व्यंग्य- भ्रष्टाचार के तालाब में डुबकी लगाते मास्टर
अपुन जब पांचवी-छट्टी में पढ़ता था तो बीजगणित की लाल मोटी किताब से सवाल हल करना पड़ते थे। चक्रवर्ती की गणित के नाम से उसे जानते थे। अंदर सवाल ही सवाल थे- एक काम को करने में पांच आदमी तीन दिन लेते हैं तो सात आदमी उस काम को कितने समय में पूरा करेंगे जैसे। लगता है मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के सकंदी और निपनिया स्कूल के प्रधानाचार्य, शिक्षक और शिक्षा अधिकारी ने उस किताब से पढ़ाई नहीं की। की होती तो देश भर में मध्यप्रदेश अजब-गजब है, प्रसिद्ध नहीं हुआ होता। मास्टर लोगों का काम नैतिकता की शिक्षा देना है, भ्रष्टाचार के तालाब में डुबकी लगाना नहीं। इसलिए नए काम में गलती हो गई होगी।

मास्टर समझे होगे की क्लास लेते हैं-नहीं लेते हैं, पढ़ाते हैं-नहीं पढ़ाते हैं छोरे तो पास हो ही जाते हैं। ऐसे ही काम करायेंगे-नहीं करायेंगे बिल तो पास हो ही जाएगा। और बिल पास भी हो गया था। ऑडिटर, अधिकारी, सरकार तो अपनी ही है। बेवकूफ क्या बनाना! नय्या पार हो ही जाती परन्तु विध्न संतोषियों ने नाव में छेद कर दिया। सवाल खड़े कर दिए कि 4 लीटर ऑयल पेंट लगाने के लिए 65 मिस्त्री और 168 मजदूर की जरूरत कैसे पड़ी? वही दूसरे स्कूल के मास्टर ने 20 लीटर पेंट के लिए 150 मिस्त्री और 275 मजदूरों को पेमेंट कैसे कर दिया?

Photo from विवेक मेहता
जिस का काम उसी को छाजे और करे तो ठेंगा बाजे। नेता, अफसरों का काम उन्हीं को करने दीजिए मास्टरजी। शहडोल जिले के सकंदी और निपनिया के मास्टर एक तीसरी ग्राम पंचायत की छोटी सी दुकान पर लाइन में लग कर बिल बनवा रहें थे । तो एक मास्टर साहब ऑयल पेंट को 196 रुपए लीटर में खरीद रहे थे,दूसरे वाले उसके 400 रुपए दे रहे थे। सामान बेचने वाला दुकानदार मजदूरों की सप्लाई भी कर रहा था। कितना विकसित गांव है। एक दिन में उसने 658 मजदूर-मिस्त्री की सप्लाई कर दी। इतने मजदूर तो सवेरे-सवेरे बड़े शहरों की मजदूर मंडी में भी नहीं मिलते। सुधाकर कंस्ट्रक्शन वाला लेबर रिकॉर्ड तो मेंटेन करता ही होगा। पी. एफ. भी भरता होगा। लेबर डिपार्टमेंट वाले इधर थोड़ा ध्यान दें तो उनकी भी नैया तैर जाएगी। सकंदी स्कूल वाले मिस्त्री कामचोर थे। एक मिस्त्री ने केवल 35 मिलीलीटर पेंट लगाया जबकि निपनिया में काम करने वालों ने 135 मिलीलीटर पेंट लगाया। 35 मिलीलीटर का मतलब आप समझ रहे हैं ना-छोटे सात चम्मच। दवा पीने वाले। दोनों जगह पर मिस्त्री की मदद के लिए लगभग दो मजदूरों की जरूरत पड़ी।
अपुन इस बात से तो कम चकित था। भ्रमित तो इस बात से था कि पेंटरों ने यानी मिस्त्रियों ने पेंट कैसे लगाया? हाथ से ही लगाया होगा। मास्टर साहब ब्रश खरीदना जो भूल गए थे! अब एक मिस्त्री के हिसाब से एक ब्रश तो लगता ही है। 200 का एक ब्रश समझो तो बिल कितना हो जाता! और तो और दुकान वाले गांव से स्कूल के गांव तक जाने का भाड़ा भी नहीं जोड़ा। शायद तब बिल इतना हो जाता की पास करना जिला शिक्षा अधिकारी के बस में नहीं रहता। ब्रश और डिब्बा नहीं होने की स्थिति में मिस्त्रियों ने एक ही डिब्बें में हाथ डूबा-डूबा कर पेंट लगाया होगा। क्या दृश्य रहा होगा ! सोच कर ही आनंद आ जाता है। मिस्त्रियों की लाइन लगी हुई है। एक मिस्त्री हाथ डिब्बे में डूबा रहा है, पेंट ले रहा है, पेंट लेकर भाग रहा है, पेंट नीचे टपक रहा है, बचा हुआ पेंट खिड़की पर लगा रहा है। उसके भागते ही लाइन में खड़ा दूसरा आता है, फिर तीसरा आता है। मजदूर अपने मिस्त्री के नंबर के लिए झगड़ा कर रहे हैं। स्कूल के बच्चों को तो मजा ही आ गया होगा। काश आप और अपुन भी वह मजेदार दृश्य देखने वहां होते। फिर अपुन को लगा कि इतने मिस्त्री शायद इसलिए लगें हो कि मास्टर जी ने थिनर और सेंड पेपर तो खरीदें ही नहीं। बिना धूल साफ किया मिस्त्री ने पेंट किया होगा। काम खराब हुआ होगा। अब मास्टरों की तो आदत होती है खराब काम के लिए नंबर काट लेते हैं, गलती हो तो सजा दे देते हैं। तो मास्टरजी ने मिस्त्रियों और मजदूरों को कान पकड़वाकर या मुर्गा बनाकर खड़ा कर दिया होगा। शाम हुई तो मिस्त्री मजदूरों की तो आदत होती है हिसाब ले जाने की। पैसें देना पड़े होंगे और इसलिए बिल बढ़ गया होगा। इस हेरा फेरी में जिस भाई की हिस्सा नहीं मिला होगा उसने बिल की कॉपी लेकर सोशल मीडिया में चिपका दी। घर का भेदी लंका ढाए कहावत ऐसों के लिए ही है। मध्यप्रदेश का तो बड़ा नाम था। व्यापम भुल गये क्या! सब मिट्टी में मिला दिया। अपुन तो सरकार से मांग करता है कि जांच हो। ऐसे लोगों की गिरफ्तारी हो और सरकारी काम की गोपनीयता भंग करने के मामले में सजा हो। मास्टरों को मास्टरमाइंड बनना जरूरी है। इसलिए मास्टरों के लिए एक ट्रेनिंग का आयोजन किया जाए। पेपर वर्क में सावधानी कैसे बरती जाए पर उन्हें ट्रेनिंग दी जाए। ट्रेनिंग देने के लिए उनके ही शिष्य नेता और अफसर जो इस प्रकार के काम में अनुभवी हो उनकी सेवाएं ली जा सकती है। सम्बंधित मास्टरों, शिक्षा अधिकारी को दस बार इसी तरह के काम करने की सजा दी जाए।
काजू-बादाम डकारने वालों,35000 का जग खरीदने वालों के लिए अपुन अलग से नहीं लिखेगा। थोड़ा लिखा है बहुत समझना।
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