डॉ. प्रिया
आपके हृदय में जो अग्नि जल रही है, उसकी एक खास मात्रा इस शरीर को मिल रही है। उस खास मात्रा में ही यह शरीर जी रहा है, जीवंत है। जरा ही ठंडी हो जाए अग्नि, आप शरीर से टूटने लगे। जरा ज्यादा हो जाए, तो भी टूटने लगे।
यह अग्नि आपके भीतर है।
इस अग्नि का अभी आप एक ही उपयोग जानते हैं, शरीर में जीना। इस अग्नि का एक और उपयोग भी है, इस शरीर के पार उठना। यह अग्नि ऊर्जा है। इस ऊर्जा का वाहन बन सकता है और इससे बाहर जाया जा सकता है। यह अग्नि जैसा शरीर में लाती है, ऐसा ही शरीर के भीतर भी ले जा सकती है।
एक बात सदा स्मरण रखें, जिस रास्ते से आप आते हैं, उसी रास्ते से वापस लौटना पड़ता है। रास्ता वही होता है, सिर्फ दिशा बदल जाती है। यह अग्नि अभी शरीर की तरफ बह रही है। इस अग्नि को शरीर से आत्मा की तरफ बहाने की कला सीखनी पड़ती है।
नाचिकेत अग्नि का पहला सूत्र है कि अग्नि की धारा बदलनी है। अभी यह धारा बाहर की तरफ और नीचे की तरफ है। यह धारा ऊपर की तरफ और भीतर की तरफ होनी चाहिए, पहली बात।
दूसरी बात, इस अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए आपको श्वास लेनी पड़ रही है। इससे विज्ञान भी राजी है, क्योंकि ऑक्सीडायजेशन के बिना आप जी नहीं सकते।
एक दीया जलता है। दीया जलकर क्या कर रहा है? अग्नि है क्या? जब एक दीया जल रहा है, तो दीया नहीं जल रहा, आसपास हवा में जो ऑक्सीजन है, अक्षजन है वह जल रही है। तूफान आ जाए आप डर जाएं कि कहीं दीया बुझ न जाए तो आप एक बर्तन दीए के ऊपर ढांक दें, बचाने के लिए।
हो सकता था तूफान दीए को न बुझा पाता, लेकिन आपका ढंका हुआ बर्तन बहुत जल्दी बुझा देगा। क्योंकि ढंके हुए बर्तन के भीतर की थोड़ी—सी जो ऑक्सीजन है, उसके जल जाने के बाद दीया नहीं जल सकता। दीया बुझ जाएगा।
आपको चौबीस घंटे श्वास लेनी पड़ रही है। एक क्षण भी श्वास रुक जाए कि आप समाप्त हुए। क्योंकि श्वास ऑक्सीजन को भीतर ले जाकर अग्नि को प्रज्वलित कर रही है। आपके जीवन में उतनी ही गति होगी जितनी गहरी आपकी श्वास होगी। आप उतने ही जीवंत और स्वस्थ होंगे, जितनी गहरी श्वास होगी।
जितनी उथली श्वास होगी, आपका जीवन मुर्दा —मुर्दा हो जाएगा। क्योंकि अग्नि कम जल रही है। और हम सब बहुत उथली श्वास ले रहे हैं। कुछ कारण हैं, जिनके कारण हम उथली श्वास ले रहे हैं। और वैज्ञानिक कहते हैं कि जब तक मनुष्य को गहरी श्वास लेना न सिखाया जाए—योग तो बहुत सदियों से कह रहा है —तब तक आदमी पूरी तरह जी ही नहीं पाता। और जो पूरी तरह जी नहीं पाता, उसके पास इतनी ऊर्जा होती ही नहीं कि भीतर की तरफ जा सके।
इसलिए योग ने प्राणायाम की कलाएं खोजीं।
प्राणायाम की कलाएं भीतर की अग्नि को ज्यादा प्रज्वलित करने की हैं, ताकि अतिरिक्त अग्नि भीतर हो, जिसको हम अंतर्यात्रा में उपयोग कर सकें। वह स्थूल है, ईंधन है। पेट्रोल डाल देते हैं गाड़ी में, वह चलती है। पेट्रोल छिपी हुई आग है।
आप भी बिना आग के नहीं जी सकते। सारा जीवन आग से जी रहा है। ये वृक्ष हवा से ऑक्सीजन ले रहे हैं और जी रहे हैं। पशु—पक्षी ऑक्सीजन ले रहे हैं और जी रहे हैं। सारा जीवन आग है। इस आग की गति और मात्रा उतनी ही होगी, जितनी गहरी आपकी श्वास होगी।
लेकिन आदमी..? बच्चे सिर्फ गहरी श्वास लेते हैं। बच्चे को सोता हुआ देखें, तो उसका पेट ऊपर उठता है और नीचे गिरता है। उसकी श्वास ठीक नाभि तक जाती है।
एक बड़े आदमी को सोया हुआ देखें, उसका सीना ऊपर उठता है और गिरता है; उसकी श्वास नाभि तक नहीं जाती। बस ऊपर—ऊपर चली जाती है। और उसके फेफड़ों में कोई तीन हजार छिद्र हैं, जिनमें कोई पाच सौ, सात सौ छिद्रों तक ऑक्सीजन पहुंचती है। बाकी ढाई हजार छिद्रों में कार्बन डाइ ऑक्साइड भरी रह जाती है। वह मृत्यु का लक्षण है। वह मरी हुई गैस है, जिसमें कोई आग नहीं रह गई। हमारे जीवन की हजारों बीमारियां उस मरी हुई गैस के कारण पैदा होती हैं। गहरी श्वास अग्नि को प्रज्वलित करती है।
तो दूसरा सूत्र समझ लें। नाचिकेत अग्नि को प्रज्वलित करना हो, तो जितनी गहरी श्वास हो उतना उपयोगी है। उतने आप भभककर जीएंगे।
इसलिए हम ध्यान के इस पहले चरण में दस मिनट तक गहरी से गहरी श्वास की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में आपकी अग्नि प्रज्वलित हो उठती है। इस प्रज्वलित अग्नि को फिर भीतर ले जाया जा सकता है। नहीं तो आपके पास शक्ति ही नहीं होती कि जो आप भीतर जा सकें। (चेतना विकास मिशन).





