रबीन्द्र नाथ सिन्हा
क्या बंगाल यह देखने के लिए तैयार है, जो उसने पिछले 44 सालों से देखता आ रहा है- समान विचारधाराओं वाले दलों के बेहतर गठबंधन या किसी एकल पार्टी को विधानसभा में पूर्ण बहुमत? अथवा, क्या दो मई को मिलने वाला चुनाव परिणाम 44 सालों के राज्य की राजनीति में बनी परिपाटी की विदाई का एक संकेत होगा? इस अवधि में प्रदेश में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में बने वाममोर्चे के लगातार 34 वर्षीय के ऐतिहासिक शासन तथा तृणमूल कांग्रेस के एक दशक का शासन भी शामिल है।
अब यह तो 2 मई को चुनाव नतीजे घोषित होने पर ही स्पष्ट हो पाएगा। इस समय बस इतना कहना काफी है कि धरातलीय सूचनाओं के मुताबिक बंगाल विधानसभा के त्रिशंकु होने के आसार लगाये जा रहे हैं।
यह कहना शायद सुरक्षित होगा कि चुनाव परिणामों को लेकर सब के अलग-अलग विचार हैं। लेकिन इस तथ्य को छिपाया नहीं जा सकता कि सूबे में लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक स्थिरता को लेकर लोगों के मन में अनिश्चितताएं अथवा “एक सर्वाधिक बुरा परिदृश्य” होने की आशंका भी इस चुनाव में एक फैक्टर है। इस निष्कर्ष को न्यूज़क्लिक ने उन लोगों से बातचीत के आधार पर निकाला है, जो इस चुनाव में गहरे तक जुड़े रहे हैं। खुफिया आकलन इसका ठीक विरोधी है।
आठ चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव का बस अंतिम चरण ही बाकी है। यह भी 29 अप्रैल को बाकी बचे 35 विधानसभा क्षेत्रों के लिए चुनाव के साथ समाप्त हो जाएगा। 2 मई को विधानसभा की कुल 294 सीटों में से 292 के नतीजे मिल जाएंगे। निर्वाचन आयोग ने मुर्शिदाबाद की दो सीटों के चुनाव उनके दो उम्मीदवारों के निधन के चलते रोक दिया है। इन उम्मीदवारों में एक कांग्रेस और दूसरे, रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के हैं, जो संयुक्त मोर्चा का हिस्सा है।
उत्तरी 24 परगना में खरदह विधानसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम भी 2 मई को घोषित कर दिए जाएंगे। पर यहां स्थिति थोड़ी-सी भिन्न है। चुनाव होने के बाद रविवार को तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार काजल सिन्हा का देहांत हो गया है। अब अगर सिन्हा चुनाव में विजयी हो जाते हैं तो दोबारा चुनाव कराना होगा, और कोई दूसरा उम्मीदवार जीता है तो फिर उसकी नौबत नहीं आएगी।
राज्य के सचिवालय नवान्न में बैठने की दो प्रबल दावेदार हैं-एक तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जो लगातार दो बार से सत्ता में है और दूसरी, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जो पहली बार सरकार बनाने के लिए नजरें गड़ाए हुई हैं।
संयुक्त मोर्चे में फुरफुरा शरीफ के मौलवी अब्बास सिद्दीकी का इंडियन सेकुलर फ्रंट (आइएसएफ) भी शामिल है,लेकिन इसके मुख्य साझीदार वाममोर्चा और कांग्रेस हैं, जो सूबे की सियासत की जमीन पर एक प्रमुख कारक के रूप में उभरने का लक्ष्य रखे हुए हैं। इस तरह से वे, अपनी खो गई जमीन, खास कर पिछले पांच सालों में, के हिस्से पर फिर से काबिज होना चाह रहे हैं।
प्रदेश में चुनाव की रफ्तार पकड़ने काफी पहले से तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अपने को कामयाब होने का दावा बढ़-चढ़कर करती रही हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार दावा किया है कि उनकी पार्टी विधानसभा की 200 सीटों पर विजयी होगी।
वहीं, बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी, जो अपनी पार्टी और सरकार की अकेली सर्वेसर्वा हैं, ने विलंब से ही सही पर दावा किया कि उनकी पार्टी दो तिहाई बहुमत से चुनाव जीतने जा रही है।
भारतीय जनता पार्टी ने सदा की भांति इस चुनाव में भी धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति और पहचान की राजनीति की है। इस नैरेटिव में भाजपा ने 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसमें उसने काफी सीटें जीती हैं। उसे प्रदेश में लोकसभा की 42 सीटों में से 18 सीटों पर जीत हासिल हुई है। चुनाव बाद तृणमूल कांग्रेस के चार सांसदों के भाजपा में शामिल होने के बाद पार्टी सांसदों की कुल संख्या 22 हो गई है, जिसके दायरे में 140 विधानसभा सीटें आती हैं। इस जीत ने भाजपा के लिए पिछड़ा क्षेत्र जंगलमहल में भी जनाधार बनाया है। यहां अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता बहुत बड़े फैक्टर हैं।
उत्तर बंगाल में भी भाजपा ने गोरखाओं और राजबंशियों के समर्थन से बेहतर प्रदर्शन किया था। दक्षिण बंगाल में भी इसका अपेक्षाकृत मजबूत जनाधार है, जहां उत्तरी 24 परगनाओं और नादिया जिलों में मटुआ समुदाय के मतदाता 30 से अधिक सीटों पर जीत को प्रभावित कर सकने की स्थिति रखते हैं।
लेकिन, दक्षिण 24 परगनाओं की 31 सीटों पर भाजपा का प्रभाव नगण्य है। मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों का भी यही हाल है। कहने का आशय यह कि दक्षिण बंगाल में अभी भी ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां भाजपा को अपना जनाधार अभी बनाना है। इन इलाकों में भाजपा दल बदल खासकर तृणमूल कांग्रेस से होने वाले दलबदल पर नजरें गड़ाए हुई है। लिहाजा, इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि यहां से लड़ने वाले उसके उम्मीदवारों की सूची में ऐसे अनेक लोग हैं, जो पहले कांग्रेस यहां तक की सीपीएम के साथ रहे थे।
हाल के दिनों में, कोविड-19 की दूसरी लहर की मारकता को नजरअंदाज करने तथा पश्चिम बंगाल में ही चुनाव में सीमित रहने के लिए विरोधी दलों की आलोचनाओं का सामना कर रहे अमित शाह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा पार्टी अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा ने 200 विधानसभा सीटों को आसानी से जीत लेने के अपने लक्ष्य का दावा कम ही किया है।
संभवत: वे अब जमीनी वास्तविकताओं और ध्रुवीकरण एवं पहचान की राजनीति की सीमाओं को बेहतर समझ गए हैं।
तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनौतियां
तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी को सत्ता-विरोधी वातावरण और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। भ्रष्टाचार के इन आरोपों में यह आरोप भी शामिल है कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता गांव के लोगों से उगाही करते रहे हैं, जिन्हें किसी न किसी सरकारी योजनाओं के तहत नगद भुगतान किया जाता है।
ममता बनर्जी पर दूसरा गंभीर आरोप यह लगाया जाता है कि उन्होंने प्रदेश के राजनीतिक दलों को उचित आदर भाव या स्थान नहीं दिया है। उनकी अहंमन्यता का इसका एक चमकता उदाहरण 2018 में हुआ पंचायत चुनाव है, जब तृणमूल कांग्रेस ने 20,000 सीटों अथवा कुल तादाद की 34 फीसद सीटों पर अकेले विजय होने की “कारीगरी” दिखाई थी। यह सब विरोधी उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल नहीं करने देने के जोर पर किया गया था।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी ‘…श्री और…साथी’ योजनाओं पर बहुत अधिक निर्भर रही हैं। उनके बहु प्रचारित सालाना इन्वेस्टमेंट कॉन्क्लेव को सीमित सफलता मिली है। उद्योगों में रोजगारों के सृजन के अवसर भी उनकी प्राथमिकताओं में निचले पायदान पर रहे हैं।
