
निर्मल कुमार शर्मा
इस दुनिया के प्रत्येक देश,वहां का समाज और हर सभ्यता के लोग अपने अतीत को जानने के लिए बहुत उत्सुक और जिज्ञासु रहते हैं । उनके मनमस्तिष्क में ये बात हमेशा घुमड़ती रहती है,यथा हजारों साल पूर्व इस धरती पर रहनेवाले उनके पूर्वज लोग कैसे रहा करते थे,वे क्या पहनते थे,वे क्या खाते थे,उनकी जीवनशैली और रहन-सहन कैसी थी आदि-आदि बहुत से प्रश्न ? इन्हीं सभी प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए हर देश का पुरातात्विक विभाग अपने देश के ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण जगहों की अत्यंत दक्ष और उच्च मेधावी पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के कुशल नेतृत्व में खुदाई करके हजारों सालों से दफन रहस्यों को उजागर करने का कार्य करते रहते हैं ।

हमारे देश में भी आज से लगभग 7000 या 75000 वर्ष पूर्व अपने उत्कर्ष पर रही सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों को उत्खनन करके उस समय के लोगों के जीवन,उनकी रहन-सहन,खान-पान आदि के रहस्यों को उजागर करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन का कार्य कर रहा है। इसी क्रम में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से मात्र 150 किलोमीटर दूर हरियाणा राज्य के हिसार जिले के राखीगढ़ी नामक स्थान पर आजकल उत्खनन का कार्य पूरे जोर-शोर से कर रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि विश्व विरासत कोष की मई 2012की रिपोर्ट में ‘खतरों में एशिया के विरासत स्थल ‘ में एशिया के 10 स्थानों को अपूरणीय क्षति एवं विनाश का केंद्र माना गया है,उनमें राखीगढ़ी भी क्षति एवं विनाश का एक केंद्र है !
राखीगढ़ी सिंधुघाटी सभ्यता का भारतीय क्षेत्र में सबसे विशालतम् लगभग 350हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तारित व आधुनिकतम् सुविधाओं से सम्पन्न एक बेहद उन्नतिशील महानगर था ! यह प्राचीन शहर सरस्वती नदी की सहायक नदी दृश्वद्वती नदी के किनारे बसा था,जिसे अब घग्घर नदी के नाम से जानते हैं, यहां मारे पार्टी में गुजरात, बंगाल और कश्मीर की कलाकारी दिख रही है, इसलिए निश्चित रूप से यह एक व्यापारिक नगर यहां होगा ! यहां दुर्ग-प्राचीर,अन्नागार, स्नानागार,समुन्नत और बेहद चौड़ी सड़कें,स्तंभयुक्त विथिकाएं,बहुमंजिला इमारतें,मण्डप,पार्श्व में बनी कोठरियां,उत्कृष्ट नगर नियोजन,ऊंचे चबूतरे पर बनाईं गईं अग्नि वेदिकाएं आदि मिलीं हैं ! राखीगढ़ी दुनिया की इकलौती ऐसी अद्भुत और अद्वितीय उन्नत सभ्यता थी,जो सदियों से अनवरत चली आ रही है ! मिश्र और मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताएं विलुप्त होने के बाद पुनः एकबार फिर से बसीं हैं,लेकिन राखीगढ़ी में पुरातात्विक खुदाई में मिले नरकंकाल और वहां वर्तमान समय में रह रहे लोगों के डीएनए सैंपल बिल्कुल एक जैसे हैं ! इसका मतलब भले ही हड़प्पा सभ्यता विलुप्त हो चुकी हो,लेकिन हड़प्पा काल में कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने भौगोलिक बदलावों की अत्यंत दुरूह परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लिए और खत्म होने से बच गए ! पुरातात्विक वैज्ञानिकों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता कभी भी पूरी तरह विलुप्त नहीं हुई ! मतलब हड़प्पाकाल में राखीगढ़ी में 7500वर्ष पूर्व रहनेवाले लोगों के वंशज इस देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से मात्र 150 किलोमीटर दूर हरियाणा राज्य के हिसार जिले के राखीगढ़ी नामक स्थान पर आज भी मजे से रह रहे हैं !
राखीगढ़ी में आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया द्वारा की जा रही खुदाई में हड़प्पा कालीन सभ्यता के समय का बेहतरीन टाउनशिप प्लानिंग दिखाई दे रही है ! इस पुरातात्विक महत्व के उन्नतिशील महानगर में ठीक हर 18मीटर बाद सड़कें बनाईं गईं हैं,इन्हीं सड़कों के साथ नालियां भी हैं,इन्हीं सड़कों पर कुछ-कुछ दूरी पर पानी सोखने के लिए सोक पिट या Soak Pit बने हुए मिले हैं,जिससे ये स्पष्ट हो जाता है कि हजारों वर्ष पूर्व हड़प्पा सभ्यता के युग में भी उस समय के हमारे पूर्वज लोग अपने स्वास्थ्य और स्वच्छता पर अत्यधिक ध्यान देते थे !
यहां एक विशाल मिट्टी के ईंटों के प्लेटफॉर्म पर बना चूल्हा मिला है,जिसके ऊपर एक ब्लोअर भी दिख रहा है,इससे पता चलता है कि यह चूल्हा किसी औद्योगिक इकाई में उत्पादन का कार्य करता रहा होगा ! मिट्टी से बनी दो सीलें मिलीं हैं,जिनपर उस समय की लिपी में कुछ लिखा हुआ है,यहां नाप-तौल के भी स्टैंडर्ड तरीके अपनाए जाने के प्रमाण मिले हैं,यहां कांसे,तांबे और सोने की भी कुछ वस्तुएं मिलीं हैं ! उक्त वर्णित सभी पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं उस समय के समृद्ध व्यापार के तरफ इंगित कर रहीं हैं !
राखीगढ़ी आज से 7000साल पूर्व सिंधुघाटी सभ्यता युग में बसा एक उन्नतिशील महानगर था,वहां कच्ची और पक्की ईंटों से बनी दीवारें मिलीं हैं,कच्ची ईंटें 5000 ईसापूर्व की हड़प्पा काल की हैं तथा पक्की ईंटें 2600ईसापूर्व की मेच्योर हड़प्पा काल को दर्शित कर रहीं हैं ! यहां हो रही खुदाई में सड़कें,आभूषण,पाटरी, खिलौने,बर्तन और शवों के अंतिम संस्कार तक के भी प्रमाण मिल रहे हैं ! टीला नंबर -1 की खुदाई में एक बहुत ही उन्नतिशील स्मार्ट सिटी की झलक मिलती है,अभी तक की खुदाई में वहां 50 के लगभग नर कंकाल मिले हैं,जिनमें दो कंकाल महिलाओं के हैं,इनमें से एक महिला कंकाल की कलाई में एक चूड़ी भी दिखाई दे रही है !
आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया के संयुक्त निदेशक डाक्टर संजय कुमार मंजुल के अनुसार राखीगढ़ी शहर कुल 11टीलों पर बसा एक शहर था,इन्हीं 11टीलों के नीचे पुरातात्विक खुदाई का काम हो रहा है,फिलहाल टीला नंबर -1,3 और 7के नीचे खुदाई का काम चल रहा है। टीला नंबर -1में पुराने शहर के पुरावशेष दिख रहे हैं,पुरातत्वविदों का मानना है कि हड़प्पा कालीन यह शहर बेहद विकसित शहर रहा होगा,इसकी टाऊन प्लानिंग आज की वर्तमान समय की स्मार्ट सिटी की सुनियोजित प्लानिंग जैसी दिख रही है ! यह अतिप्राचीन स्मार्ट शहर नार्थ-ईस्ट,वेस्ट-साउथ के आधार पर बसाया गया था,लेकिन इसमें लगभग 20 डिग्री का आंशिक तौर पर बदलाव है,यानी सीधा-सीधा यह शहर नहीं बसा था !
