सुसंस्कृति परिहार
पिछले दिनों एक नया मंत्रालय अस्तित्व में आया है जिसका नाम है सहकारिता मंत्रालय और इसका जिम्मा संभाल लिए हैं गृहमंत्री अमित शाह। हालांकि मोदी सरकार इससे पहले भी कई नए मंत्रालय बना चुकी है. जैसे- जल शक्ति, गंगा सफ़ाई, कौशल विकास और आयुष मंत्रालय. कुछ मंत्रालयों और संस्थानों के नाम भी बदले गए हैं । सहकारिता मंत्रालय बहुत महत्वपूर्ण काम करने वाला है इसलिए इसका दायित्व दमदार नेता मोदीजी के विश्वासपात्र अमित शाह को दिया गया है ।अब तक सहकारिता के काम कृषि मंत्रालय के तहत आते थे । ऐसा तो नहीं है कि किसानों के माल को सहकारी संस्थाओं के ज़रिए अडानी के गोदामों तक पहुंचाने की ये नई चाल हो क्योंकि किसान अडिग हैं और वे हर्गिज पीछे हटने तैयार नहीं हैं।कृषि की तरह सहकारिता भी समवर्ती सूची में है. इसका मतलब यह है कि सहकारी सेक्टर केंद्र और राज्य सरकार दोनों के अधिकार क्षेत्र में हैं. ज़्यादातर सहकारी सोसाइटी पर राज्य के क़ानून लागू होते हैं. इसमें एक सहकारी आयुक्त और रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटी ऑफिस से मदद ली जाती है.
केंद्र ने 2002 में बहुराज्यीय सहकारी सोसाइटी क़ानून बनाया, जिसके तहत एक से ज़्यादा राज्यों में सहकारी सोसाइटी को काम करने की अनुमति मिली ।इनमें से ज़्यादातर बैंक, डेयरी और चीनी मिल जैसे कारोबार शामिल हैं।इनका दायरा एक से अधिक राज्यों में है. इन पर सेंट्रल रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज़ का नियंत्रण होता है लेकिन वास्तविक नियंत्रण स्टेट रजिस्ट्रार का होता है.
बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में देश भर के ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में सहकारी संस्थान फैले हुए हैं. गाँव के स्तर पर प्राथमिक कृषि क्रेडिट सोसाइटी हैं. ये सोसाइटी गाँव के ख़र्चों के अनुमान की मांग ज़िला सहकारी बैंकों को भेजती हैं.ग्रामीणों को क़र्ज़ मुहैया कराने में इन सहकारी संस्थानों की अहम भूमिका होती है. इन सहकारी बैंकों में सामूहिक भागीदारी होने के कारण क़र्ज़ लेने में तोल-मोल का अधिकार किसानों के पास होता है जो कि दूसरे व्यावसायिक बैंकों में नहीं होता है. इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी मार्केटिंग सोसाइटी और शहरी इलाक़ों में सहकारी हाउसिंग सोसाइटी भी हैं।
2019-20 की नाबार्ड की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देश में कुल 95,238 प्राइमरी एग्रिकल्चर सोसाइटी (पीएसीएस), 363 डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव सेंट्रल बैंक और 33 स्टेट कोऑपरेटिव बैंक हैं। स्टेट कोऑपरेटिव बैंक को निवेशकों से 6,104 करोड़ की राशि मिली और कुल 1,35,393 करोड़ रुपये जमा हुए।पीआईबी की प्रेस रिलीज़ के अनुसार, अलग सहकारिता मंत्रालय बनने से दूर-दराज़ के इलाक़ों में पहुँचने में मदद मिलेगी. हमारे देश में सहकारिता आधारित आर्थिक विकास बहुत प्रासंगिक है. इस मॉडल में हर व्यक्ति ज़िम्मेदारी और उत्साह के साथ काम करता है. यह मंत्रालय कारोबार को सुलभ बनाने को लेकर काम करेगा।अपने बजट भाषण में भी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सहकारिता को मज़बूत बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था. शनिवार को अमित शाह ने कुछ सहकारी संस्थानों के प्रमुखों के साथ बैठक भी की है उन्होंने कहा- मोदी जी के नेतृत्व में हम सहकारिता और सभी सहकारी संस्थाओं को और सशक्त बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।सहकारिता संस्थानों का निर्माण ज़मीनी स्तर पर सामूहिक कोशिश के ज़रिए हुआ है जिनका कल्याणकारी लक्ष्य होता है. मिसाल के तौर पर कृषि क्षेत्र में सहकारी डेयरी, चीनी मिल और कपड़ा मिलों का निर्माण किसानों ने अपने साझे संसाधनों से उत्पादों की अच्छी क़ीमत हासिल करने के लक्ष्य से किया।अभी भारत में दो लाख के क़रीब सहकारी डेयरी सोसाइटी और 330 सहकारी चीनी मिल हैं. नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार सहकारी डेयरी ने 1.7 करोड़ सदस्यों से हर दिन 4.80 करोड़ लीटर दूध ख़रीदा और 3.7 करोड़ लीटर लिक्विड दूध हर दिन बेचा. इसी तरह देश के चीनी उत्पादन में सहकारी चीनी मिलों का हिस्सा 35 फ़ीसदी है
