-सुसंस्कृति परिहार
बिहार ने जब जब लोकतंत्र ख़तरे में आया है तब तब वहां तानाशाही के ख़िलाफ़ बिगुल बजा है जिसने ना केवल बिहार बल्कि संपूर्ण देश को मार्ग दिखाया है। सन् 1975 में इंदिरा सरकार ने मनमानी करने की कोशिश की आपातकाल लगाया। बिहार ने ही जयप्रकाश जी के नेतृत्व में तानाशाह होती सरकार के प्रति देश भर में सशक्त प्रतिरोध किया तथा चुनाव में तत्कालीन सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था। यह मनोदशा इंदिरा गांधी की तब बनी थी जब वे इलाहाबाद हाईकोर्ट से सरकारी कर्मी द्वारा चुनाव पंडाल निर्माण में सहयोग के दंडस्वरूप चुनाव में परास्त घोषित की गई थीं।तब चाटुकारों ने उन्हें एक साल अवधि बढ़ाने का परामर्श दिया और आनन-फानन में उन्होंने संविधान संशोधन का सहारा लिया।जिसकी आलोचना करते हुए इसे तानशाही करार दिया गया।तब जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निपटने आपातकाल लगाकर दूसरी बड़ी ग़लती कर दी थी। ये बात और है कि मोरारजी देसाई की सरकार असफल रहीऔर जल्द गिर गई तथा आमचुनाव में जनता जनार्दन ने इंदिरा गांधी को सम्मानपूर्वक पुनः चुना।
सन् 1975 में एक छोटी सी गल्ती से प्रारंभ होकर आपातकाल लगाने तक लोकतांत्रिक नियमों को ताक पर रखा गया। इस परिप्रेक्ष्य में यदि वर्तमान सरकार का रवैया देखें तो वह 2014 से ही संविधान विरोधी रुख अपनाए हुए है। वन मेन शुरू से ही हर क्षेत्र में दख़ल दे रहा है।सांसद ,मंत्रीगण सब दहशतज़दा हैं।इतना ही नहीं कार्यपालिका प्रमुख राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति इसकी थैली के चट्टे बट्टे बनने मज़बूर हैं।उनकी अपनी स्वतंत्र गरिमा का अवसान हो चुका है।वे वहीं बोलते हैं या उन बातों का अमल करते हैं जो जिल्ले सुहानी चाहता है। समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य वाली भारत सरकार अब पूंजीपति के हाथ का खिलौना बन चुकी है। देशहित से ज़्यादा वे बकौल राहुल गांधी हम दो हमारे दो के लिए प्राणप्रण से जुटे हुए हैं। सारी योजनाएं और विदेश यात्राएं उनकी भलाई के लिए ही बनाई जा रही हैं।पूंजीवादी राष्ट्र अमेरिका से यारी भी हमारी विदेश नीति के अनुरूप नहीं है।
इसके अलावा न्यायपालिका पर भी इनका आधिपत्य रहा है।पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ तक इन्होंने किस तरह कानून की धज्जियां उड़ाईं हैं। स्वतंत्र जांच एजेंसियों का भी मनमानी से बारहा इस्तेमाल हुआ है।इसी तरह निष्पक्ष रहने वाले चुनाव आयोग से मनमुताबिक काम कराने के लिए चुनाव आयुक्त की नियुक्ति समिति से सीजेआई को हटाकर उसका अपने तरीके से इस्तेमाल हो रहा है। महाराष्ट्र, बनारस और अन्य महत्वपूर्ण चुनावों में वोटरों की संख्या में भारी वृद्धि कर जीतना, ईवीएम हैक करवाने जैसे हथकंडों के बाद अब रुख बदलते बिहार के तकरीबन आठ करोड़ मतदाताओं से मताधिकार छीनने का उपक्रम करने विशेष कागजात मांगे जा रहे हैं।जिनकी प्राप्ति 25जुलाई तक असंभव है।
इसीलिए बिहार के लोगोकी जो गूंज उठी, उसने नए बिहार,नया भारत बनाने के सपनो की झलक दिखा दी है आज पटना एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील भारत की पुनर्रचना करने संकल्पित दिखा।क्यों ना हो बिहार का वैशाली जिला ही लिच्छवी गणतंत्र का उन्नायक है। गणतंत्र की जड़ें वहां बहुत गहरी हैं।
आज के बंद के दौरान राहुल गांधी, तेजस्वी यादव के बगल में सबसे प्रमुखता से भाकपा माले के दीपांकर भट्टाचार्य, सीपीएम के महासचिव एम ए बेबी, सीपीआई के डी राजा, कांग्रेस के दलित प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार, वीआईपी अध्यक्ष मुकेश सहनी खड़े थे।इसे बड़ी ताकत माना जा रहा है।
यह बिहार के किसानों, मेहनतकश मजदूरों, बेरोजगार नौजवानों, महिलाओं और दलितों की ताकत का इज़हार कर रही थी।यह नए बिहार के निर्माण में अपने को कुर्बान करने वाले स्वामी सहजानंद, कामरेड जौहर दत्त और कर्पूरी ठाकुर के सपने को साकार करने वाले लोगों की भीड़ थी।जो किसी से नहीं बरती।
चुनाव आयोग जिस तरह भाजपा की कठपुतली बना हुआ है वह निंदनीय है उससे नए चुनावी कानून को हटाने की मांग की गई है।
आंदोलन उग्र होने से पहले यह सूचना आई है कि दस जुलाई को सुको इस बात पर आई चार याचिकाओं पर अपना निर्णय सुनाएगा।
बहरहाल, बिहार में इस आंदोलन को मिली अपार सफलता के बाद लगता है निश्चित ही इसे हटा दिया जाएगा अन्यथा बिहार में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन आज भी उसे जागृत करने क्षमता रखता है। जयप्रकाश आंदोलन में लालू यादव थे आज उनके पुत्र तेजस्वी है।उस समय संघ और समाजवादी पार्टियां साथ थीं तो आज समस्त वामदल, समाजवादी साथी और कांग्रेस ने यह बीड़ा उठाया हुआ है। राहुल इस वक्त एक बड़ी ताकत बन गए हैं। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि पहले इतने मक्कार,झूठे और जालसाज लोग नहीं थे।
फिर भी आशा की जा सकती है कि एक ग़लती की सज़ा इंदिरा जैसी नेता को मिल सकती है तो अनेकों संविधान विरोधी काम करने वाले लोग कब तक खैर मनाएंगे। बिहार की ताकत ही ऐसे लोगों को बाहर करने की सामर्थ्य रखती है।
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