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*लघुकथा – नज़रिया अपना अपना*

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                              –विवेक मेहता 

     जानता हूं कि मैं गलत हूं। मगर मेरा डर नहीं मानता। मैं बार-बार डर जाता हूं। मौत का डर ! बीमारी का डर । इस नहीं तो उस बीमारी से मैं मरने वाला हूं। किसी को हार्ट अटैक आया, ऐसे समाचार मिले तो मुझे ईसीजी, 2डी-3डी करवाना पड़ता है। हीना खान को कैंसर होता है तो मुझे डॉक्टर के पास दौड़ना पड़ता है। अपनी इस तरह की सोच के कारण खुद से परेशान हो जाता हूं कई बार।

         एक दिन हम दोस्त चाय की चुस्कियां ले रहे थे कि एक दोस्त का दोस्त भी वहां मिल गया। बातों में से बातें निकलती रहीं। बात मेरे डर पर आ गई। 

          दोस्त का दोस्त बोला-‘डरना क्या? जब तक जिंदा हो, मौज करो।’ 

         मैंने कहा-‘कहना सरल है पर ऐसे मौज में रहना मुश्किल है।’  

       दोस्त का दोस्त गंभीर हो गया। बोला-‘मैं अपने अनुभव से बोल रहा हूं।’ 

         हमने उसकी ओर उत्सुकता से देखा। थोड़ी चुप्पी के बाद वह बोला- ‘22 साल पहले एक रात मुझे अटैक आया। घर वाले अस्पताल ले गए। वहां जांच में देखा बीपी शुन्य, ईसीजी की सीधी लाइन। धड़कन, सांस बंद। मुझे मरा हुआ मान लिया गया। थोड़ी देर बाद अचानक शरीर में हरकत हुई। डॉक्टर को लगा मैं जिंदा हूं। इलाज चालू हो गया। बाद में डॉक्टर और घरवालों की सलाह पर मुंबई के डॉक्टर को दिखाया। वह कोई ऐसा वैसा डॉक्टर नहीं था। उस वक्त के बड़े नेता जिसके इशारे पर मुम्बई धड़कता था कि धड़कन को संभालने वाला डाक्टर था। डॉक्टर ने मुझे और घर वालों को डरा दिया। बोला-तुम्हारी हालत खराब है। अभी तक जिंदा कैसे हो? अस्पताल में भर्ती हो जाओ। अभी ऑपरेशन करना पड़ेगा। मुझे भी लगा कि मैं जिंदा कैसे हूं? फिर खुद को समझाया। स्थिति पर विचार करने के लिए मुझे समय चाहिए था। मैंने पैसों की व्यवस्था का बहाना बनाया। अपने फिजिशियन से बात की। उसने रिपोर्ट की कापी मांगी। उन्हें देख कर उसने बताया कि अभी ऐसी कोई जरूरत नहीं है।’

        मैंने पूछा- ‘फिर तुमने क्या किया?’ 

        वह बोला- ‘घर वापस आ गया।’ 

        ‘तो फिर यहां ऑपरेशन कराया होगा?’ 

      ‘कुछ भी नहीं करवाया। मेरा फिजिशियन दवाई देता है। वह ले लेता हूं। इस बीच शहर की धड़कन चलाने वाले नेता की धड़कन बंद हो गई। डॉक्टर भी हार्ट अटैक से मर गया। मैं जिंदा हूं अभी तक। मौज कर रहा हूं।’- कहकर उसने ठहाका लगाया।  

    उसकी बातों से कुछ समय के लिए तो मुझे हौसला मिला। पर सोच का क्या? सबका ज़िन्दगी को लेकर अपना-अपना नज़रिया होता है। मेरी सोच, मेरा नज़रिया ऐसा ही क्या करूं!

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Ramswaroop Mantri

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