इन परिस्थितियों में, भाजपा की तरह, ममता बनर्जी ने भी कुछ विशेष पहचान समूहों को जीतने का प्रयास करती रही है, जैसे कि मटुआ और राजबंशियों को लुभाने की उनकी कोशिश। इनके साथ वे अपने ब्रांड के ‘धार्मिक ध्रुवीकरण’ पर भी हाथ आजमाती रही हैं, जो भारी तादाद में मुसलमानों के वोट अपनी पार्टी के पक्ष में सुनिश्चित करता है। 7.3 करोड़ से अधिक मतदाताओं वाले बंगाल में 28% मुसलमान मतदाता हैं। हालांकि वह भाजपा पर केवल ठाकुर परिवारों पर ध्यान देने तथा घोसाइयों एवं दलपतियों की उपेक्षा करने के आरोप लगाते हुए मटुआ समुदाय के मतदाताओं को बांटने की राजनीति करने में देर कर दी।
यहां उल्लेख करना मौजू होगा कि ममता बनर्जी को अपने दो कार्यकालों के पहले हिस्से में सिद्दीकी मुसलमानों से चुनौतियां झेलनी पड़ी थीं। यद्यपि आइएसएफ ने 3 महीने की अल्प अवधि में, 28 उम्मीदवारों को खड़े किये हैं पर उन्हें लोग समर्थन कर रहे हैं-खासकर मुस्लिम युवाओं में उसका अच्छा खासा समर्थन है।
बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन पार्टी का प्रवेश एक दूसरा महत्वपूर्ण कारक है। यद्यपि ओवैसी ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों जैसे मुरादाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और आसनसोल उत्तर में केवल 7 उम्मीदवार ही खड़े किए हैं। इन क्षेत्रों में मुसलमान मतदाताओं की तादाद 27 फ़ीसदी से लेकर 69 फ़ीसदी है। ओवैसी के उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के समर्थक वोट पर हाथ साफ कर सकते हैं, जैसा कि उन्होंने बिहार में किया था। इसीलिए ममता बनर्जी को हाल के दिनों में “अपने हाथ जोड़कर” मुस्लिम मतदाताओं से अपने वोट व्यर्थ न जाने देने और तृणमूल कांग्रेस के साथ बने रहने की अपील करते हुए देखा गया था।
वाम मोर्चा, कांग्रेस आशान्वित
लोगों से मिलने-जुलने के श्रृंखलाबद् कार्यक्रम चलाने और 2020 के मई में आए महाचक्रवात अम्फान से हुई क्षति को भुलाते हुए तथा युवाओं एवं छात्र प्रकोष्ठों के बीच सघन सामाजिक नेटवर्क बनाने से कांग्रेस और वाम दल, विशेष कर सीपीआइएम, को उम्मीद है कि उनके समर्थक जो सूबे की सत्ता की दमनकारी नीतियों के चलते तृणमूल कांग्रेस और भाजपा (2019 लोक सभा चुनाव के बाद) में चले गए थे, वे वापस उनके दलों में लौट आएंगे। कम से कम उनकी वापसी की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। यह भी कि संयुक्त मोर्चा धर्मनिरपेक्ष ताकतों को संघटित करेगा और सत्ता विरोधी मत उनके पाले में आएंगे।
इन कारकों तथा बदलती जमीनी वास्तविकताओं पर बातचीत करते हुए माकपा के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि ऐसी स्थिति में त्रिशंकु विधानसभा होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। पेशे से अधिवक्ता भट्टाचार्य ने कहा,“मुझे संदेह है कि इस निराशाजनक, अवमूल्यित होते वातावरण में, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की कारगुजारियों से ही निर्मित हुआ है, उनमें वे दोनों ही पार्टियां आधी संख्या तक भी पहुंच पाएंगी। हां, मैं अपने इस आकलन पर कायम हूंI” उन्होंने न्यूज़क्लिक के इस सवाल के जवाब में अपना दावा किया था, जब उनसे पूछा गया था कि क्या वे अपने आकलन पर कायम हैं। उन्होंने कहा कि संयुक्त मोर्चा को एक फैक्टर मान लिया जाना ही उसकी उपलब्धि मानी जाएगी।