-सुसंस्कृति परिहार
2026का महिला दिवस इस बार इज़राइल और अमेरिका के द्वारा ईरान पर किए हमले के कारण महिलाओं के प्रती ज़्यादा चिंतित करने वाला हो गया है। एक लोकतांत्रिक देश जहां से मानवाधिकार और महिला दिवस की पहल प्रारंभ हुई वह संयुक्त राज्य अमेरिका आज एक ऐसे हमलावर रुप में सामने है जिसने ईरान की राजधानी तेहरान में स्कूल में पढ़ रही 151बच्चियों को हवाई हमले में मार डाला दर्जन भर बच्चियां घायल हैं।यह अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध के नियमों के ख़िलाफ़ है। वैसे इस तरह की अमानवीय हरकत बच्चों, महिलाओं के साथ फिलीस्तीन में कई दशकों से जारी है।उधर एप्स्टीन फाईल के जो रहस्य, नन्हीं बच्चियों के साथ कुकृत्य के सामने आए हैं उसने तो अमरीका को नंगा कर दिया है। महिलाओं के प्रति ये अति घृणित व्यवहार इज़राइल और अमेरिका दोनों मिलकर जिस तरह किए हैं उससे इन्हें नरभक्षी देश के रुप में याद रखा जाएगा। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि अमेरिका ईरान की महिलाओं को पर्दाप्रथा और उनके अधिकारों की वापसी की मांग के अधिकारों के लिए युद्ध की बात कर रहा और यह घात कर बैठा।जबकि नकाब में रहते हुए ईरान की महिलाएं बड़ी तादाद में डाक्टर, इंजीनियर,सैन्य अधिकारी और शिक्षा जैसे ज़रुरी क्षेत्रों में ज़रुरी भूमिका में हैं।मगर उन्हें कमज़ोर समझ उनकी कथित आज़ादी हेतु अमरीका से जुड़े गद्दार सक्रिय रहे।

वैसे युद्ध तो आदिकाल से ही स्त्रियों के लिए ही लड़े जाते रहे हैं सामंतीकाल में स्त्रियों का यौन शोषण सवर्ण खासकर क्षत्रियों ने किया तो वहीं ब्राह्मणों ने देवदासी बनाकर देवों के नाम पर यौनिक शोषण किया है। हमारी पौराणिक कथाओं में भी स्त्री दोयम दर्जे की ही है। वैदिक युग में ज़रुर श्रृषियों की पत्नियों के साथ महिलाओं की आज़ादी की बात सामने आई है। किंतु वह भी कुछ वर्ग तक ही जीवित रही । हां आदिवासी समाज और बौद्ध भिक्षुणियां समाज में विशिष्ट स्थान पाई थीं।
लेकिन आज़ाद भारत से पूर्व महात्मा गांधी के साथ ज़रुर सभी वर्गों की महिलाओं ने पुरुषों की बराबरी से संग्राम में भागीदारी निभाई।
लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में जहां महिलाओं को आज संविधान में बराबरी का हक मिला हुआ है ऐसे राष्ट्रों से महिला के प्रति ऐसे जघन्य अपराध सामने आते हैं तो इसके बारे में महिलाओं को भी मिलकर आवाज़ उठाई जानी चाहिए।
आईए वर्तमान युद्ध में एक महिला प्रधानमंत्री के साहस की तारीफ की जानी चाहिए जिसने इज़राइल के ख़िलाफ़ सख़्त रुख अपनाया है जिसका असर अमेरिका जैसे डान पर भी पड़ेगा।वो है इटली की महिला प्रधानमंत्री जार्जिया मेलानिया जिसने इटली ईरान के हवाई हमलों का सामना कर रहे खाड़ी देशों को हवाई रक्षा सहायता भेजने की योजना बनाई है।उनका बेबाक तौर पर कहना है इज़राइल ने अन्तर्राष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन किया है, इसलिए उसे वैश्विक स्तर पर अलग थलग किया जाना चाहिए।’हम किसी के गुलाम नहीं बनेंगे, किसी भी धमकी को बर्दाश्त नहीं करेंगे और अपने मूल्यों की रक्षा करेंगे’- ये था ट्रंप की धमकी पर स्पेन की डिप्टी प्राइम मिनिस्टर योलांडा डियाज़ का जवाब। अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर इन दो राष्ट्र नेत्रियों के बयान से अमरीका विचलित है।
विशेष बात यह है कि यूरोपीय अधिकांश देश इस मसले पर चुप्पी साधे बैठे हैं। भारत में भी कांग्रेस की चेयर पर्सन सोनिया गांधी और सीपीएम की वृन्दा करात ने भी इस युद्ध को देशों की संप्रभुता के लिए ख़तरा बताया है। किडनेपर अमेरिका से बिना खौफ़ खाए इन महिलाओं की भी प्रशंसा की जानी चाहिए। युद्ध के ख़िलाफ़ नारी को हमेशा सजग होना जरूरी है । क्योंकि जैसा कि पूर्ववत कहा जा चुका है कि युद्ध में सबसे ज्यादा पीड़ित स्त्री और उसके बच्चे होते हैं।यह सेनाओं की लड़ाई अब नहीं रही।ये हमला अब एक स्त्री और नाबालिग बच्चों पर भी कहर बनके बरपा है।जिस तकलीफ़ को महिलाएं भलीभांति समझती हैं। इसलिए उसे अपनी चुप्पी तोड़नी होगी सच कहने में क्या देश और क्या विदेश के बारे में सोचना।
भारत देश में भी पिछले कई वर्षों से भारत सरकार जिस तरह अमेरिका और इज़राइल के साथ देश की संप्रभुता को खोती जा रही है वह भी बेचैनी बढ़ाती है। अफ़सोस इस बात है भारत के राष्ट्रपति पद पर विराजमान महिला महामहिम द्रौपदी मुर्मू जी भी चुप्पी साधे हुए हैं।ऐसे कठिन वक्त में महिलाओं को आगे आना होगा।अपने देश का भला बुरा सोचना होगा।
याद आती है रजनीबाला जी की जो राष्ट्रीय युवा कांग्रेस अध्यक्ष उदय भानु चिंब की माताजी हैं चिंब की गिरफ्तारी पर बिल्कुल नहीं घबराती हैं बल्कि उनका समर्थन करती हैं। शर्टलेस प्रदर्शन के मामले में हुई इस गिरफ्तारी पर उनकी मां का संदेश काफी आक्रामक और भावनात्मक था।
उन्होंने कहा कि मुझे अपने बेटे पर गर्व है और देश के लिए ऐसी लड़ाई लड़ने वाले हर नौजवान को भगतसिंह बनना चाहिए। ऐसी बात अमूनन हर मां बाप दूसरे के बेटे के लिए सोचते हैं। इसलिए महिला दिवस पर ऐसी तमाम महिलाएं प्रणम्य हैं जो राजनैतिक चेतना रखती हैं।
अफ़सोस नाक सच यह है कि आज देश को ऐसी ही राजनैतिक समझदारी रखने वाली महिलाओं की तलाश है।बड़ी तादाद में भारत की महिलाओं को जिस तरह बैठे ठाले रुपयों की बौछार हो रही है या कि राशन बांटकर जिस तरह वोट प्राप्त करने का साधन बना लिया गया है वह भारतीय राजनीति में वोट खरीदारी का अलोकतांत्रिक तरीका है। महिलाओं की मदद करनी ही है तो उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान किए जा सकते हैं जिससे वे अपना वजूद और सोच विकसित कर सकती हैं और राजनीति के जबरिया हस्तक्षेप से अपने को बचा सकती हैं।वे आज भी सामंती शासन की तरह अपने पति या किसी दबंग के झांसे में फंस रही हैं।देश की आधी आबादी चेतना शून्य होगी तो वास्तविक लोकतंत्र की कल्पना मुश्किल है। ऐसे ही हालात में आज स्त्री यौन हिंसा बढ़ रही है।
देश में जो बच्चे आज के समय के महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे उनमें छात्राएं भी अपने अधिकार और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ रही हैं।उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।नेहा सिंह राठौर तो रोजाना बेझिझक बिना डरे , चेतना विकसित करने भोजपुरी लोकगीत गा रहीं हैं उनको सुनने और समझने की ज़रुरत है।देश में मौजूद तमाम वाम दलों की महिलाएं भी देश भर में क्रांति का परचम थामे हुए हैं।उनको समझने की ज़रुरत है।
आज की महिला घर बैठकर सिर्फ खाना बनाने , बच्चों का पालन-पोषण और घरु सेवा की जिम्मेदारी के साथ साथ राजनैतिक मामलों में भी हस्तक्षेप कर रही है। उन्हें अपना आदर्श बनाएं।तभी महिला दिवस मनाना सार्थक होंगा।बहनो ,याद रखो हम यदि कमज़ोर रहे तो हमारा देश कमज़ोर रहेगा। हम सब अप्रत्यक्ष तौर पर भी आज़ाद देश में गुलाम ही रह जाएंगे। इसलिए अपनी राजनैतिक चेतना को विकसित कर अपनी जिम्मेदारी निभाने आगे आएं। देश को आधी आबादी की ज़रुरत है।






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