– कुलदीप बठिंडा
हमारा देश एक पूँजीवादी देश है जहाँ पूँजीवादी विकास कँटे-छटे ढंग से होने के चलते गुज़रे समय का बचा-खुचा आधुनिक दौर के पतन के साथ घी-खिचड़ी होकर, जीवित रूहों को प्रेत बनकर चिपटा हुआ है। वैसे तो हमारा समाज कई सामाजिक-सांस्कृतिक बुराइयों से जूझ रहा है, जैसे कि जाति, धार्मिक पिछड़ापन, धार्मिक कट्टरता, पितृसत्ता, स्त्री विरोधी मानसिकता आदि, और इनसे छुटकारा पाने के लिए समय एक लंबी सामाजिक-सांस्कृतिक जद्दोजहद की माँग करता है, लेकिन नारी विरोधी मानसिकता और पितृसत्ता हमारे समाज के माथे पर ऐसा कलंक है कि हमारे समाज की आधी आबादी आज भी स्वाभिमान का जीवन जीने लायक़ नहीं हो पाई है।
पिछ्ले दिनों ‘राष्ट्रीय परिवार और सेहत सर्वेक्षण 5’ की ताज़ा रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासों से रूबरू होने को मिला है। उनमें से एक औरतों के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा का मुद्दा भी सामने आया है। रा.प.स.स. 5 द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार, औरतों के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा को पुरुषों की तुलना में औरतें ज़्यादा सही मानती हैं। उनके अनुसार यदि पत्नी बिना पति को बताए घर से बाहर जाती हो, घर या बच्चों की उपेक्षा करती हो, पति से बहस करती हो, पति के साथ सोने से इंकार करती हो, ठीक से खाना नहीं बनाती हो, उसका चरित्र संदिग्ध हो, वह पति का सम्मान न करती हो आदि तो उसके पति के लिए उसे पीटना सही और उचित है। ज़्यादातर औरतें इस विचार के पक्ष में हैं जिसकी पुष्टि उपरोक्त सर्वेक्षण से होती है। यह हमारे समाज में औरतों के बारे में सड़ती-बदबू मारती पितृसत्तात्मक सोच को दर्शाता है। सर्वेक्षण में 33% पुरुषों ने घरेलू हिंसा को सही माना । अगर इसके बारे में महिलाओं की सोच की बात करें तो आंध्र प्रदेश में 84%, बिहार में 37%, जम्मू-कश्मीर में 49%, गुजरात में 30%, महाराष्ट्र में 44%, मणिपुर में 66% और तेलंगाना में 84% ने माना कि यदि पत्नी उपरोक्त “ग़लतियों” में से एक भी करती है तो इसके लिए उसके पति द्वारा पीटा जाना सही है। यानी बड़ी संख्या में औरतें, औरतों के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा के पक्ष में हैं। इसका मतलब यह है कि पीड़ित बड़ी संख्या में उत्पीड़क के साथ खड़े हैं।
ये आँकड़े भले ही पूरी तरह सटीक न हों, लेकिन महिलाओं की अच्छी-ख़ासी संख्या की ऐसी सोच हमारे समाज की एक सच्चाई है। इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि न केवल मर्द पितृसत्तात्मक सोच रखते हैं, बल्कि औरतों की बड़ी संख्या में भी यह सोच कूट-कूटकर भरी है। शायद इस कारण ही यह प्रचलित है कि वृद्ध औरतों की पितृसत्तात्मक सोच होती है। हालाँकि आज ज़्यादातर औरतें पढ़ी-लिखी हैं, फिर भी वे घर और रसोई के बोझ से मुक्त नहीं हुईं। मेहनतकश/मज़दूर औरतों के लिए तो यह बात और भी सच है। वे भयानक लूट और दमन की दोहरी ग़ुलामी की शिकार हैं। यहाँ तक कि कारख़ानों में जहाँ मर्दों के साथ काम में समान रूप से पिसती हैं, उन कार्यस्थलों पर छेड़-छाड़, शारीरिक हिंसा का शिकार होती हैं। घर आकर वे बच्चों की देखभाल करती हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि औरतों की ग़ुलामी का कारण उनकी अपनी सोच है और न ही इसका मतलब यह है कि औरतें ही औरतों की दुश्मन हैं। असल में किसी भी समाज में जो वर्ग उत्पादन के साधनों पर काबिज होता है, उसके विचार ही समाज में हावी होते हैं, अधिक प्रचलित होते हैं। क्योंकि जैसे उत्पादन के संबंध होते हैं वैसे ही सामाजिक और सांस्कृतिक ताना-बाना बनता है। यानी सामाजिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में, केवल वही विचार हावी होते हैं जो इन उत्पादन संबंधों के लिए उपयुक्त हों, उन्हें सही ठहराते हों। समाज की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना उस वर्ग के मुताबिक़ होती है, जो इन उत्पादन संबंधों में उत्पादन के साधनों का मालिक होता है। समाज में इन विचारों के प्रभुत्व के कारण ही यह वर्ग शासन करता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो लोग इस तरह की व्यवस्था नहीं चलने देंगे, बल्कि इसे ख़त्म कर देंगे। उदाहरण के लिए पूँजीवादी समाज में, पूँजीपति जो कि उद्योगों (उत्पादन के साधनों) को नियंत्रित करता है, अपने अधीन काम करने वाले मज़दूरों को लूटता है। लेकिन सामान्य तौर पर मज़दूरों के मन में, लूट की इस व्यवस्था को ख़त्म करने का विचार नहीं होता, बल्कि वे मालिक बनकर इस लूट को जारी रखना चाहते हैं।
