अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

सर पर मैला ढोना ईश्वरीय काम है- नरेंद्र मोदी

Share

शिवानन्द तिवारी,पूर्व सांसद

प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने अपने मन की बात का सौंवा संस्करण कल पूरा किया. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद महीना में एक बार देश की जनता को अपने मन की बात सुनाने का सिलसिला उन्होंने शुरू किया था. कल उस सिलसिले का सौंवा संस्करण पूरा हुआ. देश भर में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता, नेता,  तथा मंत्रियों ने अपने अपने यहाँ चौपाल लगाकर मोदी जी की मन की बात का सामूहिक श्रवण किया.

नरेंद्र भाई गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो मुख्यमंत्री के रूप में भी उनका प्रवचन नियमित रूप से हुआ करता था. जहाँ तक मुझे स्मरण है सरकार के पदाधिकारियों के बीच नियमित रूप से वे अपने मन की बात सुनाया करते थे. उनके मन की बातों का संग्रह होता था और किताब की शक्ल में उसको छपवाया जाता था. मेरी नज़र उस पर उस समय गई जब मैंने किसी अख़बार में पढ़ा कि दक्षिण भारत के अनुसूचित जाति के संगठन के लोग नरेंद्र भाई के प्रवचनों वाली किताब को जलाकर अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं.

मेरे मन में उत्सुकता पैदा हुई. आख़िर वह कौन सी  बात है जिसको लेकर अनुसूचित जाति के लोग ऐसा उग्र विरोध कर रहे हैं. उस प्रवचन को ढूँढ कर मैंने पढ़ा. वह सर पर मैला ढोने की प्रथा पर था. उक्त प्रवचन में नरेंद्र भाई ने कहा था कि आख़िर ये लोग पुश्त दर पुश्त मैला ढोने का काम क्यों कर रहे हैं ! ऐसा नहीं है कि उनको कभी कोई दूसरे काम का अवसर नहीं मिला होगा. लेकिन इसके बावजूद ये लोग इस काम को छोड़ नहीं रहे हैं. इसलिए कि यह मानते हैं कि सफ़ाई का यह काम उनको ईश्वर ने सौंपा है. इसलिए दूसरे काम का अवसर मिलने के बावजूद पीढ़ी दर दर पीढ़ी इसको भगवान का काम मानकर कर रहे हैं. 

नरेंद्र भाई का यह प्रवचन भी संग्रह वाली उस किताब में था जिसको अनुसूचित जाति संगठन वाले जला रहे थे. जब विरोध की यह खबर नरेंद्र भाई के पास पहुँची तत्काल उसको उन्होंने बाज़ार से वापस मँगवा लिया.

जब मैं राज्य सभा का सदस्य था कांग्रेस की सरकार थी. मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री थे. उनकी सरकार में कुमारी सैलजा सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री थीं. एक सत्र में उन्होने राज्य सभा में एक बिल पेश किया था. उक्त बिल के मुताबिक़ सर पर मैला ढोने की प्रथा को आपराधिक क़रार दिया जाना था. जो यह काम करवाएगा वह भी दंड का भागी होगा. जिस समय वह बिल पेश हुआ था उस समय तक ऊपर वाली घटना की खबर मैं पढ़ चुका था.  उस खबर के आधार पर भाजपा को घेरने के इरादे से मैंने भी उस चरचा में भाग लिया. लेकिन मैंने एक चालाकी बरती. शुरुआत में मुख्यमंत्री का नाम या प्रदेश का नाम मैंने नहीं लिया. जब मैंने बताया कि एक मुख्यमंत्री मैला ढोने के काम को ईश्वर का काम मानते हैं. इसलिए अन्य काम का अवसर मिलने के बावजूद वे यह काम नहीं छोड़ते हैं. मुझे याद है. शैलजा जी तो यह सुन कर छी छी कहने लगीं. उसके बाद मैंने बताया कि ऐसा कहने और मानने वाले मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी हैं. 

उसके बाद तो पूछिए मत. लगा कि भाजपा वाले मुझे नोच लेंगे. जो शोर मचा. मेरी बात को कार्रवाई से निकाला जाए. यह याद नहीं है कि उस समय सदन की कार्यवाही का संचालन कौन कर रहा था. मैं चिल्लाते रह गया. मैं जो भी बोल रहा हूँ उसका प्रमाण मेरे पास है. उसको प्रस्तुत करने के लिए तैयार हूँ. लेकिन भाजपा के हल्ला के सामने कौन मुझे सुनता है !

