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 श्रम कानून सुधारों के बहाने नई गुलामी का युग:मनुस्मृति की वापसी?

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–      तेजपाल सिंह ‘तेज’

          किसी भी सभ्यता का असली चेहरा इस बात से नहीं पहचाना जाता कि उसने कितनी ऊंची इमारतें बनाई, बल्कि इस बात से कि उसने अपने श्रमिकों और नागरिकों के लिए कितनी जगह छोड़ी। भारतीय इतिहास का पथ केवल संस्कृति या धर्म की दृष्टि से नहीं, बल्कि श्रम के मूल्यांकन से भी निर्धारित हुआ है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता ने श्रम को सामूहिकता का प्रतीक माना था, वहीं वैदिक और ब्राह्मणिक युग में धीरे-धीरे यह श्रम “जातीय  विभाजन” में बाँट दिया गया। मनुस्मृति ने इस विभाजन को धार्मिक वैधता दी — जहाँ विचार करने वाले “ऊँचे” और काम करने वाले “नीचे” समझे गए। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश पूंजी ने इस मानसिकता का उपयोग किया —भारतीय श्रम को सस्ते माल और निर्यात का साधन बनाया गया। आजादी के बाद, संविधान ने पहली बार इस श्रम को सम्मान दिया। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान निर्माण के साथ-साथ श्रमिकों के अधिकारों की आधारशिला रखी। 1948 का फैक्ट्री अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम, और यूनियनों का गठन — यह सब स्वतंत्र भारत की सामाजिक क्रांति के कदम थे। परंतु आज, लगभग 75 वर्षों बाद, हम एक नए दौर के सामने खड़े हैं जहाँ यह इतिहास उलट रहा है। “Ease of Doing Business”, “Reforms”, “Productivity” जैसे शब्द वही भूमिका निभा रहे हैं जो कभी “धर्म” और “वर्ण” निभाते थे —
सत्ता को नैतिक रूप से उचित ठहराने की। जब महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य 12 घंटे कार्य-दिवस और ठेकेदारी श्रम को कानूनी रूप दे रहे हैं, तो यह केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि मानव-स्वतंत्रता के विचार पर पुनः आक्रमण है।

          इस संदर्भ में यह प्रश्न स्वाभाविक है — क्या भारत 21वीं सदी में प्रवेश कर रहा है या
मनुस्मृति के सामाजिक दर्शन की ओर लौट रहा है? इसी प्रश्न के उत्तर की खोज यह लेख करता है — ऐतिहासिक और समकालीन दोनों दृष्टियों से।

 

एक ऐसा सुधार” जो सुधार नहीं :

          जिस मजदूर को आप घर में काम करने के लिए बुलाते हैं, वो आदमी भी 8 घंटे पैसे लेता है, बीच में एक घंटा आराम करता है।लेकिन जहाँ आप काम करेंगे, वो कॉर्पोरेट आपका तेल निकालने के लिए आज़ाद है, क्योंकि इस देश में अब श्रम कानूनों में बदलाव हो रहे हैं, और जिसे डेटा कहते हैं, अब पूरी दुनिया में, भारत में सबसे ज़्यादा काम के घंटे होंगे। अगर आप दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहर में रहते हैं, तो घर जाते ही सो जाएँगे, और उठते ही दफ़्तर चले जाएँगे। आपके बच्चे आपका चेहरा नहीं देख पाएंगे, आप अपने बच्चों को पहचान नहीं पाएँगे।

आपकी पत्नी बस आपके सोने का इंतज़ार करेगी, कि आप घर जाएंगे, सोएंगे और अगले दिन चले जाएँगे। आदर्श स्थिति तो यही है कि 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, यानी नींद, और 8 घंटे परिवार के लिए, या अपनी पसंद के मनोरंजन के लिए, किसी भी व्यक्ति से लिए जाने चाहिए। यह सौ साल पुरानी व्यवस्था है। हम इस पर आगे आएंगे। यह जानना ज़रूरी है कि अभी क्या हो रहा है। महाराष्ट्र में काम के घंटों से जुड़े क़ानून में बदलाव किया जा रहा है। दुनिया के सारे मानक इसके ख़िलाफ़ हैं। आगे बताऊँगा कि किस तरह का विरोध है। यहाँ तो रोजाना काम के घंटे, ड्यूटी 12 घंटे की कर दी गई है।

          भारत के समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में “सुधार” शब्द अब धीरे-धीरे “शोषण” का पर्याय बनता जा रहा है। ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के नाम पर जो नीतियां लागू की जा रही हैं, उनका असली उद्देश्य नागरिकों या श्रमिकों के जीवन को सहज बनाना नहीं, बल्कि पूंजीपतियों के मुनाफे को सहज बनाना है।महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और अन्य राज्यों में 12 घंटे कार्य-दिवस की कानूनी स्वीकृति इसी प्रवृत्ति का चरम उदाहरण है। यह सिर्फ़ एक आर्थिक निर्णय नहीं है — यह सभ्यता की दिशा तय करने वाला कदम है। जहाँ पहले “8 घंटे काम, 8 घंटे विश्राम, 8 घंटे अपने परिवार और समाज के लिए” — यह औद्योगिक युग की उपलब्धि मानी जाती थी,

          वहीं अब भारत उस इतिहास को उलटने की तैयारी में है। यह बदलाव उस दिशा की ओर इशारा करता है जहाँ मनुष्य नहींमुनाफ़ा केंद्र में होगा। जहाँ काम करने वाला व्यक्ति “कर्मचारी” नहीं बल्कि “संसाधन” (resource) कहलाएगा। और यह परिवर्तन, प्रतीकात्मक रूप से, मनुस्मृति के पुनर्स्थापन का ही रूपक बनता जा रहा है — जहां समाज की व्यवस्था कुछ गिने-चुने लोगों के लिए तय होती थी, और श्रम करने वाले वर्ग को “सेवक” बनाकर रखा जाता था।

1. श्रम सुधार या श्रम विघटन : कानूनी ढांचे की समीक्षा:

1.1 फैक्ट्री अधिनियम का संशोधन और उसका प्रभाव:

          1948 का Factories Act भारतीय श्रमिक आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि था।
इसने कार्य-घंटों, सुरक्षा, और विश्राम के अधिकार को मान्यता दी थी। लेकिन 2020 के बाद से केंद्र सरकार ने “श्रम सुधार” के नाम पर चार नये कोड बनाए —

·         वेतन संहिता,

·         औद्योगिक संबंध संहिता,

·         व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-स्थितियाँ संहिता,

·         सामाजिक सुरक्षा संहिता।

          काग़ज़ पर यह “सरलीकरण” कहा गया, पर वस्तुतः यह श्रमिक अधिकारों का संकुचन है। अब राज्य सरकारें अपनी सुविधानुसार नियम बदल सकती हैं। महाराष्ट्र में 12 घंटे कार्य-दिवस को वैध कर देना इसी नीति की उपज है। पहले जहाँ 8 घंटे काम और 48 घंटे साप्ताहिक सीमा तय थी, अब “लचीलापन” के नाम पर इसे 12 घंटे तक खींच दिया गया है। ‘लचीलापन’ सुनने में आकर्षक लगता है, पर असल में यह पूंजी का लचीलापन हैश्रम का नहीं

2. पूंजी का चरम और मानव का क्षरण:

2.1 ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस : किसके लिए आसान?

          विश्व बैंक की “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” रैंकिंग ने विकास का जो नया मानक बनाया है, उसमें मानव कल्याण का कोई मापदंड नहीं है। किसी देश में कानून कितने सख़्त हैं या कितने ढीले — यह अब विदेशी निवेशकों के लिए सुविधा का प्रश्न बन गया है। भारत ने जब श्रम कानूनों को ढीला किया, तो निवेशक खुश हुए — लेकिन श्रमिकों की जीवन-गुणवत्ता का क्या हुआ, यह किसी रिपोर्ट में नहीं आता। दरअसल यह एक नए प्रकार की आर्थिक दासता है, जिसमें कानूनी शोषण को “प्रगति” का नाम दिया गया है।

2.2 ‘मानव संसाधन’ : शब्दों में छिपा दर्शन

          “Human Resource Management” — इस शब्दावली में ही वह दृष्टिकोण छिपा है जो आज के श्रम कानूनों के पीछे है। मनुष्य अब “resource” यानी उपयोग की वस्तु है।उसकी थकान, उसकी नींद, उसका परिवार — सब गौण हैं। मुख्य बात है — उत्पादकता और लाभ।

यही मनोविज्ञान मनुस्मृति की दास-व्यवस्था से मिलता-जुलता है। जहाँ कुछ वर्ग “सेवक” थे और कुछ “भोगकर्ता”।

3. मनुस्मृति का प्रतिरूप : श्रम व्यवस्था का सामंती पुनर्जागरण:

          मनुस्मृति केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं थी; वह एक सामाजिक नियंत्रण का दस्तावेज़ थी।
उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि समाज में कुछ लोग केवल सेवा के लिए हैं, उनका कर्तव्य श्रम करना है, और अधिकार शून्य हैं। आधुनिक श्रम सुधारों में जब हम यह देखते हैं कि—

Ø कार्य घंटे बढ़ाए जा रहे हैं,

Ø यूनियन अधिकार सीमित किए जा रहे हैं,

Ø शिकायत या हड़ताल पर रोक लगाई जा रही है,

Ø अनुबंधित और अस्थायी नौकरियाँ स्थायी नौकरियों की जगह ले रही हैं, तो यह साफ झलकता है कि यह उसी सामाजिक मनोविज्ञान की आधुनिक पुनरावृत्ति है — जहाँ उत्पादन करने वाला वर्ग नियंत्रितअनुशासित और आज्ञाकारी रखा जाता है। मनुस्मृति की भाषा में कहें तो — “श्रमिक” आज का “शूद्र” बन चुका है। और यह पुनर्स्थापन धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक-आर्थिक संरचना के माध्यम से किया जा रहा है।

4. लोकतंत्र में गुलामी : श्रम और नागरिकता का अंतर्संबंध:

4.1 समय का छिन जानालोकतंत्र का खो जाना:

          संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणा पत्र (1948) के अनुच्छेद 24 में कहा गया है—“हर व्यक्ति को विश्राम और अवकाश का अधिकार है, जिसमें कार्य-घंटों की उचित सीमा और नियमित अवकाश शामिल हैं।” जब एक व्यक्ति 12 घंटे काम करेगा, फिर यात्रा में 2-3 घंटे लगाएगा, तो उसके पास परिवारसमाज या राजनीति के लिए कोई समय नहीं बचेगा। ऐसा व्यक्ति नागरिक नहीं, केवल श्रमिक रह जाएगा — जो वोट डाल सकता है, पर सोचने की फुर्सत नहीं रखता। यह लोकतंत्र का श्रमिक संस्करण है, जिसमें जनता को बोलने की आज़ादी है लेकिन सुनने वाला कोई नहीं।

 

4.2 स्त्री और परिवार पर प्रभाव:

          जब घर के दोनों सदस्य लंबी शिफ्टों में काम करते हैं, तो परिवार का सामाजिक ढाँचा बिखरने लगता है। बच्चे “डे-केयर” संस्थानों या मोबाइल स्क्रीन के सहारे बड़े होते हैं। समाज में स्नेहसमय और संवाद — तीनों का संकट बढ़ता है। मनुस्मृति के समाज में स्त्री का काम केवल घर संभालना था; अब पूंजीवादी समाज में वह “दोहरी गुलामी” झेल रही है —कार्यालय में आर्थिक दबाव और घर में भावनात्मक दायित्व। 12 घंटे कार्य-दिवस ने स्त्रियों को और अधिक अदृश्य श्रम के बंधन में डाल दिया है।

5. अंतरराष्ट्रीय मानक और भारतीय विचलन:

5.1 वैश्विक श्रम अधिकार : एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

          1919 में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने “8 घंटे कार्यदिवस” और “48 घंटे साप्ताहिक सीमा” को मानवीय कार्य का मानक माना था। 1886 के शिकागो मजदूर आंदोलन ने यह अधिकार दिलाया —“Eight hours for work, eight hours for rest, eight hours for what we will.” इसके बाद फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, जापान, अमेरिका — सभी देशों ने इस मानक को अपनाया। कहीं भी 12 घंटे कार्य-दिवस कानूनी नहीं है। भारत, जो ILO का संस्थापक सदस्य था, आज उन्हीं सिद्धांतों से विचलित होकर अपने ही इतिहास से पलट रहा है।

5.2 स्वास्थ्य और उत्पादकता पर प्रभाव:

          WHO और ILO की संयुक्त रिपोर्ट (2021) के अनुसार —जो लोग 55 घंटे से अधिक साप्ताहिक काम करते हैं, उनमें हृदयाघात का खतरा 35% और स्ट्रोक का खतरा 17% बढ़ जाता है। अत्यधिक श्रम से उत्पादकता घटती है, सृजनात्मकता मरती है। 12 घंटे काम करने वाला व्यक्ति मशीन तो बन सकता है, पर सृजनशील नागरिक नहीं।

6. श्रम बाजार में ठेकेदारी और अस्थिरता : पूंजी के नए औजार:

          नए श्रम कोड ने “कॉण्ट्रैक्ट वर्क” और “फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट” को वैधता दी है।इसका अर्थ है कि कोई भी कंपनी स्थायी भर्ती से बच सकती है। मजदूरों की यूनियन कमजोर होती हैं, क्योंकि उनका रोजगार अस्थायी होता है। यह वही रणनीति है जो ब्रिटिश औपनिवेशिक  शासन  ने अपनाई थी — “Divide and Rule” की तरह, अब “Hire and Fire” का युग है।
आज के ठेका श्रमिक वही हैं जो कभी नील मजदूर या इंडेंटेड लेबर कहलाते थे।

7. श्रम कानून और सामाजिक नैतिकता : भारतीय संदर्भ में :

          भारतीय समाज में श्रम हमेशा से नीच काम माना गया। ब्राह्मणिक व्यवस्था में मानसिक श्रम को श्रेष्ठ और शारीरिक श्रम को अधम समझा गया। इस दृष्टि ने आधुनिक औद्योगिक संबंधों में भी प्रवेश किया है। इसलिए जब मजदूर अपने अधिकार की बात करता है, तो उसे “अराजक”, “देशविरोधी” या “लेफ्टिस्ट” कहकर हाशिए पर डाल दिया जाता है। वास्तव में यह विचारों की जातिवादिता है, जो अब आर्थिक रूप ले चुकी है। मनुस्मृति कहती थी — “शूद्र को शिक्षा, संपत्ति और स्वतंत्रता का अधिकार नहीं।” आज वही विचार आर्थिक भाषा में बोला जा रहा है —“श्रमिक को नीति-निर्माण में भागीदारी का अधिकार नहीं।”

8. श्रम और नैतिक सभ्यता का प्रश्न:

          सभ्यता की पहचान केवल तकनीकी प्रगति से नहीं होती, बल्कि यह इस बात से तय होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करती है। भारत अगर 12 घंटे का श्रम दिवस लागू करता है, तो वह तकनीकी रूप से आधुनिक लेकिन नैतिक रूप से  मध्यकालीन हो जाता है। जो समाज अपने श्रमिक को थकाकर रख देता है, वह अंततः अपने ही लोकतंत्र को कमजोर करता है। क्योंकि जब श्रमिक सो नहीं पाएगा, सोच नहीं पाएगा, तो सत्ता से प्रश्न भी नहीं पूछ पाएगा।

9. सामाजिक हित और भविष्य की संभावनाएँ:

9.1 नागरिक प्रतिरोध और नीति सुधार:

          भविष्य में दो रास्ते संभव हैं —पहला, समाज इस बदलाव को स्वीकार कर ले और धीरे-धीरे “कामकाजी गुलामी” उसकी नियति बन जाए। दूसरा, नागरिक समाज, यूनियन, छात्र संगठन और बुद्धिजीवी मिलकर श्रमिक अधिकारों को पुनः मानवीय अधिकारों के रूप में स्थापित करें। शिक्षित मध्यमवर्ग, जो कॉर्पोरेट दफ्तरों में “कर्मचारी” है, उसे समझना होगा कि वह भी मजदूर है —बस उसका कार्यस्थल वातानुकूलित है।

9.2 वैकल्पिक नीतियाँ:

          भारत को इस दिशा में जाना चाहिए—घंटे कार्य-दिवस और दिन कार्य-सप्ताह की नीति,

·         ठेकेदारी को नियंत्रित करने के सख्त प्रावधान,

·         न्यूनतम वेतन की गणना “जीवन गुणवत्ता” के आधार पर,

·         परिवार, शिक्षा और सामाजिक सहभागिता के लिए समय का अधिकार।

यह केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि सभ्यता सुधार होगा।

10. मनुष्य बनाम मशीन का संघर्ष:

          भारत आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह तय कर सकता है कि उसका भविष्य मानव-केंद्रित होगा या पूंजी-केंद्रित। 12 घंटे कार्य-दिवस का कानून सिर्फ़ मजदूरों की थकान नहीं बढ़ाएगा — यह समाज की संवेदना को कुंद कर देगा। मनुस्मृति के युग में भी व्यवस्था इसी तरह बनी थी — कुछ वर्ग सोचते थे, बाकी काम करते थे। आज वही व्यवस्था आर्थिक रूप में लौट रही है —जहाँ सोचने का काम कुछ बोर्डरूम करते हैं, और बाकी समाज बस “डेडलाइन” पूरी करता है। यह लेख केवल विरोध नहीं, चेतावनी है —कि यदि हमने इस प्रवृत्ति को नहीं रोका, तो आने वाले दशकों में भारत एक ऐसा देश बन जाएगा जहाँ काम करने वाले जीवित तो होंगेपर जी नहीं रहे होंगे। अंततः, सभ्यता का मापदंड GDP नहीं, बल्कि यह है कि वह अपने श्रमिक को कितना सम्मानसमय और जीवन देती है। यदि हम इस सत्य को भूल गए, तो यह श्रम कानून नहीं, भारत की आत्मा के खिलाफ बना हुआ कानून होगा —जो मनुस्मृति के शब्दों में नहीं, पर उसी आत्मा में लिखा गया है।

निष्कर्ष : मानव से मशीन बनने की यात्रा:

          भारत आज जिस रास्ते पर जा रहा है, वह केवल औद्योगिक या आर्थिक नीति का नहीं,
बल्कि नैतिक दिशा का प्रश्न है। 12 घंटे कार्य दिवस की स्वीकृति एक प्रशासनिक निर्णय नहीं —
यह मानव गरिमा पर आघात है। यदि यह प्रवृत्ति नहीं रुकी, तो आने वाली पीढ़ियां “काम करने” के लिए तो जीवित रहेंगी, पर “जीने” का अर्थ भूल जाएँगी। यह वही समाज होगा जो मनुस्मृति ने कल्पित किया था — जहाँ श्रम करने वाला वर्ग आज्ञाकारी, मौन और असहाय हो, और ऊपर बैठे कुछ लोग धर्म, नीति या “विकास” के नाम पर उसका शोषण करें। इसलिए यह संघर्ष केवल श्रम कानूनों का नहीं है — यह मानवता बनाम मनुवाद का संघर्ष है। और इस संघर्ष का केंद्र प्रश्न यही है —क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मनुष्य मशीन से अधिक मूल्यवान रहेगा? या फिर हम उस युग में लौट रहे हैं जहाँ श्रम केवल दासत्व का नाम था?

Ramswaroop Mantri

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