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*लोकशास्त्र : मिथकीय मीमांसा की वर्णमाला*

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          ~ पुष्पा गुप्ता

माइथीम लोकगाथा, लोककथा, पुराणकथा  अथवा  मिथककथाओं में कुछ  असंभव, आश्चर्यजनक किन्तु एक-समान  घटनाएं  पुनरावर्तित  होती रहती हैं , जैसे  रायमला की कहानी में एक पौधे से  कन्या बन गयी, नाग-कथा में  पुतले में प्राण-संचार हो गया अथवा आकाशवाणी ने भविष्य की घटना की घोषणा कर दी।    

      लोकवार्ता में इन घटनाओं को” कथारूढि़ ,अभिप्राय या मोटिफ” कहते  हैं और   मिथकों के ऐसे ही अभिप्राय को माइथीम कहा जाता है!

      काव्य में इस प्रकार के पुनरावर्त्यमान तत्त्व को “कविसमय अथवा काव्यरूढि” कहते हैं , जैसे हंस नीर-क्षीर का विवेचन कर देता है या रात होने पर चकवी-चकवा बिछुड़ जाते हैं अथवा मोर अपने पैरों को देख कर रोता है , मोरनी उसके आँसू पी लेती है तथा उससे गर्भ हो जाता है या सुन्दरी के पदाघात से अशोक पुष्पित हो जाता है।

        मोटिफ प्राय: विचित्र ,असामान्य या अद्भुत होते हैं , इनमें असंभव भी संभव हो जाता है  , जैसे  पुरुष की कोख से पुत्र का जन्म हो जाता है।

 प्रसाद ग्रहण करने से ,खीर खाने से ,घड़े  से , फल से   पसीने की बूंद या कानके मैल से , धरती से अथवा  अग्निकुंड  आदि से  बालक का जन्म हो जाता है। ये मिथक और माइथीम केवल भारत की लोकवार्ता में ही नहीं हैं , संसार की लोकवार्ता और माइथोलोजी में हैं।

      लोकवार्ता की अभिप्राय-अनुक्रमणिका  लगभग सत्तर साल पहले बनायी जा चुकी है।  भारत की मिथककथा और गाथाओं में इस प्रकार के अनेक माइथीम हैं – अहल्या  शिला  बन जाती है और  शिला  अहल्या  बन जाती  है। जटा से कृत्या उत्पन्न हो जाती है।

     इला को पुरुष बना दिया जाता है पुरुष स्त्री बन जाता है और स्त्री पुरुष बन जाता है। त्रिशंकु आकाश में लटक जाता   है। सगरपुत्र पृथ्वी खोद कर समुद्र बना  देते हैं और अगस्त्य मुनि समुद्र का आचमन कर जाते हैं , देवता और दानव मिल कर समुद्र का मन्थन कर देते हैं।

      इंद्र कमल नाल के तंतु में  अज्ञातवास करता है। एक कल्पवृक्ष है , उसके नीचे जो मनोकामना की जाय वह पूर्ण हो जाती  है। 

ऐसे ही एक चिंतामणि  है , समस्त चिन्ताओं को दूर कर देती है। रक्तबीज है , खून की  बूँद जमीन पर गिर पड़ती है और एक नया  दैत्य  रक्तबीज पैदा हो जाता है।

      हनुमान सूर्य को फल समझ कर  खा लेते हैं। कोई भी आदमी किसी भी लोक में आता -जाता है।  कभी अंतर्धान हो जाता है कभी वह प्रकट हो जाता है। अमृत एक रसायन है , जिसे पीने वाला आदमी अमर हो जाता है।

      कुंड में स्नान करने से  वृद्ध युवा बन जाता है। इंद्रासन हिल जाता है। दक्ष के धड़  पर यज्ञ- पशु का सिर रख   कर जोड़ दिया जाता है। योनि परिवर्तन हो जाता है , कुत्ता आदमी बन जाता है आदमी गाय  बन जाता है।