नरेंद्र भाई के मन की बात का सौंवा संस्करण सुनने के बाद राज्य सभा का वह प्रकरण मेरे ध्यान में आया. खूब बोलते हैं! खूब सुनाते हैं. लेकिन कभी सुनते नहीं हैं. प्रधानमंत्री के रूप में इनका दूसरा कार्यकाल समाप्त होने को है. लेकिन अब तक प्रेस वार्ता इन्होंने नहीं की है. मीडिया को जम्हूरियत का चौथा खंभा कहा जाता है. जनता के सवालों पर सरकार से जवाब माँगना. सरकार की बातों की जानकारी जनता को दे देना. यही मीडिया का काम है. प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की बात तो देश की जनता दिन रात सुन रही है. लेकिन जनता की बात सुनने के लिए नरेंद्र भाई तैयार नहीं हैं. 

14 साल पहले एक किताब में मोदी ने इस काम को आध्यात्मिक अनुभव बताया था. उन्होंने इसे ‘संस्कार’ कहा था और इसे सिर्फ़ पेशा मानने से इनकार किया था.किताब पर बवाल मचने के बाद गुजरात सरकार ने इसे रातों रात वापस ले लिया था. आख़िर ऐसा क्या लिखा था इस किताब में?

गुजरात के कई हज़ार सफ़ाई कर्मचारी शायद यही मानते हैं कि साल 2007 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने अपनी किताब ‘कर्मयोग’ में जो विचार व्यक्त किए थे, अब शायद बदल गए हों.

साथ ही उन्हें डर इस बात का है कि मोदी के विचार यदि नहीं बदले हैं तो उनके बच्चे और आने वाली पीढ़ियां भी लोगों का मैला ही साफ़ करते रहेंगे.

बवाल के बाद वापिस

मोदी पुस्तक

अक्तूबर 2007 में नरेंद्र मोदी की किताब ‘कर्मयोग’ की लगभग 4,000 प्रतियां छपी थीं, लेकिन राज्य में चुनाव आचार संहिता के कारण किताब बांटी नहीं गई. लेकिन चुनाव बाद सरकार ने अचानक सभी प्रतियां वापस ले लीं.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पूर्व राजनीतिक संपादक राजीव शाह बताते हैं, “मुझे गुजरात सरकार के एक आला अफ़सर से किताब की प्रति पहले ही मिल गई थी. जब मैंने उसमें देखा कि मोदी ने दलित और जातिगत ढांचे को लेकर कई आपत्तिजनक बातें लिखी हैं तो मैंने इस बारे में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में लिखा. इसके बाद बवाल मचा और उसे सरकार ने वापस ले लिया.”

गुजरात सरकार में श्रम मंत्री और सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के प्रभारी दिलीप ठाकोर कहते हैं, ”जिस साल किताब छपी थी तब मैं सरकार में नहीं था. मुझे अब इतने साल बाद याद भी नहीं कि मैंने वह किताब पढ़ी थी या नहीं या क्या उसमें कुछ आपत्तिजनक लिखा था या नहीं.”

मोदी की क़लम से

अपनी किताब ‘कर्मयोग’ के पृष्ठ नंबर 48 पर नरेंद्र मोदी लिखते हैं, “आध्यात्मिकता के अलग-अलग अर्थ होते हैं. शमशान में काम करने वाले के लिए आध्यात्मिकता उसका रोज़ का काम है- मृत देह आएगी, मृत देह जलाएगा. जो शौचालय में काम करता है उसकी आध्यात्मिकता क्या? कभी उस वाल्मीकि समाज के आदमी, जो मैला साफ़ करता है, गंदगी दूर करता है, उसकी आध्यात्मिकता का अनुभव किया है?

इसी पन्ने पर वे आगे लिखते हैं, “उसने सिर्फ़ पेट भरने के लिए यह काम स्वीकारा हो मैं यह नहीं मानता, क्योंकि तब वह लंबे समय तक नहीं कर पाता. पीढ़ी दर पीढ़ी तो नहीं ही कर पाता. एक ज़माने में किसी को ये संस्कार हुए होंगे कि संपूर्ण समाज और देवता की साफ़-सफ़ाई की ज़िम्मेदारी मेरी है और उसी के लिए यह काम मुझे करना है.”

मोदी लिखते हैं, ”इसी कारण सदियों से समाज को स्वच्छ रखना, उसके भीतर की आध्यात्मिकता होगी. ऐसा तो नहीं होगा कि उसके पूर्वजों को और कोई नौकरी या धंधा नहीं मिला होगा.”

Ramswaroop Mantri

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें