अग्नि आलोक
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*शनिवारी मेरा कोना -विवेक मेहता* 

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           उपराष्ट्रपति जी को अचानक मालूम हुआ कि उनका स्वास्थ्य खराब है। उन्हें किसी ने बताया कि बीमारी  ऐसी है कि बिना इस्तीफा दिए ठीक नहीं हो सकती। बताने वाला कोई बड़ा वैद्य-हकीम ही रहा होगा। वह कौन था यह आज तक किसी को नहीं मालूम। इस कारण वे किसी अस्पताल में भर्ती नहीं हुए। उनके स्वास्थ्य का कोई बुलेटिन नहीं आया। कोई बड़ा नेता, मंत्री, सांसद उनका हाल-चाल लेने नहीं गया। कई बीमारियों के इलाज का तरीका अलग होता है। शायद इस बीमारी का इलाज इस्तीफा रहा हो। इस्तीफा देते ही उनका स्वास्थ्य ठीक-ठाक हो गया लगता है। जिन लोगों की पहचान कुर्सी के कारण होती है वह कुर्सी खिसकते ही लोगों की नजरों से भी फिसल जाते हैं। मीडिया वाले, यूट्यूब वाले अपनी-अपनी धारणाएं प्रस्तुत कर खीर-पुरी का जुगाड़ कर रहे हैं और अपने साथ-साथ देश का भी समय काट  रहें हैं। इस पूरे मामले में जिन लोगों ने स्वास्थ्य बिगाड़ा था वे चुप हैं। इन सब बातों का टांका गुजरात से भिडता है इसलिए अपुन को एक सुनी सुनाई गुजराती लोककथा की याद आ गई। आप भी आनंद लीजिए और इच्छा हो तो अपनी अपनी सोच के अनुसार पात्रों पर चरित्रों को आरोपित कर व्याख्या  कर लीजिए।

                 पगड़ी के ढोल तो बाद में बजेंगे 

            जैसा कि पुराने जमाने में हर एक गांव में होता था, वैसे ही एक गांव में एक नगर सेठ रहता था। बोलने में कंजूस परंतु मीठा। एक भी शब्द व्यर्थ नहीं बोलता। दमड़ी को दांतों से पकड़ता। धन का अकूत भंडार उसके पास जमा था। परंतु उसकी भूख थी कि मिटती ही नहीं। इसलिए गांव में उसके दोस्त कम दुश्मन ज्यादा थे। उस गांव के आसपास के क्षेत्रों में चोरों  का आतंक था। वे अकेले-दुकेले चोरी करते। उनकी इन हरकतों से पूरा राज्य परेशान था। राजा ने चोरों को पकड़ने के लिए ईनाम की घोषणा भी कर रखी थी। एक दिन चोरों का सरदार नगर सेठ के यहां चोरी करने पहुंच गया। उसने तिजोरी खोली ही थी कि नगर सेठ के लड़के को भनक लग गई। उसने एक भारी सामान उठाकर चोर के सिर पर दे मारा। अचानक हुए हमले से चोरों का सरदार मर गया। सेठ का बेटा घबरा कर चीखने-चिल्लाने लगा। घर के सब लोग जाग गए। रोशनी की गई। लड़के ने जब रोशनी में चोर का चेहरा देखा तो ईनाम का लालच उसके मन में उठा। वह खुश होकर पिता से बोला- “ बापू, हमें तो ईनाम मिलेगा।” सेठ बोला- “ ईनाम विनाम को भूल जा। जाकर कोटवार को बुलाकर लाओ। बोलना पिताजी ने बुलाया है शीघ्र।” 

                   दो पैसों की कमाई होगी इस लालच में कोटवार सेठ के घर पहुंचा। सेठ ने सब बातें उसे बताई और बोला- “ मलिक, हम सच बात बोलेंगे तो कोई मानेगा नहीं। लोग कहेंगे जो चींटी नहीं मार सकता वह चोर को क्या मारेगा? आप जब कहेंगे कि मैं रात्रि भ्रमण पर था। चोर को घर में घुसते देखा तो मैंने पीछा किया। पकड़ने की कोशिश की उसमें चोर मारा गया तो लोग विश्वास भी करेंगे। आपकी इज्जत भी बढ़ेगी और राजा की नजरों में आपका महत्व भी बढ़ेगा। ” 

     सेठ के द्वारा इनाम की रकम का यूं त्याग करना कोटवार को आश्चर्यजनक लगा। पर पक्की पकाई थाली परोसी हुई हो तो कौन खाना नहीं चाहेगा। कोतवाल ने यहीं बात सबको बताई। कोतवाल को इनाम मिला। गांव वालों ने उसकी जय-जयकार करते हुए सम्मानित किया। उसे पगड़ी पहनाई। यह देखकर सेठ का लड़का बोला- “ पिताजी, आप मेरा भला नहीं चाहतें। मेरा नाम होते हुए देख नहीं सकतें। यह सब जय-जयकार और पैसा हमारा होता। ” 

       दांतों में दमड़ी पकड़ने वाला सेठ चुप रहा। कुछ दिनों बाद, गर्मी की एक रात में कोतवाल खुले में बाहर चारपाई पर सोया था कि चोर के साथियों ने उसकी गर्दन काट दी। समाचार सुनकर सेठ बेटे से बोला- “ देखा ना पगड़ी के ढोल बज गए। ”