इस प्राचीन काल के शहर के मकानों की बाहरी दीवारें पक्की ईंटों की बनी हुई हैं,परंतु अंदर की दीवारें कच्ची ईंटों से बनी हुईं हैं,संभवतः ये इसलिए कि बाहरी दीवारें बैलगाड़ी या किसी अन्य कठोर चीज से क्षतिग्रस्त न हो ! इस प्राचीन काल के भारतीय शहर में घरों से निकलने वाले गंदे पानी को सीधे नाली में न गिराकर घरों के चारों कोनों पर सुनियोजित तरीके से गहराई में गड़े घड़ों में गिराकर उसे चरणबद्ध तरीके से नालियों में गिराया जाता था,ताकि कोई कचरा नालियों में जाकर उसे जाम न करे !
टीला नंबर -7में दो महिलाओं के कंकाल मिले हैं हड़प्पा काल में शवों का अंतिम संस्कार बहुत विधि-विधान से किया जाता था,क्योंकि इन दोनों महिलाओं के शवों के पास शेल की चूड़ियां, नित्य प्रयोग करनेवाले बर्तन,तांबे का बना एक आइना,पाटरीज के टुकड़े,कुछ कच्ची मिट्टी के बने मोहर या स्टैंप,तांबे की अंगूठियां,सोने के पत्तर और खिलौने मिले हैं ! इसका आशय यह है कि मृतक की मनपसंद चीजें उनके मृत शरीर के साथ रख दिया जाता था । इसका मतलब यह है कि हड़प्पा काल में तत्कालीन भारतीय समाज में महिलाओं का स्थान और रूतबा बहुत ही प्रभावशाली और सम्मानित था,क्योंकि हड़प्पा काल में सामाजिक रूप से सम्मानित व्यक्तियों के शवों के अंतिम संस्कार में ही उसकी मनपसंद चीजों को उसके शव के साथ रखने की परंपरा थी ।
खुदाई के दौरान मिले सील और बर्तनों पर उस समय की प्रचलित लिपि में कुछ लिखा हुआ है,जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, लेकिन पुरातत्वविदों और नृवंशशास्त्रियों का दावा है कि इस लिपि को शीघ्र ही पढ़ लिया जाएगा, अगर यह लिपि पढ़ ली जाती है,तो हड़प्पा कालीन सभ्यता के अनेकानेक रहस्यों से पर्दा उठ जाएगा !
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सोनौली नामक स्थान पर भी हड़प्पा संस्कृति काल के अवशेष मिले हैं,जिनमें कालोनी,ईंटों की दीवार, एक महिला का कंकाल जिसके कानों में जेवर हैं,इसके अलावा शाही ताबूत,युद्धक रथ,मिट्टी की भट्ठी,धनुष,मृदभांड और तांबे की तलवार पाई गई है,यहां सबसे महत्वपूर्ण सिंधुघाटी सभ्यता के समय की 125 कब्रें भी मिलीं हैं !
पुरातात्विक विशेषज्ञों के अनुसार राखीगढ़ी में खुदाई में उक्त वर्णित पुरातात्विक अवशेष 20मीटर की गहरी खुदाई में मिले,किसी और पुरातात्विक खुदाई स्थल से इतनी गहरी खुदाई तक अवशेष नहीं मिले हैं,उदाहरणार्थ मोहनजोदड़ो में महज 17मीटर नीचे ही अवशेष मिलने शुरू हो गये थे,इसका मतलब राखीगढ़ी की सभ्यता मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से भी प्राचीनतम् लगभग 5000से 5500 ईसापूर्व का है !
प्राचीनकालीन नरकंकालों और वर्तमान समय के निवासियों के डीएनए में अद्भुत समानता के अलावा तब और अब की कला और परंपरा में भी जबर्दस्त समानता है ! खुदाई में मिले घड़े और हिसार में आज बनने वाले घड़ों में भी जबर्दस्त एकरूपता है ! खान-पान और दूसरी अन्य आदतों में भी अद्भुत समानताएं हैं !
