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आपकी हंसी…..चिंदीचोरों जैसा आचरण

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राकेश कायस्थ

विराट बहुमत, अभूतपूर्व जनसमर्थन फिर भी मेयर की कुर्सी हथियाने से लेकर छोटे-बड़े राज्यों में सरकारें गिरवाने तक चिंदीचोरों जैसा आचरण। हरकतें ऐसी हैं, जैसे किसी फॉरच्यून फाइव हंड्रेड कंपनी का मालिक मॉल से आफ्टर शेव लोशन या मोजे चुराता पकड़ा जाये और उसके बाद पूरी बेशर्मी से दांत निपोर दे।

अगर आप सोच रहे होंगे कि सभी संस्थाओं का योजनाबद्ध तरीके से खात्मा पिछले 10 साल का सबसे बड़ा कारनामा है तो आप गलत हैं। असली उपलब्धि तो न्यू इंडिया बनाना है। वो भारत जो अपने नेताओं के चिंदीचोरी वाली हरकतों पर शर्मसार नहीं होता बल्कि लहालोट होता और हमेशा पिछली बार से ज्यादा वोट देता है। यह परिवर्तन भारत ही नहीं पूरे विश्व के लिए आधुनिक काल की सबसे बड़ी घटना है और एक व्यवस्था के रूप में लोकतंत्र की सीमाओं की ओर भी इशारा करता है।

अन्ना हजारे की एक अपील पर भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश में ब्लैक आउट करने वाली जनता, चंद घंटों में लोकपाल विधेयक पास करवाने को आतुर जनता, निर्भया रेप केस में सिर झुकाकर जनाक्रोश को स्वीकार करने वाली सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरती और पुलिस पर हमला करती जनता। आखिर कहां गये वो लोग? आपको ये समझ में आना चाहिए कि बाकी दावों में भले ही अतिरंजना हो लेकिन न्यू इंडिया बनाने का दावा सोलह आने सच है।

अनपढ़ समर्थक सरकार से मिली मार पर उसी तरह गर्व करते हैं, जैसे रोज पिटने को आदी कुछ घरेलू औरतें पति से मिली चोट को उसकी मर्दानगी की निशानी मानकर मुदित होती हैं। पढ़े-लिखे समर्थकों का तो कहना ही क्या! मैंने अपने बचपन में राजीव गांधी सरकार के खिलाफ कलम बुलंद करते बहुत से संपादक, लेखक और कार्टूनिस्ट देखे। उनके यही तेवर मनमोहन सरकार के समय भी थे। ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में आदर भाव था क्योंकि मुझे लगता था कि वो सरकार से सवाल पूछने का अपना बुनियादी फर्ज अदा कर रहे हैं। सवाल ये है कि वे लोग आज क्या कर रहे हैं?

एक हिस्सा सरकार से सवाल पूछने वालों पर ट्रोल की तरह हमलावर है, दूसरा खामोश और अपनी ओजस्वी वाणी के लिए मशहूर तीसरा धड़ा छायावादी किस्म बहुअर्थीय के छंद पढ़ रहा है। समझना कठिन नहीं है कि महाभारत इस देश की श्रेष्ठतम साहित्यिक रचनाओं में क्यों हैं और कुरु दरबार में बैठे भीष्म और विदुर अब प्रासंगिक क्यों है। रघुवीर सहाय की कविता आपकी हंसी ही हमारे समय का सबसे बड़ा सच है—

निर्धन जनता का शोषण है
कह कर आप हँसे
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है
कह कर आप हँसे
सबके सब हैं भ्रष्टाचारी
कह कर आप हँसे
चारों ओर बड़ी लाचारी
कह कर आप हँसे
कितने आप सुरक्षित होंगे
मैं सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पा कर
फिर से आप हँसे

Ramswaroop Mantri

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