           उपराष्ट्रपति जी को अचानक मालूम हुआ कि उनका स्वास्थ्य खराब है। उन्हें किसी ने बताया कि बीमारी  ऐसी है कि बिना इस्तीफा दिए ठीक नहीं हो सकती। बताने वाला कोई बड़ा वैद्य-हकीम ही रहा होगा। वह कौन था यह आज तक किसी को नहीं मालूम। इस कारण वे किसी अस्पताल में भर्ती नहीं हुए। उनके स्वास्थ्य का कोई बुलेटिन नहीं आया। कोई बड़ा नेता, मंत्री, सांसद उनका हाल-चाल लेने नहीं गया। कई बीमारियों के इलाज का तरीका अलग होता है। शायद इस बीमारी का इलाज इस्तीफा रहा हो। इस्तीफा देते ही उनका स्वास्थ्य ठीक-ठाक हो गया लगता है। जिन लोगों की पहचान कुर्सी के कारण होती है वह कुर्सी खिसकते ही लोगों की नजरों से भी फिसल जाते हैं। मीडिया वाले, यूट्यूब वाले अपनी-अपनी धारणाएं प्रस्तुत कर खीर-पुरी का जुगाड़ कर रहे हैं और अपने साथ-साथ देश का भी समय काट  रहें हैं। इस पूरे मामले में जिन लोगों ने स्वास्थ्य बिगाड़ा था वे चुप हैं। इन सब बातों का टांका गुजरात से भिडता है इसलिए अपुन को एक सुनी सुनाई गुजराती लोककथा की याद आ गई। आप भी आनंद लीजिए और इच्छा हो तो अपनी अपनी सोच के अनुसार पात्रों पर चरित्रों को आरोपित कर व्याख्या  कर लीजिए।

                 पगड़ी के ढोल तो बाद में बजेंगे 

            जैसा कि पुराने जमाने में हर एक गांव में होता था, वैसे ही एक गांव में एक नगर सेठ रहता था। बोलने में कंजूस परंतु मीठा। एक भी शब्द व्यर्थ नहीं बोलता। दमड़ी को दांतों से पकड़ता। धन का अकूत भंडार उसके पास जमा था। परंतु उसकी भूख थी कि मिटती ही नहीं। इसलिए गांव में उसके दोस्त कम दुश्मन ज्यादा थे। उस गांव के आसपास के क्षेत्रों में चोरों  का आतंक था। वे अकेले-दुकेले चोरी करते। उनकी इन हरकतों से पूरा राज्य परेशान था। राजा ने चोरों को पकड़ने के लिए ईनाम की घोषणा भी कर रखी थी। एक दिन चोरों का सरदार नगर सेठ के यहां चोरी करने पहुंच गया। उसने तिजोरी खोली ही थी कि नगर सेठ के लड़के को भनक लग गई। उसने एक भारी सामान उठाकर चोर के सिर पर दे मारा। अचानक हुए हमले से चोरों का सरदार मर गया। सेठ का बेटा घबरा कर चीखने-चिल्लाने लगा। घर के सब लोग जाग गए। रोशनी की गई। लड़के ने जब रोशनी में चोर का चेहरा देखा तो ईनाम का लालच उसके मन में उठा। वह खुश होकर पिता से बोला- “ बापू, हमें तो ईनाम मिलेगा।” सेठ बोला- “ ईनाम विनाम को भूल जा। जाकर कोटवार को बुलाकर लाओ। बोलना पिताजी ने बुलाया है शीघ्र।” 

                   दो पैसों की कमाई होगी इस लालच में कोटवार सेठ के घर पहुंचा। सेठ ने सब बातें उसे बताई और बोला- “ मलिक, हम सच बात बोलेंगे तो कोई मानेगा नहीं। लोग कहेंगे जो चींटी नहीं मार सकता वह चोर को क्या मारेगा? आप जब कहेंगे कि मैं रात्रि भ्रमण पर था। चोर को घर में घुसते देखा तो मैंने पीछा किया। पकड़ने की कोशिश की उसमें चोर मारा गया तो लोग विश्वास भी करेंगे। आपकी इज्जत भी बढ़ेगी और राजा की नजरों में आपका महत्व भी बढ़ेगा। ” 

     सेठ के द्वारा इनाम की रकम का यूं त्याग करना कोटवार को आश्चर्यजनक लगा। पर पक्की पकाई थाली परोसी हुई हो तो कौन खाना नहीं चाहेगा। कोतवाल ने यहीं बात सबको बताई। कोतवाल को इनाम मिला। गांव वालों ने उसकी जय-जयकार करते हुए सम्मानित किया। उसे पगड़ी पहनाई। यह देखकर सेठ का लड़का बोला- “ पिताजी, आप मेरा भला नहीं चाहतें। मेरा नाम होते हुए देख नहीं सकतें। यह सब जय-जयकार और पैसा हमारा होता। ” 

       दांतों में दमड़ी पकड़ने वाला सेठ चुप रहा। कुछ दिनों बाद, गर्मी की एक रात में कोतवाल खुले में बाहर चारपाई पर सोया था कि चोर के साथियों ने उसकी गर्दन काट दी। समाचार सुनकर सेठ बेटे से बोला- “ देखा ना पगड़ी के ढोल बज गए। ”

Ramswaroop Mantri

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