हड़प्पा सभ्यता के विलुप्ति के संभावित कारण
पुरातात्विक वैज्ञानिकों के अनुसार इन शहरों के विलुप्त होने का कारण कोई बाहरी हमला नहीं लगता है ! इस बात की ज्यादा संभावना है कि जल के घोर कमी से यह सभ्यता नष्ट हो गई हो !क्योंकि भौगोलिक उथल-पुथल से हिमालय से निकलने वाली सरस्वती नदी अपना रास्ता बदल कर इन नगरों से बहुत दूर चली गई हो, मानसून भी दशकों तक कमजोर होने की वजह से इन नगरों में पानी की घोर किल्लत हो गई हो, क्योंकि धौलावीरा और राखीगढ़ी सहित सिंधुघाटी सभ्यता के अधिकांश नगरों के पुरावशेषों में जलसंग्रहण के लिए यथोचित प्रबंधन करते भग्नावशेषों की भरमार है !राखीगढ़ी में मिले नरकंकालों के डीएनए टेस्ट से कथित विदेशी मूल के आर्यों पर नया खुलासा !
राखीगढ़ी में मिले नरकंकालों के डीएनए टेस्ट के परिणाम बड़े चौंकानेवाले हैं ! नृवंशशास्त्रियों और पुरातात्विक वैज्ञानिकों के अनुसार डीएनए टेस्ट के परिणाम के अनुसार प्राचीन भारतीय लोग कभी भी बाहर से नहीं आए थे, वास्तविकता यह है कि अंडमान से लेकर अफगानिस्तान तक रहनेवाले सभी भारतीय लोगों का एक ही जीन है ! पिछले 10-12 हजार वर्षों से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में रहनेवाले सभी लोगों का एक ही जीन रहा है ! यह बात जरूर है कि विदेशियों के आने से भारतीय लोगों के जीन में आंशिक मिलावट होती रही है !
भारतीय उपमहाद्वीप में खेतीबाड़ी करने, शिकार करने और पशुपालन करनेवाले सभी लोग भारतीय मूल के ही लोग रहे हैं,अगर हड़प्पा सभ्यता के समय या उसके पूर्व या उसके बाद में कथित विदेशी आर्य भारत में आए होते तो वे अपने साथ अपनी संस्कृति,कला,रहन-सहन और भाषा भी यहां ले आए होते ! लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है ! वैज्ञानिकों और नृवंशशास्त्रियों के अनुसार 'आर्य ' केवल एक शब्द मात्र है,जिस शब्द का प्रयोग सभ्य,सज्जन और शालीन लोगों के लिए किया जाता रहा है,आर्य कोई जाति या नस्ल समूह कभी नहीं रहा है ! आर्यों में काले,गोरे और गेहुंए आदि सभी रंगों के लोग थे ! नई डीएनए रिपोर्ट कहती है कि उत्तर भारत के कथित आर्य मतलब गोरे लोग और दक्षिण भारत के कथित अनार्य मतलब कालेरंग के और भारत के मूल निवासी यानी द्रविड़ लोग,इन दोनों समूहों के जीन बिल्कुल एक ही है मतलब इन दोनों समूहों और समाजों के लोग भी एक ही पूर्वजों के संतान हैं ! वास्तविकता यह है कि ब्रिटिश साम्राज्य वादियों ने कुटिलतापूर्वक भारतवासियों को भी 'बाहरी और विदेशी ' इसलिए घोषित करने के लिए तिकड़मबाजी किए,ताकि वे खुद को इस देश पर शासन करने के लिए तर्क प्रस्तुत कर सकें कि 'हम विदेशी हैं तो तुम भारतीय लोग भी विदेशी हो जो हजारों साल पूर्व विदेश से आकर भारत में बसे हुए हो ! '
-निर्मल कुमार शर्मा 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के सुप्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक, सामाजिक,राजनैतिक,पर्यावरण आदि विषयों पर स्वतंत्र,निष्पक्ष,बेखौफ, आमजनहितैषी,न्यायोचित व समसामयिक लेखन,




