संयुक्त राष्ट्र की 80वीं महासभा न्यूयॉर्क में ‘बेटर टूगेदर’ के नारे के साथ शुरू हुई, जिसमें शांति, विकास और मानवाधिकारों के लिए वैश्विक एकजुटता पर जोर दिया गया। युवा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने अपने विजन में इसे स्पष्ट किया। महासभा में 193 देशों के नेता युद्ध, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास लक्ष्य-2030 पर बहस कर रहे हैं। भारत ने मैत्री, सहयोग और वैश्विक जिम्मेदारी का पक्ष रखते हुए अपने दृष्टिकोण को मजबूती से प्रस्तुत किया, जबकि पाकिस्तान के बयान चर्चा में रहे।
प्रो. कन्हैया त्रिपाठी
‘बेटर टूगेदर’ की पॉलिसी के साथ संयुक्त राष्ट्र का 80वां सत्र न्यूयार्क में हो रहा है। महासभा की अध्यक्षता कर रहीं ऐनालेना बेयरबॉक ने बेटर टूगेदर के नारे को अपने विजन संकल्प में ही प्रकट किया। वह यह चाहती हैं कि पृथ्वी के समस्त देश एक दूसरे के साथ होकर आगे बढ़ें। संयुक्त राष्ट्र महासभा भारी बहस चल रही है। इस महासभा की खूबसूरती यह है कि कई देश अपने अनचाहे दबाव के साथ भी अपनी अपनी बात कहते हैं। एकजुटता बेहतर शान्ति, विकास और मानवाधिकारों के लिए 80 वर्ष और उससे आगे, इस विमर्श को केंद्र में रखकर यह महासभा बहस करने जा रही है। 80 वर्ष की बहुपक्षीय वकालत करते हुए संयुक्त राष्ट्र ऐसे अनेक उपलब्धियों को अर्जित किया है जिससे मानवता कायम हो। एक लंबी आठ दशक की यात्रा के साथ 80वें पड़ाव पर संयुक्त राष्ट्र की आज यह चिंता है कि पूरा विश्व शांति, विकास, मानवाधिकारों की रक्षा, बंधुत्व व एकता के लिए आज़ क्या करे? संयुक्त राष्ट्र की चिंता विश्व में चल रहे युद्ध, माइग्रेशन, खाद्य आपूर्ति से दूर जनमानस और विभिन्न देशों के बीच अन्तर्विरोध हैं।
संयुक्त राष्ट्र की चिंता है कि 2030 बहुत करीब है और हमने सतत विकास लक्ष्य-2030 के एजेंडे पर ज्यादा उपलब्धियां अर्जित नहीं की। एक और बड़ी समस्या संयुक्त राष्ट्र के समक्ष है उसकी वित्तीय पोषण की चिंता जिससे संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्यों को हासिल किया जा सके। 80वें पड़ाव पर पहुंचे संयुक्त राष्ट्र इससे पूर्व दानदाता देशों से कई बार अपील कर चुका है कि जो देश संयुक्त राष्ट्र मिशन को आर्थिक सहयोग देते हैं, उसे वे समय से दें। उसे निराश न होना पड़े और न ही कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़े लेकिन उसे सही समय पर देश प्रतियुत्तर भी नहीं देते।
संयुक्त राष्ट्र में 80वीं महासभा पूरी दिलचस्प बन गयी है। यहाँ ट्रंप समेत दुनिया के दिग्गज अपनी-अपनी बात कह चुके हैं। ट्रंप द्वारा टेलीप्राम्टर और स्टेयर को लेकर की गयी टिप्पणी सोशल मीडिया में चर्चा के केंद्र में आई। संयुक्त राष्ट्र को दोषारोपण करते हुए ट्रंप ने यह कभी नहीं सोचा कि मेज़बानी करने वाले देश की जिम्मेदारी ज्यादा होती है। वह बोलते हैं तो बोल ही जाते हैं चाहे अपने ही देश की निंदा उसमें क्यों न शामिल हो।