सहकारिता मंत्रालय के ज़रिए सरकार चाहती है कि किसान अपने को-ऑपरेटिव सोसाइटी बनाएँ, अपना माल ख़ुद बेचें. इससे ग्रामीण इलाक़ों में किसानों को संगठित करने में और मदद मिलेगी। विदित हो महाराष्ट्र की राजनीति में सहकारी संस्थानों का दख़ल बहुत ही प्रभावी है. महाराष्ट्र में 100 से ज़्यादा विधायक किसी ने किसी तरह के सहकारी संस्थानों से जुड़े हैं. यहाँ तक कि महाराष्ट्र में एनसीपी प्रमुख शरद पवार और वर्तमान उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने सहकारी संस्थानों में होने वाले चुनावों से ही राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में सहकारी संस्थानों की भूमिका बहुत ही अहम है।
नया मंत्रालय बनाने पर विपक्षी पार्टियाँ आलोचना कर रही हैं और उनका आरोप है कि बीजेपी का इरादा महाराष्ट्र और गुजरात के सहकारी संस्थानों पर नियंत्रण करना है।विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार ने सहकारी आंदोलन को अपने नियंत्रण में करने के लिए नया मंत्रालय बनाने की चाल चली है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेनिथाला ने अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू से कहा है कि यह मोदी सरकार की सुनियोजित चाल है जिससे सहकारी संस्थानों को राज्यों के नियंत्रण से अपने नियंत्रण में लिया जा सके।उन्होंने द हिन्दू से कहा, ”बीजेपी सहकारी आंदोलन पर पूरा नियंत्रण चाहती है, इसीलिए अलग मंत्रालय बनाकर अमित शाह को मंत्री बनाया है. सहकारी राज्य का विषय है और यह संविधान की सातवीं अनुसूची का हिस्सा है. बिना संसद में कोई विधेयक लाए ये मंत्रालय कैसे बना सकते हैं?”महाराष्ट्र, केरल, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश में सहकारी संस्थानों की सत्ता तक पहुँचाने में अहम भूमिका मानी जाती है. इनमें से कई पैसे वाले सहकारी संस्थानों पर विपक्षी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, सीपीआईएम और कांग्रेस का नियंत्रण है।सीपीआई के महासचिव डी राजा ने कहा है कि सरकार ने अलग मंत्रालय बनाने की वजह नहीं बताई है और अमित शाह की नियुक्ति से कई सवाल खड़े होते हैं. डी राजा का कहना है कि यह राज्य के विषय में अतिक्रमण है और वे मॉनसून सत्र जो 19जुलाई से प्रारंम होने वाला है ,में इस विषय को उठाएंगे. सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने भी सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार की नज़र सहकारी बैंकों की नक़दी पर है।
वस्तुत:देखा जाए तो लुट पाट में माहिर भारत सरकार की नज़र अब सहकारिता से बनी सहकारी संस्थाओं पर है जिनकी पहुंच गांव के अंदरूनी हिस्सों में है वहां से आनी वाली फसलों और उनके उत्पादों को मुख्यत बाजार से कारपोरेट तक पहुंचाना ही मुख्य लक्ष्य लगता है इससे एक तो सुदूर क्षेत्रों में इनकी घुसपैठ बढ़ेगी जहां एन सी पी, कांग्रेस और वामपार्टियां अपना दबदबा रखती हैं। दूसरे किसानों का माल आसानी से प्राप्त हो सकेगा।जैसा कि पूर्व में उल्लेखित किया गया है कि यह राज्य का विषय है और संवैधानिक प्रावधानों के तहत है इसके खिलाफ चुनौती भी दी जा सकती है।
और अंत में एक बात शायद आपको याद आ जाए सहकारिता मंत्रालय के मंत्री महोदय अमित शाह अहमदाबाद के जिस केंद्रीय सहकारी बैंक में प्रमुख सदस्य थे वहां एक आरटीआई आवेदन से नोटबंदी के बाद के पांच दिनों में एडीसीबी में जमा की गयी रकम (745 करोड़) का पता चला, तो नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवेलपमेंट (नाबार्ड) ने इस बैंक के बचाव में उतरते हुए आंकड़ा पेश किया कि ज्यादातर ग्राहकों ने (98.6%) ने 2.5 लाख से कम रकम जमा कराई थी।आयकर विभाग यह मानता रहा है कि भारत में काला धन को सफेद बनाने के सबसे सुगम रास्तों में से एक रास्ता यह है कि इसे किसानों की आमदनी के तौर पर दिखा दिया जाए। जहां बचत के रास्ते हों उस पर चलना गलत नहीं होगा ।





