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विनाशकाले विपरीत बुद्धि  ….  भारत के भविष्य की झलकी है श्रीलंका

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भरत जैन
श्रीलंका में जो हो रहा है वह भारत के भविष्य की झलकी है । ज़रूरी नहीं है कि ऐसा तुरंत हो। भारतीय उपमहाद्वीप में श्रीलंका मानव सूचकांकों में सबसे ऊपर था। जैसे 2008 / 2009 के आसपास बहुत से आर्थिक विश्लेषक यह दावा कर रहे थे कि भारत चीन को पछाड़ देगा पर अब कोई यह बात गलती से भी नहीं करता वैसे ही आज श्रीलंका की हालत को देखकर कोई यह नहीं मानेगा कि श्रीलंका की स्थिति भारतीय उपमहाद्वीप में श्रेष्ठतम थी ।

गलती तभी शुरू हो गई थी जब श्रीलंका के सिंहली बहुमत ने तमिल अल्पसंख्यकों की भाषा को सरकारी भाषा के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया था । 1965 में भारत में हिंदी के राज्य भाषा का दर्जा दिया जाने के विरोध में जिस तरह से आंदोलन हुआ और जिस तरह उस समय शास्त्री सरकार ने उसे संभाला उसके मुकाबले यदि श्रीलंका की सिंहली बहुमत की प्रतिक्रिया को देखें तो अंतर समझ में आ जाता है।
बहुत समय तक अॉल सीलोन तमिल कांग्रेस ( ACTC ) ने लोकतांत्रिक तरीकों से तमिलभाषियों के लिए उचित सम्मान व प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष किया । जब कोई समुचित लाभ नहीं हुआ तो थोड़ी अधिक उग्र तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ( TULF ) नाम से अलगाववादी परंतु लोकतंत्र समर्थक संगठन ने विरोध की बागडोर संभाली। परंतु उससे भी बात नहीं बनी तो लिबरेशन ऑफ तमिल टाइगर्स ईलम ( LTTE  ) के नाम से हिंसक अलगाववादियों के हाथ में आंदोलन चला गया। 1983 से श्रीलंका में पूर्ण गृह युद्ध शुरू हुआ। इसमें संदेह नहीं है कि उस समय की तमिलनाडु सरकारों और काफी हद तक भारत की केंद्र सरकार ने भी इन अलगाववादियों को सहयोग किया। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने अपने बैकयार्ड में बड़े भाई होने की भूमिका निभानी चाही और उसका अंत हुआ श्रीलंका में सीधा हस्तक्षेप – इंडियन पीस कीपिंग फोर्स ( IPKF )  भेज कर ख्वामखां उन के अंदरूनी मामलों में दख़ल अंदाजी जिसका परिणाम हुआ लिट्टे ( LTTE )  द्वारा राजीव गांधी की हत्या। उसके बाद ही भारत के केंद्रीय सरकार का तमिल आतंकवादियों से मोहभंग हुआ। हालांकि राज्य स्तर पर अभी भी कहीं ना कहीं संबंध बने हुए हैं।
जब तमिल आतंकियों को भारतीय सरकार की ओर से प्रश्रय  मिलना बंद हो गया तो वहां अर्थात श्रीलंका की सरकार ने तमिल अलगाववादियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया । हिंसा प्रतिहिंसा का दौर चलता रहा परंतु तमिलों को मनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ। अंत में  2009 में महिन्दा राजपक्षे ( जो आज सपरिवार छुपे हुए हैं  ) सरकार द्वारा भयंकर हिंसा के बाद लिट्टे के नेता प्रभाकरन का अंत किया और आतंकी आंदोलन भी शांत हो गया।
परंतु 25 वर्ष के गृह युद्ध का परिणाम था श्रीलंका की फौज और फौजी खर्चे में जबरदस्त बढ़ावा । एक इतने छोटे से देश को इतनी सैन्य शक्ति की आवश्यकता थी ही नहीं । और यह खर्च बहुत लंबे समय के लिए देश पर बोझ बन गया ।
भाषाई विद्वेष के नशे में कामयाब श्रीलंकाई दलों ने आज तक इस समस्या को निपटाने का प्रयास नहीं किया है। आत्मविश्वास में चूर होकर सरकारों ने चीन से अनाप-शनाप सहायता ली और फिजूलखर्ची की ।
अर्थव्यवस्था अचानक कमजोर नहीं होती। सालों की लापरवाही का परिणाम होता है। लंका की आय का एक बहुत बड़ा स्त्रोत था टूरिज़्म जिसमें कि गृहयुद्ध के कारण तो नुकसान हुआ ही कोरोना के प्रतिबंधों के कारण भी बहुत भारी नुकसान हुआ। उसके अलावा राजपक्षे सरकार ने ऑर्गेनिक फार्मिंग के नाम पर रसायनिक खादों का उपयोग प्रतिबंधित कर दिया। परिणाम – फसलों में भारी कमी। इस तरह के फैसले प्रायः तानाशाही  हुकूमतें लेती रहती हैं। 
आज हम भारत को देखें तो धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण कर वर्तमान शासक दल सत्ता में बना हुआ है और नोटबंदी जैसे मूर्खतापूर्ण फैसलों को भी जनता के हित में सिद्ध कर रहा है । इन कारणों से अर्थव्यवस्था बुरी तरह हिल गई है हालांकि चुनाव जीते जा रहे हैं। भारत भी बर्बादी के हाईवे पर चल रहा है। श्रीलंका की स्थिति में पहुंचने में कितना समय लगेगा यह इस बात पर निर्भर करता है की बिगड़ती स्थिति को संभालने के लिए अगला मूर्खतापूर्ण निर्णय क्या होगा ।
समझदार लोगों से तो वर्तमान शासक दल ने दूरी बना ही ली है। तो परिणाम भी बेहतर निकलेगा इस बात की कोई संभावना नहीं है । नफ़रत की खेती के फल सदा ऐसे ही होते हैं चाहे वह श्रीलंका हो या जर्मनी।

Ramswaroop Mantri

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