
डॉ. सलीम खान ,मुंबई
मानसून सत्र में सरकार को घेरने के लिए विपक्ष के पास पहले से ही जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला था, अब इसमें पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का मुद्दा भी जुड़ गया है। अगर कांग्रेस या इंडिया गठबंधन मौजूदा हालात में धनखड़ को सार्वजनिक रूप से विदाई देने का ऐलान कर दे, तो सरकार के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। क्योंकि इसे रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं है। और अगर धनखड़ बोलते हैं, तो क्या बोलेंगे, यह कहना मुश्किल है — क्योंकि पहले भी पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का अनुभव बेहद तीखा रहा था, जिन्होंने पुलवामा हमले पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था।
जहां तक जस्टिस वर्मा का सवाल है, तो मामला मार्च में उस वक्त सुर्खियों में आया जब दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास में आग लगने के बाद भारी मात्रा में जली हुई नकदी मिली। दिल्ली फायर ब्रिगेड और पुलिस जब मौके पर पहुंची, तो लाखों रुपये के जले नोट बरामद हुए। इसके बाद 22 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की जांच कमेटी गठित की। उस वक्त वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में जज थे। इसके कुछ दिनों बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया।
जस्टिस वर्मा का कहना है कि पहले यह साबित किया जाए कि नकदी किसकी थी। उल्टा, जांच समिति ने उनसे ही यह साबित करने को कह दिया कि नकदी उनकी नहीं थी। तीन जजों की इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में वर्मा को ‘दुराचार’ का दोषी ठहरा दिया। 3 मई को यह रिपोर्ट चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को सौंपी गई और 8 मई को उन्होंने यह रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दी। अब उनके खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी हो रही है। चीफ जस्टिस बी. आर. गोई ने यह कहते हुए खुद को इस मामले से अलग कर लिया कि वह पहले इस कमेटी में शामिल थे।
केंद्र सरकार जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए गंभीर दिख रही है, लेकिन नोटों के असली मालिक को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कुछ लोग शक की सुई पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की ओर घुमा रहे हैं, क्योंकि वर्मा उनके करीबी माने जाते हैं। गौरतलब है कि पीएम मोदी खुद चंद्रचूड़ के घर गणेश पूजन में गए थे। दिलचस्प बात यह है कि पहले धनखड़ को हटाया गया, अब वर्मा को हटाने की कोशिश चल रही है। अगर आगे चलकर पता चला कि जली हुई नकदी का रिश्ता चंद्रचूड़ से है, तो उन्हें भी ‘झोला उठाकर’ जाना पड़ सकता है, और मोदी सरकार को बड़ा झटका लगेगा।
यह मामला मुम्बई ट्रेन धमाकों से भी मिलता-जुलता है। जैसे वर्मा कह रहे हैं कि बरामद नकदी उनकी नहीं, वैसे ही मुम्बई धमाकों के आरोपी भी कह रहे थे कि उन्हें झूठा फंसाया गया। सत्र न्यायालय ने उन्हें दोषी ठहराया लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। अब सवाल यह है कि धमाके किसने किए? अगर दोषी ये नहीं थे, तो असली गुनहगार कौन है?
जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर जांच समिति की रिपोर्ट को खारिज करने की मांग की है। वरिष्ठ वकील और सांसद कपिल सिब्बल ने वर्मा की ओर से बहस करते हुए कहा कि याचिका में संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं, इसलिए इसकी त्वरित सुनवाई होनी चाहिए। ठीक इसी तर्ज पर मुंबई धमाकों के मामले में सरकारी वकील तुषार गांधी ने भी संवैधानिक पहलुओं की दुहाई दी थी।
वर्मा की शिकायत है कि जांच समिति ने उन्हें अपनी बात रखने का पर्याप्त मौका नहीं दिया और पूर्व निर्धारित राय के आधार पर निष्कर्ष पर पहुंच गई। वही शिकायत मुम्बई धमाकों के निर्दोष मुसलमानों की थी— कि एटीएस ने पहले से ही उनका नाम तय कर रखा था और जबरन कुबूलनामे लिए। फर्क सिर्फ इतना है कि जस्टिस वर्मा पुलिस की थर्ड डिग्री से बच गए, वरना उनका भी कोई ‘कबूलनामा’ मिल जाता।
वास्तव में, भारत का संविधानिक चरित्र कभी यह दावा नहीं करता था कि यहां अन्याय नहीं होता, बल्कि यह गर्व किया जाता था कि अन्याय संविधान के पर्दे में ढका होता है। चुनावों में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग, ईडी-सीबीआई की धमकी, विधायकों की खरीद-फरोख्त जैसे गैरकानूनी काम भी “कानूनी” लगते थे। मगर उपराष्ट्रपति जैसे पद से जबरन छुट्टी कर देना और फिर ग़ायब कर देना— यह मामला अब संविधान की मर्यादा को भी लांघ गया है।
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पिछले कई दिनों से नदारद हैं, न तो सरकार उन्हें सामने लाना चाहती है, न मीडिया उनसे कोई सवाल कर रहा है। क्या वजह है कि एक संवैधानिक पद से हटने के बाद वह अचानक गुम हो गए? विपक्षी दल उनसे मिलना चाहते हैं, मगर उन्हें मिलने नहीं दिया जा रहा। आखिर सरकार को उनसे इतना डर क्यों है?
प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देना होगा कि उन्होंने भारतीय राजनीति के चेहरे से वो मुखौटा उतार फेंका है, जिससे जनता अब तक बहकती आई थी। जस्टिस वर्मा का मामला इतना उलझा हुआ है कि मुंबई लोकल की पटरियों को भी मात दे दे। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई किस मोड़ पर जाती है।





