रामबाबू अग्रवाल
आजाद भारत के इतिहास में 25 जून की तारीख अहम है। इसी दिन यानी 25 जून 1975 को स्वतंत्र भारत के इतिहास का देढ़ साल लंबा सबसे ज्यादा अलोकतांत्रिक दौर शुरू हु upआ था। उस दौर की केवल कल्पना ही आज के युवा कर सकते हैं, खासकर तब जबकि आज अभिव्यक्ति के ढेरों साधन मौजूद है और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर पूरी दुनिया में नये सिरे से आवाज उठाई जा रही है, ऐसे में बड़ा आश्चर्य होता है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र ने नागरिक अधिकारों को छीन लेने, विरोधियों, विपक्षियों और लाखों लोगों को जेल में डाल देने और प्रेस पर प्रतिबंध के जाने कैसे दिन देखे?
रामलीला मैदान में रैली से हिली इंदिरा सरकार
46 साल पहले 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण की रैली के बाद आधी रात को देश में आपातकाल लगाने का फैसला किया। जिस रात को इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की, उस रात से पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में एक विशाल रैली हुई. वो तारीख थी 25 जून 1975. इस रैली में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ललकारा था और उनकी सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया. इस रैली में कांग्रेस और इंदिरा विरोधी मोर्चे की मुकम्मल तस्वीर सामने आई, क्योंकि इस रैली में विपक्ष के लगभग सभी बड़े नेता थे. यहीं पर राष्ट्रकवि दिनकर की मशहूर लाइनें सिंहासन खाली करो कि जनता आती है की गूंज नारा बन गई थी ।
इंदिरा, 12 जून 1975 को आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले से पहले से पहले ही बेचैन थीं जिसमें रायबरेली से उनका चुनाव निरस्त कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें आधी राहत मिली थी. आखिरकार उन्होंने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सलाह पर धारा-352 के तहत देश में आंतरिक आपातकाल लगाने का फैसला किया. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और इंदिरा गांधी के सहायक आर के धवन कहते हैं कि अगर कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार हो तो वो सिद्धार्थ शंकर रे थे, जिनका रोल सबसे अहम था. 29 जून को कांग्रेस विरोधी ताकतों ने हड़ताल का अह्वान किया था इसलिए 25 जून को इमरजेंसी लगानी पड़ी क्योंकि पहले से ही हालत काफी खराब थी ।इमरजेंसी लागू कर तत्कालीन सरकार ने सत्ता सुख के लिए देश को जेलखाना बना दिया था। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस पर प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रधानमंत्री के बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर पुरुष नसबंदी अभियान चलाया गया। इस जबरदस्ती के कारण पुरे देश के ग्रामीण क्षेत्र में भय एवं रोष का वातावरण बन गया एवं पुलिस तथा कांग्रेस के नेताओं की अवैध कमाई का जरिया बन गया यह अभियान।
सारे विपक्षी नेताओं को जेल, मीसा-डीआईआर का कहर
मीसा (मेंटेनेंस ओफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) के नाम से इस विवादित कानून को 1971 में इंदिरा गांधी सरकार ने पास करवाया था. इसके बाद सरकार के पास असीमित अधिकार आ गए. पुलिस या सरकारी एजेंसियां कितने भी समय के लिए किसी की प्रिवेंटिव गिरफ्तारी कर सकती थीं, किसी की भी तलाशी बिना वारंट ली जा सकती थी ।
सरकार के लिए फोन टैपिंग भी इसके जरिए लीगल बन चुकी थी. अपातकाल के दौरान 1975 से 1977 के बीच इसमें कई बदलाव भी किए गए.आपातकाल के दौरान इसका जबरदस्त तरीके से दुरुपयोग किया गया ।
आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा क़ानून (मीसा) के तहत 100 से अधिक बड़े नेताओ की गिरफ़्तारी हुई जिसमे जयप्रकाश नारायण, विजयाराजे सिंधिया, राजनारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह कृपलानी, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी , सत्येंद्र नारायण सिन्हा, जॉर्ज फर्नांडीज़, मधु लिमये, ज्योति बासु, समर गुहा , चंद्रशेखर, बालासाहेब देवरस, मामा बालेश्वर दयाल, कुशाभाऊ ठाकरे, श्री सुदर्शन जी और बड़ी संख्या में सांसद और विधायक शामिल थे। सरकार का विरोध करने पर दमनकारी कानून मीसा और डीआईआर के तहत देश में एक लाख ग्यारह हजार लोग जेल में ठूंस दिए गए. खुद जेपी की किडनी कैद के दौरान खराब हो गई. कर्नाटक की मशहूर अभिनेत्री डॉ. स्नेहलता रेड्डी जेल से बीमार होकर निकलीं, बाद में उनकी मौत हो गई. उस काले दौर में जेल-यातनाओं की दहला देने वाली कहानियां भरी पड़ी हैं देश के जितने भी बड़े नेता थे, सभी के सभी सलाखों के पीछे डाल दिए गए. एक तरह से जेलें राजनीतिक पाठशाला बन गईं. बड़े नेताओं के साथ जेल में युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखने-समझने का मौका मिला. लालू-नीतीश और सुशील मोदी जैसे बिहार के नेताओं ने इसी पाठशाला में अपनी सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पढ़ाई की। हजारों कार्यकर्ताओं के परिवारों ने भी यातनाएं भुगती थी तथा बहुत सारे साथी दिवंगत भी हो गए। इंदौर जेल में म.प्र. नीमच के बैरिस्टर उमाशंकर त्रिवेदी कहते थे की अब मुंडियां ही बाहर जायेगी।
आपातकाल में सरकार विरोधी लेखों की वजह से कई पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया। उस समय कई अखबारों ने मीडिया पर सेंसरशिप के खिलाफ आवाज़ उठाने की कोशिश की, पर उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया गया। आपातकाल की घोषणा के बाद एक प्रमुख अख़बार ने अपने पहले पैन पर पूरी तरह से कालिख पोतकर आपातकाल का विरोध किया। आपातकाल में जेल गए पत्रकार केवल रतन मलकानी, कुलदीप नैयर, दीनानाथ मिश्र, वीरेंदर कपूर एवं विक्रम राव प्रमुख है और लगभग 50 पत्रकारों की नौकरी चली गई थी। इंदौर शहर से प्रकाशित नईदुनिया पत्र ने सेंसरशिप के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। जो SP, DIG प्रतिदिन चक्कर लगाते थे। उन्होंने रात १२ बजे प्रेस पर धावा बोल दिया था । उस समय प्रकाशचंद्र सेठी म. प्र. के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने अपने विरोधियों को भी जेल में डालने का काम किया था। लेखक सहित बहुत सारे छात्र नेता भी इंदौर जेल में बंद किये गए थे।
आपातकाल का वो दौर इतना भयानक था कि कांग्रेस भी अब उसे भूल मानती है लेकिन उस वक्त की बगावत जैसे हालात की दुहाई भी दी जाती है तो क्या देश में सचमुच बगावत के हालात बन रहे थे? सच ये है कि सरकार की नीतियों की वजह से महंगाई दर 20 गुना बढ़ गई थी. गुजरात और बिहार में शुरू हुए छात्र आंदोलन से उद्वेलित जनता सड़कों पर उतर आई थी. उनका नेतृत्व कर रहा था सत्तर साल का एक बूढ़ा जयप्रकाश नारायण जिसने इंदिरा सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। जयप्रकाश नारायण ने इसे ‘भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि’ कहा था। जयप्रकाश जी के आह्वान से प्रेरित होकर देशभर से कई महिलाओं और पुरुषों ने खुद को लोकतंत्र बचाने के आंदोलन में झोंक दिया। आपातकाल के दौर की तानाशाही के विरोध में ‘लोक संघर्ष समिति’ बनायी गयी। इसके बैनर तले सत्याग्रह हुआ, जिसमें देश भर में डेढ़ लाख लोगों ने गिरफ्तारी दीं। इंदिरा जी ने सबको बंदकर सोचा कि अब आंदोलन दब गया है। अतः उन्होंने लोकसभा के चुनाव घोषित कर दिये । जेल में बंद नेताओं ने ‘जनता पार्टी’ के बैनर पर चुनाव लड़ने का निश्चय किया गया। अधिकांश बड़े नेता तो हिम्मत हार चुके थे; पर जब उन्होंने जनता का उत्साह देखा, तो वे राजी हो गये।