विश्व भर से आए 193 देशों के राष्ट्राध्यक्ष या नॉमित लोग इस महासभा को संबोधित कर रहे हैं जिसकी अध्यक्षता युवा नेत्री ऐनालेना बेयरबॉक कर रही हैं। इस महासभा डिबेट में शिरकत कर रहे संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के ये नेता, युद्धों, निर्धनता, मानवाधिकार उल्लंघन, जलवायु परिवर्तन सहित एसडीजी जैसे अनेक मुद्दों पर अपनी बात दुनिया के साथ साझा करके उस हल को ढूँढने की कोशिश कर हैं जिससे स्थायी शांति की ओर बढ़ा जाए।
महासभा की गतिविधियों में सीधे मुद्दे की बात की जाए तो पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष के वक्तव्यों की ओर दृष्टि जाती है। पाकिस्तान के प्रधान मंत्री के एक-एक बयान झूठ व तिलिस्म से भरे दिखे। झूठ महासभा में यदि पाकिस्तान बोल रहा है तो एक तो वह अपने देश के साथ अहित कर रहा है, दूसरी ओर पूरी दुनिया के सामने अपनी छवि ख़राब कर रहा है। हाल ही में भारत-पाक अंतर्संघर्ष के बारे में उसके द्वारा कही गयी बातों से पाकिस्तान ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह झूठ की पोटली वाला देश है। अपने पड़ोसी देश के बारे में ज़हर उगलना किसी भी राष्ट्र को शोभा नहीं देता। पाकिस्तान ने कुछ ऐसा ही किया।
शाहबाज़ शरीफ के अभिभाषण पर केवल भारत को कष्ट नहीं है, अपितु बलोच के खिलाफ़ जो शाहबाज़ शरीफ ने बातें की हैं उससे बलोचिस्तान के जनमानस को भी मनोवैज्ञानिक रूप से तकलीफ़ पहुँची है। अद्भुत व्यावसायिकता, बहादुरी और सूझबूझ के साथ कई भारतीय विमानों को मार गिराने की बात हो, या युद्धविराम सुनिश्चित करने में मदद के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रशंसा, शरीफ ने यह बताया कि वह अमेरिका के पिछलग्गू हैं और कुछ भी नहीं। वह यह भी कहते रहे कि ट्रंप नोबेल पीस अवार्ड के हक़दार हैं। शरीफ़ ने कश्मीर के मसले को भी पुनः महासभा में उठाकर अपने भीतर भरे भारत के प्रति कलुषता को भी स्पष्ट कर दिया। उनकी परिणामोन्मुखी बातचीत की बात तो छलावा ही है, कश्मीर और जल संसाधनों पर विवाद का रोना भी रोया। शरीफ की दृष्टि में सिंधु जल संधि को भारत द्वारा कथित रूप से स्थगित करना युद्ध की कार्रवाई है। वह चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह की हो। निष्पक्ष जनमत संग्रह के माध्यम से उन्हें आत्मनिर्णय का मौलिक अधिकार प्राप्त हो। भारत को इस प्रकार अस्थिर, विवादित और दोषी ठहराने से बाज नहीं आये शाहबाज़ शरीफ़। शरीफ ने पाकिस्तान बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से शांति, न्याय और विकास के लिए खड़ा होने की बात की। शरीफ का कहना है कि इस 80वीं वर्षगांठ को केवल इतिहास का स्मरण न बनने दें।
आइए हम इतिहास बनाएँ और एक भविष्य की रूपरेखा तैयार करें, जिसमें संयुक्त राष्ट्र वैश्विक भलाई की स्थायी आशा के रूप में हो। लेकिन यदि बाहर कुछ और होगा और भीतर कुछ और तो इससे भी विश्व को परेशानियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं मिलेगा। उन्हें इस बात का पता नहीं कि उनकी इस निरर्थक कोशिश से कुछ भी मिलने वाला नहीं है। समस्या यह है कि चालाक पाकिस्तान व पाकिस्तानी प्रधान मंत्री कभी चीन और कभी अमेरिका को अपनी ढाल बनाकर भारत के सामने चुनौती खड़ा करने की नाकाम कोशिश कर रहा है। यह न केवल भारतीय शांति दृष्टि का अपमान है अपितु भारतीय अस्मिता व उसके संप्रभुता से खेलने का भी प्रयास लगा।
भारत की ओर से देश के विदेश मंत्री एस. जयशंकर अपनी बात संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस बार सम्मिलित हुए। ऐतिहासिक महासभा में ऐतिहासिक अभिभाषण के साथ एस. जयशंकर ने भारत का पक्ष रखा है वह बहुत ही सुर्ख़ियों में है, खासकर सेवा के कार्य की प्रशंसा हो रही है। भारत विश्व में शांति, विकास और मैत्री का पक्षधर रहा है। सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना की गयी है। जबकि विश्व में बढ़ते आतंकवाद और पड़ोसी देश द्वारा भारतीय भूभाग पर समय-समय पर की जाने वाली आतंकवादी घटनाएँ उसके वैश्विक शांति के लिए सदैव चिंता की बात रही है। हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए आतंकी घटनाओं के कारण ऑपरेशन सिंदूर जो परिस्थितियां दोनों देशों के बीच बनी, उससे पूरी दुनिया अब परिचित हो चुकी है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में एस जयशंकर ने भारत की मंशा को अब दुनिया को बता दिया है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद विश्व के विभिन्न देशों में भारतीय शिष्टमंडल द्वारा रखे गए पक्ष की भी चर्चा यदि एस जयशंकर महासभा में रखते तो बात कुछ और होती लेकिन फिर भी जितना उन्होंने कहा उतना भी ठीक है। भारत अंततः विकास और शांति चाहता है। भारत मैत्रीपूर्ण संबंध चाहता है। भारत धर्म के नाम पर कट्टरपंथी ताकतों से बहुत लंबे समय से लड़ता रहा है, इसके खिलाफ आगे भी उसकी लड़ाई जारी रहेगी जबतक कि सभी शांति के मार्ग पर एक साथ नहीं आ जाते। महासभा की अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक का नारा है बेटर टुगेदर, यह बात तो भारतीय शास्त्रों में बहुत पहले ऋग्वेद में कही गयी है-संगच्छध्वं संवदध्वं, जिसका अर्थ है हम सब एक साथ चलें, एक साथ बोलें और हमारे मन एक हों। जयशंकर को यह बताना चाहिए था कि उनके श्लोगन की जड़ें भारत में पहले से विद्यमान हैं तो भारत के बारे में लोगों के भीतर सम्मान और होता। ऐनेलेना भारत से सीधे स्वयं को कनेक्ट करतीं।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के बारे में अवांछित बात सुनकर एक बात अब समझ आ गयी है कि पाकिस्तानी प्रधान मंत्री को उनकी भाषा में ही भारत को ज़वाब देना चाहिए। यदि इससे भारत बचता है तो डिप्लोमेसी को चैलेन्ज किया जाता रहेगा। ऐसा लगता है कि भारत की उदारता ही भारत के लिए अब भारी पड़ने लगी है। यद्यपि जयशंकर ने पहलगाम की बात उठाई और कहा कि हम अपने लोगों की रक्षा करने और देश-विदेश में उनके हितों की रक्षा करने के लिए दृढ़ हैं। इसका अर्थ है आतंकवाद के प्रति शून्य बर्दाश्त, अपनी सीमाओं की मज़बूत सुरक्षा, सीमाओं से परे साझेदारी बनाना और विदेशों में अपने समुदाय की सहायता करना उनकी प्राथमिकता है। थोड़ी तल्ख़ भाषा अंतरराष्ट्रीय मंच पर होती तो और अच्छा होता।
