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तिरंगे का सिर्फ प्रचार प्रसार कर उसे इवेंट मनाना उचित नहीं

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शशिकांत गुप्ते

हमारे अपने देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के बारे में यह भी जानना जरूरी है।
2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टम में एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में जन्मे पिंगली वेंकैयाजी का नाम भले ही आज हर कोई न पहचानता हो, लेकिन यह वही शख्स हैं, जिन्होंने हमारे देश को उसका राष्ट्रीय ध्वज यानी तिरंगा दिया था। वेंकैयाजी ने ही भारत का राष्ट्रीय ध्वज बनाया था। बलिदान, समृद्धि और शांति के प्रतीक इस तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा दिलाने के लिए वेंकैया ने लंबी लड़ाई लड़ी थी।
कई भाषा और खेती में अच्छा ज्ञान रखने वाले पिंगली ने अपने जीवन का ज्यादातर समय देश सेवा में ही गुज़ारा। उनके पिता का नाम हनुमंतरायुडु और माता का नाम वेंकटरत्नम्मा था। मद्रास से हाई स्कूल पास करने के बाद, वह ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी चले गए थे।
वहाँ से लौटने पर उन्होंने एक रेलवे गार्ड के रूप में काम किया। इसके बाद, वह लखनऊ में एक सरकारी कर्मचारी के रूप में भी कार्यरत रहे और बाद में वह एंग्लो वैदिक महाविद्यालय में उर्दू और जापानी भाषा की पढ़ाई करने लाहौर चले गए।
पिंगली वेंकैयाजी ने साल 1916 से 1921 तक करीब 30 देशों के राष्ट्रीय ध्वज का अध्ययन किया, जिसके बाद उन्होंने तिरंगे को डिजाइन किया था। उस समय के तिरंगे और आज के तिरंगे में थोड़ा फर्क है। तब तिरंगे में लाल, हरा और सफेद रंग हुआ करता था।
लाल रंग का हटा कर सकी जगह भगवा रंग की पट्टी रखी।
भारत का मान बढ़ाने वाले तिरंगे को डिजाइन करने वाले पिंगली वेंकैया आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे। वेंकैयाजी आंध्र के मछलीपत्तनम के पास एक गांव में रहते थे। 19 साल की उम्र में वेंकैया ब्रिटिश आर्मी के सेना नायक बन गए। बाद में दक्षिण अफ्रीका में एंग्लो-बोअर युद्ध के दौरान पिंगली वेंकैया की मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। इस मुलाकात के बाद उनमें बदलाव आया और वह स्वदेश वापस आ गए। उन्होंने ब्रिटिशों की गुलामी के खिलाफ आवाज उठाते हुए स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। जब उन्होंने तिरंगे का निर्माण किया तो पिंगली वेंकैयाजी की उम्र 45 साल थी।
तिंरगे को भारतीय ध्वज के तौर पर मान्यता मिलने में करीब 45 साल लग गए। चरखे के जगह अशोक चक्र को ध्वज में शामिल किया गया। 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के वर्तमान स्वरूप को अपना लिया गया। उसके बाद इसे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर फहराया जाता है।
तिरंगे ध्वज के निर्माता का देहांत 4 जुलाई 1963 में हुआ। दुर्भाग्य पिंगली वैंकेया जी का निधन एक कुटिया में बहुत ही निर्धन स्थिति में हुआ।
उस महान आत्मा को सलाम है।
आज यह जानकारी देस वासियों को होना ही चाहिए।
तिरंगे का सिर्फ प्रचार प्रसार कर उसे एक इवेंट के रूप में मनाना उचित नहीं है।
हम सभी भारत वासियों को तिरंगे का सम्मान अपने दिल से करना चाहिए।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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