में समझना अनिवार्य है।
वर्तमान में देश के दो परिवारों की संपत्ति बेतहाशा बढ़ रही है,क्या यह लोकतंत्र के लिए गम्भीर प्रश्न नहीं है।
परिवारों से समाज बनता है। समाज का व्यापक स्वरूप ही तो एक राष्ट्र होता है।
यहाँ एक सत्य घटना का लेखक जरूरी समझता है।
सन 2005 में लेखक दुबई यात्रा पर गया था। वापस लौटते समय दुबई हवाई अड्डे पर जब हवाई जहाज में बैठने के लिए कतार लगी। तब वहाँ की व्यवस्था संभालने वाले कर्मी ने घोषणा की पहले परिवार वाले जाएंगे। उसका आशय यह था कि जो परिवार के साथ है वे आगे निकल जाएं। यह सुन एक बुजुर्ग सह यात्री ने कहा हमारा भारत एक परिवार ही है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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