डॉ. नीलम ज्योति
_15 अगस्त, 1963 को टोरंटो टेलीविजन स्टूडियो में 49 वर्षीय एक ट्रक ड्राइवर थियोडर सेरिओस को लाया गया एक वैज्ञानिक प्रयोग के लिए और अनेक गण्यमान वैज्ञानिकों की उपस्थिति में उनके हाथ में एक नया कैमरा (पोलोराइड) दिया गया।_
सेरिओस ने कैमरे के लेंस को अपने मस्तिष्क से एक फुट की दूरी पर रखकर एक मिनट तक अपलक देखा और फिर शटर दबा दिया।
भौतिकी के नियमों के अनुसार फोटो तो आना चाहिए था सेरिओस के सिर का, लेकिन फोटो आया एक किलेनुमा इमारत का।
कैमरे को घूरते समय सेरिओस ने उसी इमारत की कल्पना अपने मस्तिष्क में की थी। एक अन्य प्रयोग में उसने ताजमहल पर अपना ध्यान केंद्रित किया और कैमरे में आया ताजमहल का फोटो।
सेरिओस पर अमेरिका के कोलरेडो विश्वविद्यालय के डॉक्टर आइस ने लगातार दो वर्ष तक वैज्ञानिक प्रयोग किये। फोटो लेते समय कभी उसकी आँखों पर पट्टी बांधी गयी और कभी फैराडे-कक्ष में जहाँ न रेडियो तरंगें प्रवेश कर सकती हैं और न इलेक्ट्रोमैग्नेटिक यानी विद्युत चुम्बकीय तरंगें।
निस्सरण हॉल में बैठाया गया, लेकिन हर बार उन्ही स्थानों के चित्र फ़िल्म पर अंकित होते थे जिनकी कल्पना शटर दबाने के पूर्व सेरिओस ने की थी।
परामनोविज्ञान से सम्बंधित ये दोनों घटनाएं निस्संदेह वर्तमान युग में आश्चर्यजनक प्रतीत होती हैं लेकिन भारतीय योगविज्ञान के लिए ये कोई नई बात नहीं है।
योगविज्ञान इसे ‘विचार-सम्प्रेषण’ प्रक्रिया’ कहता है जो कठिन तो है, पर असम्भव नहीं।
योग के अनुसार मनःशक्ति, इच्छाशक्ति और विचारशक्ति भले ही तीनों बाहर से भिन्न-भिन्न प्रतीत होती हों लेकिन तीनों का मूलस्रोत एक ही है और वह है–मस्तिष्क की करोड़ों कोशिकाओं से उत्पन्न होने वाली विद्युत चुम्बकीय तरंगें।
वे तरंगें मस्तिष्क में कहां से आती हैं–इसका उत्तर जानने में वैज्ञानिक असमर्थ हों लेकिन योगविज्ञान ने हजारों वर्ष पूर्व निस्संदेह प्राप्त कर लिया था अपनी अंतश्चेतना द्वारा।
मन और प्राण :
ये दोनों ऐसे तत्व हैं जो स्वयं ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। दोनों की अपनी-अपनी तरंगें हैं जो स्वयं एक विशेष प्रकार की विद्युत उत्पन्न करती हैं। प्रकृति के द्वारा पुरुष के शरीर की संरचना में पुरुष का मन धनात्मक ऊर्जा और प्राण ऋणात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है।
स्त्री का मन ऋणात्मक ऊर्जा और प्राण धनात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है। योग-तन्त्र में इस विलक्षण तथ्य का भारी महत्व है जिसे जनसाधारण तथा आज का तथाकथित बुद्धिजीवी नहीं जानता-समझता है तथा ब्राह्मणों और पण्डितों की पोपलीला मानकर अपने को श्रेष्ठ मानता है और भौतिकवादी और पाश्चात्य संस्कृति में रंगे लोग भारत के इन रहस्यमय विचारों को पाखण्ड मानते हैं और उपहास में उड़ाने की कोशिश करते हैं।
कुंवारे स्त्री और पुरुष में दोनों प्रकार की ऊर्जाओं की मात्रा अधिक-से-अधिक होती है। विवाहोपरांत यह मात्रा धीरे-धीरे कम होने लगती है। जैसा कि स्पष्ट है कि ब्रह्मचर्य का यही रहस्य है। यदि विचारपूर्वक देखा जाए तो योग-तांत्रिक साधना-भूमि में ब्रह्मचर्य और इन ऊर्जाओं का भारी महत्व है।इनके सहयोग से साधक अपने गंतव्य-पथ पर अग्रसर होता है।
पुरुष के बायीं ओर स्त्री के बैठने का विधान भारतीय संस्कृति में रखा गया है। स्त्री के बायीं ओर बैठने से तो दोनों के मन और प्राण की धनात्मक और ऋणात्मक ऊर्जाएं आपस में मिलकर एक विशेष प्रकार की विद्युत चुम्बकीय वृत्त का निर्माण करती हैं।
वह वृत्त इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसकी सहायता से दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव से विकीर्ण होने वाली विद्युत चुम्बकीय तरंगें ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाली दिव्य शक्तियों को साधक/साधकों की ओर आकर्षित करती हैं जो साधक/साधकों में दिव्य सिद्धियों के रूप में प्रकाशित होती हैं।
(चेतना विकास मिशन)





