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अवार्ड पुरस्कार एवं हम

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मोहन शर्मा,

मै  बड़ी हस्तियों को सीख देंने की हिमाक़त तो नहीं कर सकता पर उन्हें तो समझा ही सकता हूँ। मानना या नहीं मानना उनकी सोच पर निर्भर है।

यह मेरा मानना है कि नये कलाकारों कवियों लेखकों या अन्य व्यक्तियों को पुरस्कार अवॉर्ड के चक्कर में नहीं पड़कर अपने  कार्य पर ध्यान देना चाहिये। क्योंकि मेरे विचार से अवार्ड प्रेमी अपनी साधना पर ध्यान नहीं दे पाता है। क्योंकि हर समय उसका ध्यान अवार्ड पुरस्कार पर ही होता है। 

अब जरा पुरस्करों और अवार्डों की असलियत समझिये। नम्बरवार सबसे पहले अपने से ही शुरू करता हूँ — 1.  बहुत साल पहले सुप्रसिद्ध संगीतकार मदन मोहन जी की  मृत्यू के बाद इंदौर में उनके नाम पर एक संगीत प्रतियोगिता शुरू की गई थी। चूंकि मैं गाता भी था और हारमोनियम भी बजाता था अतः आयोजकों ने जो मुझसे परिचित भी थे मुझे निमन्त्रण दिया कि आप गायकों के साथ हारमोनियम भी बजा दिया करो और एक प्रतियोगी की हैसियत से सम्मिलित भी हो जायां करो। लालच अच्छा था। मैं उस समय युवा था मुझे भी पुरस्कार अवार्ड की आकांक्षा थी । लिहाज बना पारिश्रमिक के ही बजाने चला जाता था। यहां मैं यह बताना चाहूँगा कि बॉलीवुड की ही तरह से इंदौर में भी हर विधा में लॉबिंग चला करती है।  सो साल दर साल मेरा शोषण होता रहता। एक वर्ष आयोजकों ने मुंबई से एक जज साहिबा और देवास से एक जज साहब श्रीमान झोकरकर साहब जो कि योग से मदन मोहन जी के बड़े गहरे मित्र थे। उस साल मैं  भी  बड़ी तैयारी के साथ गया था। और मैने फ़िल्म चिराग का शीर्षक गीत जो कि मरहूम रफ़ी साहब का गाया हुआ और बड़ा मुश्किल है- चराग़ दिल का जलाओ बहुत अंधेरा है। प्रस्तुत किया और संयोग से मुझे प्रथम पुरस्कार और शील्ड प्राप्त हुई। दोनो निर्णायकों के अलावा हर किसी ने इस का विरोध करना शुरू किया इतना हंगामा और शोर हुआ कि संसद में विरोधियों का भी क्या होता होगा। निर्णायक अपने निर्णय पर अटल थे झोकरकर साहब का कहना था कि मेरे मित्र मदन ने यह धुन मेरे ही सामने बनाई थी और सजाई थी और इतनी बार गई थी कि इसकी एक एक बारीकी मेरे भीतर रच बस गई है। और इस लड़के ने हूबहू सभी बारीकियां गीत में उतारी है। बावजूद इसके उन पर इंदौर की विशेष मांसाहारी गालियां भी दी गई। पर वे टस से मस नहीं हुए। लिहाजा पुरस्कार मुझे मिला। पर उस हंगामे का असर ये हुआ कि वह प्रतियोगिता उस वर्ष से बंद कर दी गई। जब शाम को जैन संगीत विद्यालय जहां मेरी नौकरी थी वहां के प्राचार्य को जाकर शील्ड बताई और सारा किस्सा सुनाया तो वे मुस्कुरा कर बोले बेटा जानते हो प्रतियोगिता क्यों  हेवठेहोती है मेरे मना करने पर बोले प्रतियोगिता मतलब दस गधों के बीच से अपने गधे को घोड़ा साबित करना । और तुम हाथी साबित हो गये इसलिये हंगामा हुआ। तब मैं उनके कहे का मतलब नहीं समझा था पर अब समझता हूँ।

2. एक और बड़ी संस्था में निर्णायक बन कर गया। जब  समाप्ति के बाद हम निर्णायक गण विचार कर रहे थे कि संस्था प्रमुख ने आकर कहा अमुक लड़की को पुरस्कार दीजिये तो मैंने साफ कह दिया कि मैं तीन निर्णायकों के निर्णय पर ही अमल करूंगा । उसके बाद आज तक उस संस्था ने मुझे नहीं बुलाया।

3. एक ओर बड़ी संस्था जहां बहुत सतर्कता बरती जाती है। पांच पांच निर्णायक स्कूलों की इस प्रतियोगिता में स्कूल की ड्रेस , बेल्ट यहां तक कि कोई ऐसा चिन्ह अलाउ नहीं है, केवल एक नम्बर  दिया जाता है वहां कैसे खेल होता है। पांच निर्णायकों में एक मैं। प्रतियोगिता के बाद हम निर्णायक निर्णय करके फाइनल लिस्ट तैयार कर रहे थे एक निर्णायक बोले मेरे ख्याल से 3 नम्बर वाला स्कूल प्रथम स्थान के लायक है मैने विरोध किया कि जब हम फैसला कर चुके हैं तो अब आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं ये सर्वानुमति का निर्णय है उन सज्जन ने ने दो अन्य निर्णायको से अपनी मातृभाषा में बात करके अपनी बात मनवा ली। जब प्रथम पुरस्कार लेने स्कूल की टीम आई तो उनके साथ उनकी संगीत शिक्षिका को देखकर सारा माजरा समझ में आया उक्त शिक्षिका निर्णायक महोदय की जीवन संगिनी थी।

3. कुछ समय पहले हमने अखबारों में पढा था कि वर्तमान केंद्र सरकार के कुछ निर्णयों से असहमत होकर कुछ चमचों ने अपने आकाओं के इशारे पर देश के सर्वोच्च पदम् पुरस्कार वापस करके राष्ट्रीय पुरस्करों की धज्जियां उड़ाई थी। क्या यह उनके लिये उचित था???

पदम् पुरस्कार उन हस्तियों को दिया जाता है जिन्होंने अपने क्षेत्र  में कोई विशेष उपलब्धि हासिल की है। 

आज यह कहा जा सकता है कि वर्तमान सरकार ने जमीन से जुड़े उचित और योग्य लोगों को ये पुरस्कार देकर बड़ा ही सराहनीय कार्य  किया है। इसका मतलब ये नहीं कि पहले जिनको पुरस्कार मिले वे सब गलत थे। जो पात्र थे योग्य थे उन्होंने इन पुरस्कारों को आदर सहित सहेज कर रखा। पर जिन्हें गलत पुरस्कार मिले थे उन्होंने लौट कर अपनी असलियत खुद ज़ाहिर करदी।

तो मित्रों  अपना काम किये जाइये इन पुरस्करों के पीछे मत भागिये। भागने के चक्कर में आप कला से दूर हो जाएंगे।

और अंत बाल स्वरूप’राही’ के एक शेर से- 

हमने बौनों की जेब में देखा।

नाम जिस चीज़ का सफलता है।।

मोहन शर्मा,

संगीत सेवा सहारा,संस्था,इंदौर

Ramswaroop Mantri

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