     हवा बात करती है। मृत्यु की पूर्व सूचना मिल जाती है। मरा हुआ आदमी जीवित हो जाता है। प्राणों की अन्यत्र उपस्थिति होती है , जैसे दैत्य था ,उसके प्राण तोते में  हैं। 

     रावण की नाभि में अमृत है।हनुमान सूरज को निगल जाते हैं।  राहु-केतु सूर्य को ग्रस लेते हैं। सूर्योदय को रोक दिया जाता है  , चन्द्रमा छह महीने तक ठहर जाता है।

     अगस्त्य मुनि समुद्र का आचमन कर लेते हैं। अंतर्यामी की अवधारणा है जो सब कुछ जानता है। अक्षयपात्र है, जिसमें पकाया गया भोजन समाप्त नहीं होता।  

ये माइथीम और अभिप्राय लोकवार्ता में भी हैं और माइथोलोजी अथवा पुराण-गाथाओं में भी हैं। दोनों की कथा-रूढ़ियां समान हैं। कुंड में स्नान करने से पुरुष स्त्री बन जाता है और वृद्ध युवा बन जाता है मंत्र के आह्वान से देवता आ जाते हैं।

     शाप और वरदान दोनों जगह है। परलोक, पुनर्जन्म, योनिपरिवर्तन दोनों जगह है। दोनों जगह कल्पवृक्ष है जिसको छाया में बैठकर जो भी कुछ इच्छा करो, वही पूरी हो जाती है। बैकुंठपुरी के घोड़े नदी का पानी पीने आ जाते हैं।

      पुराणकथा और लोकवार्ता के पात्र विभिन्न लोकों में आवागमन करते हैं । अभिधा से इनका अर्थ निकालना बुद्धि का पराभव है । मिथक अपने आप में अभिव्यक्ति की शैली है। 

पौराणिक गाथाओं की  इस अभिव्यक्तिशैली तथा भाषा पर पश्चिम में सबसे पहले मैक्समूलर [१८२३ – १९०० ] का ध्यान गया था । उसने अनुभव किया कि आदिम व्यक्ति ने जिस अर्थ में उस  अभिव्यक्ति-भंगिमा का प्रयोग किया था ,  अगली पीढी ने उसे ठीक उसी अर्थ में ग्रहण नहीं किया।

     इस प्रकार पीढियों के क्रम से भाषा में विकार आता चला गया तथा वह मूल अर्थ हम से दूर होता चला गया। भाषा शास्त्री जानते हैं कि शब्द बिंब से बनता है।  परिवेश के बदलने पर बिंब का अर्थ भी बदल जाता है  इसीलिए एक पीढी के बाद दूसरी पीढ़ी में जा कर शब्द का  मूल अर्थ बदल जाता है।

     मैक्समूलर ने माना कि  भाषा और अभिव्यक्तिशैली का  पीढियों के क्रम से बहुत गहरा संबंध है। अर्थ-परिवर्तन की इस प्रक्रिया को  मैक्समूलर ने   मैलेडी आफ़ वर्ड्स अथवा  शब्द का विकार बतलाया था।

      मैक्समूलर मिथक-तत्त्व को अनिवार्य मानते हैं।  “फिलॉसफी ऑफ माइथोलॉजी, इंट्रोडक्शन टु दि साइंस ऑफ रिलिजन'” के परिशिष्ट में मैक्समूलर  कहते हैं :

   “”यदि  भाषा  विचार के  ऊपरी रूप को अभिव्यक्त करने की शक्ति है,  तो मिथक तत्त्व उसकी अन्तर्निहित आवश्यकता  है।मिथक -कल्पना वाक् तत्त्व की भाँति मनुष्य की सहज सर्जना शक्ति का ही निदर्शक रूप है।”

मैक्समूलर के बाद कैसिरर  मिथक-तत्त्व  का विश्लेषण करते हैं। उनका कहना है कि आदिम मनुष्य के लिए भाषा के प्रतीक यथार्थ के सूचक ही नहीं थे बल्कि यथार्थ ही थे। वे मानते हैं कि मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जो प्रतीकों का निर्माण करता है। 

      कैसिरर  भाषा और मिथक तत्त्व को एक ही मूल से निकली हुई दो अलग-अलग शाखाएँ मानते हैं। हर्डर मानते थे कि भाषा की उत्पत्ति मिथकीय प्रक्रिया के भीतर से हुई है।

       मनुष्य के अन्तर्जगत को अभिव्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है – मिथक। मिथक के अध्ययन में मनोविज्ञान ने भी  रुचि ली।

      फ्रायड और उसके अनुयायी मिथक को स्वप्न का सजातीय मानते  हैं ,इच्छापूर्ति का एक विधान। मनोविज्ञान ने बतलाया कि जिस प्रकार व्यक्ति का  अवचेतन मन है , उसी प्रकार से सामूहिक-अवचेतन  भी  होता है , जो गुह्य, गम्भीर और व्यापक  है, जिसकी अभिव्यक्ति मिथक है। युंग कहते हैं कि जब कभी सर्जनात्मिका शक्ति प्रबल होती है, तब चेतन मन की सक्रिय इच्छा-शक्ति के विरुद्ध अवचेतन प्रबल हो जाता है और चेतन अहं  अवचेतन के  वेगवान् प्रवाह में असहाय हो जाता है (ब्रूस्टा गिजोलेन सम्पादित ‘द क्रिएटिव प्रोसेज’, पृ. 222 से उद्धृत)।

 कलाकार के हृदय में जो मिथकीय सिसृक्षा उदित होती है वह अवचेतन चित्त की  वेगवती शक्ति है। वह समष्टि चित्त की ऐसी अनुभूति है जो विविक्तवर्ण भाषा  के प्रादुर्भाव के पहले की है।

     उसे आर्किटाइप कहिए, समष्टि चेतना कहिए, या तांत्रिकी भाषा में “सर्वात्मिका संवित’ कहिए, बात एक ही है। 

    युंग ने  मिथक को आदिम मनुष्य की चेतना का प्राथमिक सर्जनात्मक बिम्ब  बतलाया और  इसे सामूहिक आद्यबिम्ब आर्किटाइपल इमेज की संज्ञा दी।   टाइटन ,ईडीपस ,इलेक्ट्रा , साइकी  आदि  पारिभाषिक शब्द  माइथोलोजी  मिथकशास्त्र से ही मिले हैं।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी  ने  मिथक का विवेचन करते हुए कहा कि -मिथक वस्तुत: भाषा का पूरक है। “‘ कलाकार के हृदय में जो मिथकीय सिसृक्षा उदित होती है, वह अवचेतन चित्त की वेगवती शक्ति है।

     आगे चल कर यही शक्ति पुराणकथा या माइथोलोजी के रूप में विकसित होती है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मानते हैं कि “मिथक तत्त्व वस्तुतः भाषा का पूरक है। सारी भाषा ही  इसके बल पर खड़ी है, साहित्य में मिथक अनंत अनुभवों का विश्लेषण है।”

    वीरता पौरुष तथा हिंसक पशुओं को पराजित कर देने की सामर्थ्य को हो उन्होंने हरक्यूलिस या सैमसन का नाम दे डाला।

ग्रीक पुराणों में उल्लेख है कि जब देवताओं को  टाइटन  नामक दैत्य-जाति ने बहुत सताया , तब उन  देवताओं ने उन दैत्यों को तातार की खाडी में फेंक दिया और ऊपर से पर्वत डाल दिये ताकि वे उठ न पायें !   

      जोशीजी कहते हैं कि इसी प्रकार से मनुष्य अपनी वासनाओं को ज्ञात- चेतना के नीचे दबाता चला जाता है , उस अतल प्रदेश में  जहाँ  अज्ञात- चेतना का राज्य है।

     मनुष्य की पाशविक-उच्छृंखल-बर्बर मनोवृत्ति  टाइटन की तरह अज्ञात- चेतना के अतल गह्वर में सो रही हैं।

Ramswaroop Mantri

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