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद प्रदीप भट्टाचार्य भी उन्हीं के समान आशावादी हैं। न्यूज़क्लिक से बातचीत में उन्होंने कहा, “हर लिहाजन त्रिशंकु विधानसभा चुनाव होने के आसार हैं। प्रबुद्ध मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा ममता बनर्जी और शाह-मोदी के स्तरहीन चुनावी अभियानों से बहुत हताश है। उन लोगों के लिए आपस में एक दूसरे पर कीचड़ उछालना ही चुनाव प्रचार अभियान रह गया है। ममता बनर्जी तो राज्य में उद्योगों की स्थापना तथा रोजगार के अवसरों के सृजन के सवाल पर चुप्पी साध लेती हैं। मुझे तो आगे की राजनीति में एक गतिरोध दिखाई देता हैI”
माकपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा सांसद शामिक लाहिरी ने न्यूज़क्लिक से कहा: “हमने अपने आकलन में एक त्रिशंकु विधानसभा को बरकरार रखा है। पिछले महीने जब से चुनाव की शुरुआत हुई धरातलीय यथार्थ बदलते रहे हैं, जो एक त्रिशंकु विधानसभा बनने की तरफ संकेत करते हैं। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस द्वारा अतिआक्रामकता, गाली-गलौज की भाषा के इस्तेमाल के साथ, इस बार का चुनावी अभियान अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गया है। इस लिहाज से वे दोनों कभी भी अपनी जादुई संख्या तक नहीं पहुंच सकते।” लाहिरी ने अपना आकलन बताया।
भाजपा-समर्थक व्यवसायी विनय अग्रवाल बातचीत की शुरुआत करते हैं और खुद ही अपना अध्ययन बताते हैं : “मैं एक त्रिशंकु स्थिति को बनते हुए देखता हूं, जो हमारे देश में अजीबोगरीब नाटक से साथ तीन चरणों में घटित होती है-पहले बाहर से समर्थन दिया जाता है, फिर अपनी शर्ते थोपे जाने के लिए उचित क्षण का इंतजार होता है और अंत में समर्थन वापस ले कर सरकार गिरा दी जाती है।”
हालांकि उनके ठीक विपरीत विचार प्रोफेसर मोहिदुल इस्लाम का है, जो कोलकाता के सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंस में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं।
इस्लाम ने न्यूजक्लिक से कहा, “मैं राज्य में एक अकेली पार्टी या मोर्चे के पूर्ण बहुमत की 44 सालों से चली आ रही परिपाटी में कोई खलल होते नहीं देखता हूं। बंगाली राजनीतिक स्थिरता को पसंद करते हैं और वे जीतने वाले दल को विधानसभा की कुल 294 सीटों में से 200 सीटें देने के प्रति उत्साहित रहे हैं। वे इस पर एकमत दिखते हैं कि राज्य में लघु एवं मध्यम श्रेणियों की औद्योगिक इकाइयां स्थापित होनी चाहिए, सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान होने चाहिए, सेवा क्षेत्र और रियल एस्टेट के उपक्रम भी होने चाहिए। ये सब कुशल और अर्ध कुशल लोगों को रोजगार देने वाले व्यवसाय देने वाले उपक्रम हैं। वे जानते हैं कि बड़ी विनिर्माण इकाइयों की स्थापना का तो सवाल ही नहीं है। मैं नहीं समझता कि त्रिशंकु विधानसभा होने जा रही है।”
इस बीच, रिकॉर्ड के लिए, यहां द टेलीग्राफ के 26 अप्रैल 2021 के अंक में छपे जादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसरएमेरिटस सुकांत चौधरी के आलेख को पुनः संपादित करते हुए रखा गया है, जिसमें उन्होंने कहा है: “एक छोटी लड़की की कहानी है, जो शेक्सपीयर के मशहूर नाटक हैमलेट को देख रही है। उसका आधा भाग देखने के बाद वह टिप्पणी करती है : मैं नहीं जानती कि इस नाटक का अंत कैसा होगा, लेकिन इसका अंत अच्छा नहीं हो सकता”। उस छोटी-सी लड़की की यह प्रतिक्रिया वर्तमान बंगाल के लिए भी प्रासंगिक है। मैं अपने भय पर काबू पाता हूं: अपने लिए, मेरे अपने राज्य के लिए और मेरे देश के लिए।”
(लेखक कोलकाता स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)





