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खगोल वैज्ञानिक नरेश दधीचःहोएल, स्टीफन हॉकिंग, नार्लीकर की परंपरा के वैज्ञानिक, अधिक महत्वपूर्ण उनकी  सामाजिक और राजनीतिक प्रतिबद्धता

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अनिल सिन्हा

पिछले सप्ताह बीजिंग में अंतिम सांस लेने वाले खगोल वैज्ञानिक नरेश दधीच से  पहली बार कब मिला, मुझे यह ठीक ठीक याद नहीं।  कई बार उनके घर भी गया। नरेश और साधना महाराष्ट्र के परिचित समाजवादी परिवार के हिस्सा हैं, इसलिए यह सहज ही था। साधना दिवंगत समाजवादी एक्टिविस्ट संजीव साने की बहन हैं।

प्रोफेसर नरेश के व्यक्तिगत और परिचय वाले संदर्भ से अधिक महत्वपूर्ण उनकी  सामाजिक और राजनीतिक प्रतिबद्धता है। एक वैज्ञानिक के रूप में उनकी यात्रा को कैरियर के प्रचलित अर्थ  नहीं लिया जा सकता है। इसमें राष्ट्र के रूप में हमारे विकास की झलक मिलती है।

राजस्थान के पिछड़े इलाके चुरू में जन्मे नरेश उस नेहरू युग की उपज हैं, जिसे इन दिनों नकारने और कूड़ेदान में फेंकने की पूरी कोशिश चल रही है। उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से गणित की पढ़ाई पूरी की और यहीं अध्यापक बन गए। वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खगोलशास्त्री थे।

उन्होंने प्रसिद्ध वैज्ञानिक जयंत विष्णु नारलीकर के साथ मिल कर इंटरयूनिवर्सिटी सेंटर ऑफ एस्ट्रोनोमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स की स्थापना की। नरेश ब्रह्मांड को समझने  की कोशिश में लगे वैज्ञानिकों के उस अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के हिस्सा थे जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति, ब्लैक होल्स और आकाशगंगा के विस्तार के शोध में लगा है और आइंस्टीन के सिद्धांतों तथा क्वांटम भौतिकी को आधार बना कर उन जटिल सवालों  का हल ढूंढ रहा है जो मानवता के भविष्य को गहरे प्रभावित करने वाले हैं।

वह होएल, स्टीफन हॉकिंग, नार्लीकर की परंपरा के वैज्ञानिक थे।

लेकिन ब्रह्मांड की गुत्थियों को सुलझाने में खो कर उन्होंने अपने को देश और समाज की उलझनों से अलग नहीं रखा और छात्र जीवन से ही परिवर्तन आंदोलनों से जुड़े रहे। सत्तर के दशक की शुरुआत में परिवर्तन की राजनीति के लिए गठित  युवक क्रांति दल से जुड़ गए और ताउम्र समाजवाद और लोकतंत्र में विश्वास रखनवाले समूहों और आंदोलनों से जुड़े रहे।

समता आंदोलन से लेकर नर्मदा आंदोलन से उनका गहरा रिश्ता रहा। साधना भी काफी सक्रिय रही हैं। युवक क्रांति दल लोकतांत्रिक समाजवाद, मार्क्सवाद और बाबा साहेब आंबेडकर कीे विचारधारा से प्रेरित संगठन था जिसने सत्तर के दशक में बदलाव की राजनीति पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ा।

नरेश उन आम वैज्ञानिकों में से नहीं थे जो सत्ता के सामने चुप रहें।  जब इंडियन साइंस कांग्रेस में अवैज्ञानिक और अंधविश्वास पर आधारित सोच को बढ़ावा देने की शुरुआत मौजूदा शासन ने की तो उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने नेहरू की वैज्ञानिक सोच की याद दिलाई और उन्होंने वैज्ञानिक समूह की खामोशी को राष्ट्रहित के खिलाफ बताया।

वह अभिव्यक्ति की आज़ादी के जबरदस्त पक्षधर थे। शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में सत्ता  के दखल के खिलाफ थे। उन्होंने याद दिलाया कि किस तरह प्रसिद्ध वैज्ञानिक मेघनाद साहा प्रधानमंत्री नेहरू की नीतियों के खिलाफ थे। उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ा़ और जीत कर आए। लेकिन नेहरू की सरकार ने उन्हें कभी इसके लिए प्रताड़ित किया।

नरेश की सोच में गणित, दर्शन और राजनीति को औपनिवेशिकता से मुक्ति की उस लड़ाई का प्रभाव साफ दिखाई देता है। यह सच है कि यह लड़ाई महात्मा गॉंधी के नेतृत्व में लड़ी गई, लेकिन इसे नेहरू, लोहिया, जेपी और मार्क्सवादी नेताओं ने गहरे प्रभाविक किया।

उनका सेकुलरिज्म और विविधता में पूर्ण यकीन था। लेकिन धर्म, सभ्यता और संस्कृति को लेकर उनकी समझ अलग थी। वह पश्चिमी अवधारणा को सीधे लागू करने के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि यूरोप कमोबेश एक धर्म वाला था। भारत बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक है। यहाँ सभी धर्मों को समान स्थान देना ही सेकुलरिज्म है।

धर्म और विज्ञान को लेकर उनकी राय दिलचस्प है । वह मानते थे कि आस्था को लेकर गाँधी का तरीका अपनाना चाहिए। उनका कहना था कि गाँधी जी जिसे अंतरात्मा की आवाज़ कहा करते थे, वह असल में सदविवेक है। इस विवेक तक पहुँचने का गांधी कर रास्ता उपवास होकर जाता था। इसलिए विवेकवाद के पश्चिमी माडल को अपनाने के बदले वह गांधी केे रास्ते को अपनाना तर्कसंगत मानते थे।

आधुनिकता को लेकर भी नरेश की सोच नई थी। उनका कहना था कि विज्ञान के नियम मानव समाज पर उसी तरह लागू नहीं किये जा सकते जो भौतिक दुनिया पर लागू होते हैं क्योंकि भौतिक पदार्थ आदमी जड़ है, मानव की चेतना नहीं। वह इंसान की तरह सोच नहीं सकता और इसमें करूणा नहीं होती।  

भौतिक जगत की गति को विज्ञान पहले से बता सकता है, लेकिन इंसान  की नहीं। इंसान अनेक विकल्प  अपना सकता है। उनकी राय थी कि मानव समाज के गति और भविष्य की दिशा समझने के लिए विज्ञान को अपना विस्तार करना पड़ेगा।

गणित से दर्शन और राजनीति की इस गंभीर यात्रा पर अब विराम लग गया है। इस अंधेरे समय में उन जैसे लोगों की याद बार- बार आएगी जिनका जीवन सिर्फ अपने सवालों तक सीमित नहीं था और जिनके लिए दुनिया को समझना ही महत्वपूर्ण नहीं था, इसे बदलते देखना भी।  नरेश को हार्दिक श्रद्धांजलि!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Ramswaroop Mantri

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