इंदिरा गांधी की भारी पराजय हुई। चुनाव के बाद जनता पार्टी का शासन आया जनता पार्टी ने अपने ढाई वर्ष के कार्यकाल में संविधान में ऐसे प्रावधान कर दिये, जिससे फिर आपातकाल न लग सके। 1977 में जनता पार्टी के सत्ता में आते ही उन्होंने इस कानून को रद्द कर दिया। इस कानून में आपातकाल के दौर में बंद लोगों को मीसाबंदी कहा गया ।
मीसा बंदियों को पेंशन
आपातकाल के दौरान भी गैर कांग्रेसी राज्यों की सरकार मीसा में बंद किए गए लोगों को पेंशन देने का काम करती थी। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकारों ने डीआरआई और मीसा में बंद कैदियों को 10-15 हजार रुपये पेंशन देना शुरू किया। इसके बाद साल 2014 में राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने भी 800 मीसा बंदियों को 12 हजार रुपये प्रति माह की पेंशन देने का फैसला किया । बीजेपी देशभर में आज भी आपातकाल की बरसी पर मीसा बंदियों को सम्मानित करती है । म.प्र. सरकार ने मीसा बंदियों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देकर सम्मानित भी किया है। एवं पता लगा है कि अब म.प्र. सरकार ने उन्हें भी मीसाबंदी मान लिया है जो 1 दिन के लिए भी गिरफ्तार नहीं हुए थे।
1975 जैसे काले दिन तो शायद फिर न आयें; पर सच्चा लोकतंत्र भारत में कब आएगा, यह प्रश्न उन लोगों को चिंतित जरूर करता है, जो लोकतंत्र की रक्षार्थ जेल गये थे या फिर जिन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन किया था। लोकतंत्र सेनानी कुछ बातों को लेकर फिर आंदोलित होने का मन बनाते हुए देखे जाते हैं कुछ मुद्दों पर।
मीसा या UPPA अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट के नाम पर एंटी इंटेरसेकुलरिस्म जो ज्यादा समझदारी दिखाए उसे बना देते है। JNU के स्टूडेंट्स हो या क्लास्मेट एक्टिविट हो उन्हें एंटी नेशनल घोषित कर दिया गया है।
जिसको सुप्रीम कोर्ट ने आदेशित किया और रिहा करने के आदेश दिये। पहले भी 1975 इमर्जेन्सी में विपरीत विचारधारा रखने वालों को देशद्रोही करार दिया गया और पिछले कुछ अरसे से अब इंडियन पैनल कोर्ट की धारा 124 A 9 PC की धारा अंग्रेजो के समय से चली आ रही है, जिसके तहत महात्मा गाँधी, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, भगत सिंह, जेल गए थे। अभी भी जारी है, यही धारा लक्ष्यदीप में लगाई गई थी, अब ब्रिटिश सरकार ने अपने देश से हटा दी है पर अपनी देश में जारी है – 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ सिंह V/s बिहार के मामले में कहा था के देशद्रोह काल तभी वाजिब है सरकार के खिलाफ विद्रोह हो, तभी होना चाहिए। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा था की सरकार को पहले ही सुप्रीम कोर्ट बता चूका है। सरकार फॉलो करे अन्यथा हमारे पास केस आया तो हम रद्द कर देंगे। देश के कुछ प्रतिशत नागरिक अब भी अघोषित इमर्जेन्सी जैसा महसूस करते है। असहमति को बर्दाश्त नहीं करती है यह सरकार भी क्यों? क्योकि कई केन्द्र्य मंत्री, संसद, विधायक अपने क्षेत्र की सही बात रखना चाहते है तो उन्हें व्हिप के जरिये रोक दिया जाता है और कहा जाता है कि आप पार्टी फोरम पर बोल सकते है पर सार्वजनिक नहीं। फिर वे पर्सनल वार्ता में यह बातें बताते है। ऐसा सभी राजनितिक दाल करते है सिर्फ सत्ताधारी ही नहीं। व्हिप के कारण क्षेत्रों की सही आवाज़ संसद और विधानसभा में उठ नहीं पाती है। राजनितिक दलों के चंदे में ट्रांसपेरेंसी होना चाहिए। चुनाव आयोग ने बोला है। हमको पता होना चाहिए अभी सत्ताधारी पार्टी को 80% चंदा मिला और बाकी सब दल 20% में निबट जाए। चंदा देने वालो में डर बहुत ज्यादा है इस बात से पता चलता है। SIBI के इलेक्ट्रॉनिक कोड सिर्फ सरकार ही पता कर सकती है पर किसी भी राजनितिक दल को ये जानकारी नहीं मिलती। ये सब प्रश्न फिर से उठ रहे है।
लेखक इंदौर के वरिष्ठ समाजवादी नेता तथा लोहिया विचार मंच मध्य प्रदेश के अध्यक्ष हैं





