अमृता शर्मा
थानेदार : क्या बात है?
पुजारी : चोरी हो गई।
थानेदार : आपके घर?
पुजारी : नहीं
थानेदार : आपके पड़ोसियों के घर में?
पुजारी : नहीं
थानेदार : आपके रिश्तेदार के घर?
पुजारी : नहीं
थानेदार : तो फिर गांव में, मोहल्ले में?
पुजारी : नहीं
थानेदार (गुस्से में) : तो फिर बताता क्यों नहीं चोरी कहां हुई है ?
पुजारी : मंदिर में
थानेदार : मंदिर किसका है ?
पुजारी : भगवान का
थानेदार : कौन से भगवान का ?
पुजारी : विष्णु, शिव, कृष्ण, लक्ष्मी, पार्वती और राधा का
थानेदार : तो वो उनका घर हुआ.
पुजारी : हां जी
थानेदार : ओह ! तो वहां तीन फैमिली रहती हैं?
पुजारी : वे फैमिली नहीं, भगवान और भगवतियां हैं
थानेदार : घर उनका तो फिर उनको आना चाहिए था. दस्तख्त भी उनके ही चाहिए. तुम क्यों आए रिपोर्ट लिखाने ?
पुजारी : वो नहीं आ सकते
थानेदार : अच्छा, बड़े लोग हैं. मेरी गाड़ी में बैठो, वहीं चलते हैं। मुआयना कर लेगें, दस्तख्त भी करा लेगें. कानूनन बिना इसके रिपोर्ट नहीं लिख सकते.
मंदिर पहुंच कर थानेदार ने मूर्तियों कि तरफ मुखातिब होकर पूछा : बताओ घर के मालिक जनों ! कहां से, कैसे और क्या- क्या चोरी हुआ ?
पुजारी : साहब ये नहीं बता सकते
थानेदार : क्यों ये गूंगे बहरे हैं जो सुन बोल नहीं सकते?
पुजारी : साहब ये पत्थर की मूर्तियां हैं. सुन बोल नहीं सकती.
थानेदार : ये मूर्तियां न बोल सकती हैं, न चल सकती हैं. अपने घर की चोरी तक नहीं रोक सकती. तुम पब्लिक को पढ़ाते हो कि ये उनका सबकुछ कर देंगी. खैर! घर के मालिक सुन बोल नहीं सकते. फिर कैसे पता चले, कहां से कितना- क्या चोरी हुआ ?
पुजारी : साहब इस दानपात्र को तोड़ कर चोरी हुई है. रोजाना 40- 50 हजार के लगभग इसमें आते हैं. महीने के आखिरी दिन मैं इसे खोलता हूँ.
थानेदार : तुम्हारे बयान के मुताबिक घर तुम्हारा नहीं. धन तुम्हारा नहीं और धन लेते तुम हो। मतलब तुम धन लेकर अबतक चोरी ही कर रहे थे। चोर का धन किसी और ने चुरा लिया तो उसमें प्रॉब्लम क्यों?
पुजारी : नहीं साहब मैं चोर नहीं. वो धन मेरा ही था.
थानेदार : इसका मतलब यह कि ये धार्मिक स्थल या श्रद्धा स्थल नहीं। लोगों को बेवकूफ बनाकर लूटने का धंधा है.
(चेतना विकास मिशन)