वैसे भारत की ओर से वैश्विक दक्षिण के 78 देशों में, भारत के वित्त योगदान के साथ जो साझेदारी में चल रही और 600 से अधिक विकास परियोजनाओं को भारत संचालित कर रहा है, यह भारत की वैश्विक छवि है। वर्ष 2024 में अफ़ग़ानिस्तान में आए भूकम्प के दौरान भारत की आपात सहायता, म्याँमार में आए भूकम्प में मदद, गोलान पहाड़ियों से लेकर पश्चिमी सहारा और सोमालिया तक के क्षेत्रों में यूएन शान्तिरक्षक के रूप में सेवाओं, अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में विश्वास और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनने की बातें दुनिया के दिलों में जगह बना ली हैं, यह भारत की छवि है। सबसे मुख्य बात जो जयशंकर ने की कि संयुक्त राष्ट्र का नौवाँ दशक नेतृत्व और आशा का होना चाहिए। इस आशा और विश्वास के कारण भारत की प्रशंसा वैश्विक स्तर पर हो रही है और पाकिस्तान के नकारात्मक व चापलूसी भरे शब्द निंदा के पात्र बन चुके हैं। इस 80वीं महासभा से चाहे कोई बात निकले या न निकले, एक बात तो निकलकर आई है कि सबने समझ लिया क्या भारत है और क्या पाकिस्तान।
फिलहाल, यूएन महासभा के 80वें सत्र की उच्चस्तरीय जनरल डिबेट में, भारत और पाकिस्तान ने ‘उत्तर के अधिकार’ जिसे Right of Reply कहा जाता है, का प्रयोग किया। भारतीय प्रतिनिधि ने ज़ोर देकर कहा कि किसी भी स्तर का नाटक और किसी भी स्तर का झूठ, इस तथ्य को नहीं छिपा सकता कि यह वही पाकिस्तान है। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवादी संगठन- Resistance Front का सच सबके सामने है। भारतीय केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में पर्यटकों के बर्बर जनसंहार की ज़िम्मेदारी को किसने बचाया सब जानते हैं। पाकिस्तान को तुरन्त सभी आतंकवादी शिविरों को बन्द करना होगा और भारत में वांछित लोगों को सौंपना होगा। एक ऐसा देश जो लम्बे समय से आतंकवाद को फैलाने और निर्यात करने की परम्परा में डूबा हुआ है, उसे इस उद्देश्य के लिए सबसे हास्यास्पद आख्यान गढ़ने में कोई शर्म नहीं है, यही पाकिस्तान का सच है। यद्यपि पाकिस्तान की ओर से भी इस संदर्भ में कुतर्क पेश किये गए हैं। यथा पाकिस्तान ने कहा कि एक ऐसा देश जो यह तय नहीं कर पा रहा है कि उसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ढोंग करना चाहिए या ख़ुद को दुनिया में दुष्प्रचार का सबसे बड़ा कारखाना बताना चाहिए। यह कुतर्क नहीं तो और क्या है? सब जानते हैं कि पाकिस्तान में लोकतंत्र सेना द्वारा आतंकी द्वारा कितनी बार कुचला गया और कितनी बार रौंदा गया?
सब मिलाकर देखा जाए तो इस महासभा में पाकिस्तान व भारत के बीच तनातनी देखी गयी जो कि एक सच्चे व अच्छे पड़ोसी होने की निशानी नहीं है। अच्छा हो कि दोनों देश एक दूसरे के लिए सहयोगी बनें।
इस पूरी बहस के बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा की इस 80वीं बैठक में मित्र देश भूटान ने भारत की यूएनएससी में स्थान मिलने की वकालत की। ब्राज़ील, जापान के भी नाम लिए जाते रहे लेकिन भूटान एक ऐसा देश है जिसने अपने मित्र धर्म का निर्वाह किया है और भारत के लिए अपना यूएनएससी हेतु समर्थन व्यक्त किया है।





