शशिकांत गुप्ते इंदौर
टेढ़े रस्ते की ये उलझी चाल है*
सब गोलमाल है भाई
सब गोलमाल है।
इस तरह गोलमाल करने की कुछ लोगों की मानसिक प्रवृत्ति होती है।
धनवानों की औलादें कामधाम कुछ करती नहीं हैं।पुश्तेनी ज्यायदाद को बेच बेच कर अपनी शनोशौक़त को पूरा करती है।अपने पुरखों को कोसती रहती है।
दादाजी ने मजदुरी करते हुए अपना पसीना बहाया।अपने बच्चों को पढ़ाया लिखाया।अच्छे संस्कार दिए।बच्चों ने भी पिताश्री के पदचिन्हों पर चलकर एक एक रुपया जोड़ कर ज्यायदाद बनाई।
दादाजी के बाद उनकी संतानों ने परिश्रम किया, और अपने पिताश्री की बनाई ज्यायदाद में इज़ाफ़ा किया।
जब पौतों को बनी बनाइ ज्यायदाद मिल गई तो, उन्होंने समाज में एक भ्रांति फैलाई की पुरखों ने कुछ किया ही नहीं।समाज का छोटा सा तबका पौतों ने फैलाई भ्रांति को सच समझने लगा।इस तरह के तबके के लोगों के लिए कहा जाता है कि, इन लोगों की स्वयं के दिमाग से सोचने क्षमता क्षीण होती है।यह लोग अंधभक्त कहलातें हैं।
पुश्तेनी ज्यायदाद के दुरुपयोग करने वाले पोते भी भ्रमवश यह समझने लग जातें हैं कि,समाज का जो तबका इनके द्वारा फैलाएं भ्रांति को सच समझ रहा है,समाज का सम्पूर्ण दायरा उतना ही है।यह उनकी कूप मण्डूकता है।
ये लोग मानसविज्ञान के मरीज होतें हैं।यह लोग कभी भी सच का सामना नहीं कर सकतें हैं।इसीलिए सदा झूठ बोलतें हैं और झूठ ही फैलाते रहतें है।
एक उक्ति है कि “सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं” झूठ अंतः झूठ ही रहता है।
यह लोग सामंती मानसिकता में विचरण करने वाले होतें हैं।यह लोग अपनी धार्मिक आस्था भी ऐसे प्रदर्शित करतें हैं,मानो ये लोग भगवान को दर्शन देने जातें हैं।जब ये लोग मंदिर में स्थित भगवान की प्रतीकात्मक मूर्ति के दर्शन करने जातें हैं, तब इनके लिए वी.आई.पी.सुविधा उपलब्ध होती है।इनके कारण आमजनों को दर्शनार्थ घण्टों कतार में खड़ा होना पड़ता है।ये लोग स्वयं अव्यवस्था फैलाते हैं,और लोकतांत्रिक व्यवस्था की आलोचना करतें रहतें हैं।यह लोग तानाशाही को पसंद करतें हैं।
इनलोगों को समाज के जिस तबके का समर्थन प्राप्त होता है उस तबके की मानसिक स्थिति इतनी दयनीय होती है।इसका प्रमाण यह विनोद है।
एक बार एक मिलिट्री के सभागृह में एक हास्यव्यंग्य का कवि सम्मेलन आयोजित हुआ।एक कवि ने हास्य की कविता सुनाई श्रोताओं की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
तब एक कमांडर खड़ा हुआ और उसने अपने भारी भरकम आवाज में आदेश दिया एक सब हँसते हुए ताली बजाएंगे ताली बजाओ।तब श्रोताओं ने ताली बजाई।
उपर्युक्त की मानसिक प्रवृत्ति के कारण ही सफाई अभियान के लिए बेतहाशा रुपयों का खर्च करना पड़ता है।
हे प्रभु आप सर्वशक्तिमान हैं।आप से कर बद्ध प्रार्थना है।हम लोगों की दिमागी सफाई का कोई मंत्र बताइए।
एक सामान्यज्ञान की बात है यदि दिमागी सफाई हो जाएगी तो कूड़े कचरें के लिए स्वच्छता अभियान चलाना नहीं पड़ेगा।अंग्रेजी भाषा में एक उक्ति है। Common sense is very uncommon
शशिकांत गुप्ते इंदौर