इसी तरह इतिहास में एक विशेष चरण – वर्ग समाज का गठन – में पितृसत्ता अस्तित्व में आई, जिसने महिलाओं की दासता की शुरुआत की। इसका कारण यह है कि आदिम समाज के विघटन और निजी संपत्ति के उदय के बाद उत्पादन में मर्दों की बढ़ती भूमिका के कारण संपत्ति की मालिकी भी मर्दों के हाथ में आ गई। इस मालिकी के कारण, औरतें अपनी आजीविका के लिए मर्दों पर निर्भर हो गईं। इतना ही नहीं, मालिक होने के नाते वह चाहता था कि संपत्ति उसके असली वारिस को मिले, इसलिए औरतों पर किसी बाहरी व्यक्ति के साथ संबंध न बनाने का दबाव था। यहाँ से औरतों पर दबाव और प्रतिबंधों की शुरुआत हुई, जो जीवन के सभी क्षेत्रों में फैल गई। उसके बाद अलग-अलग युगों में औरतों पर अत्याचार के रूप बेशक बदले, लेकिन उनको ग़ुलामी से पूरी तरह मुक्त नहीं किया जा सका। इस तरह निजी संपत्ति पर आधारित ऐसी सामाजिक व्यवस्था की ज़रूरत है कि वह औरतों को दमन की स्थिति में रखे। ये विचार ही समाज में हावी होते हैं और यही कारण है कि इन विचारों को औरतों द्वारा भी अपनाया जाता है।
आज के “आधुनिक”, “तकनीकी”, “साक्षर” युग में भी उन्हें “पैरों की जूती”, “चोटी पीछे अक्ल” जैसे विशेषणों से छुटकारा नहीं मिला है। दूसरी ओर, बाज़ार उसके शरीर, सुंदरता के वस्तुकरण से लाभ कमा रहा है। ऊपर से धार्मिक चरमपंथियों और उनके रूढ़िवादी संगठनों द्वारा औरतों को घर में रहने, पति की सेवा करने, बच्चों को जन्म देने और उनकी देखभाल करने की ज़िम्मेदारी जैसे दिव्य परामर्श जलते पर तेल डालने का काम करते हैं। समाज में निरक्षरता, अज्ञानता, बेगानगी और आर्थिक सामाजिक स्तर पर हो रही टूट-फूट के कारण ऐसे रूढ़िवादी संगठनों का समाज में बहुत बड़े स्तर पर प्रभाव है। जैसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ औरतों, मर्दों, मज़दूरों-मेहनतकशों, अध्यापकों, स्कूली विद्यार्थियों आदि के दिलों-दिमाग़ में अपने तरह-तरह के संगठनों द्वारा यह बात उतारने लगा है कि औरतों का काम घर संभालना, बच्चे पैदा करना, पति की सेवा करना, उसकी हर बात मानना आदि है। अकेली राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही नहीं बल्कि दूसरे धर्मों के रूढ़िवादी भी अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार औरत विरोधी प्रचार करने में आर.एस.एस. से कम नहीं।
उपरोक्त से हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हमारे समाज में महिला विरोधी मानसिकता और पितृसत्ता का आधार और प्रभाव इस हद तक है कि पीड़ितों का एक बड़ा वर्ग भी इसके प्रभाव में है। आज का पूँजीवादी समाज और उसके भोंपू वोट के अधिकार, शिक्षा-रोज़गार आदि के अधिकार के कारण महिला सशक्तिकरण का गुणगान करते रहते हैं, लेकिन समय-समय पर इसकी ही संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत ऐसे आँकड़े इनका मूँह चिढ़ाते हैं।
समाज की संरचना और विकास के इन नियमों को समझकर लोग इनसे मुक्त भी हो जाते हैं। इस वर्गीय समाज में पीड़ित वर्ग लूट की इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ता है और एक नई तरह की सामाजिक व्यवस्था की तर्जुमानी करता है, इसलिए यह वर्तमान व्यवस्था के विचारों को खारिज करता है और नए विचार पेश करता है। यहीं से परिवर्तन की चेतना आती है। जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक मज़दूर स्वयं मालिक बनने के बारे में नहीं सोचते हैं, बल्कि निजी मालिकी की व्यवस्था को ख़त्म करने के बारे में सोचते हैं। इसी प्रकार राजनीतिक तौर पर चेतन औरतें और मर्द भी इन पितृसत्तात्मक विचारों को रद्द करते हुए बराबरी पर आधारित औरत-मर्द संबंधों की बात करते हैं। लेकिन यह समानता पूरी तरह से तभी हासिल होगी, जब उत्पादन संबंधों की निजी मालिकी को समाप्त कर दिया जाएगा और उत्पादन के संबंधों को सामाजिक मालिकी में बदल दिया जाएगा, यानी औरत के उत्पीड़न की ज़मीन को ख़त्म कर दिया जाएगा। जहाँ उपज की सामूहिक मालिकी होगी, वहाँ एक तो औरतों को चौके-चूल्हे और बच्चों की देखभाल और घरेलू दासता से मुक्त किया जाएगा और सभी संस्थानों, संगठनों, नौकरियों आदि में औरतों की समान भागीदारी होगी और बड़े स्तर पर सामाजिक सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार के द्वारा (जिसकी आज से ही शुरुआत करने की ज़रूरत है) औरत इस ग़ुलामी से मुक्त हो सकती है।
– कुलदीप बठिंडा
मुक्ति संग्राम – बुलेटिन 14
जनवरी 2022 में प्रकाशित





