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जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण

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संजय कनौजिया की कलम”✍️


जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण केवल विज्ञान का ही मुद्दा नहीं यह ग्लोबल पॉलिटिक्स का हिस्सा भी है..दुनियां भर के ग्लोबल नेता जब अलग-अलग तरह से जलवायु-पर्यावरण पर औद्योगिकी की भौतिकी को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग ब्यान देते हैं, जिसके कारण यह गंभीर मुद्दा, चिंता का कारण बना हुआ है.

.प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन कहा करते थे कि यदि कीड़े-कीट-पतंग भी केवल तीन वर्षों के लिए विलुप्त हो जाएँ तो दुनियां पूरी तरह से समाप्त हो जायेगी..जलवायु से प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टी, जल, तथा जीव-जंतु प्रभावित होते हैं, साथ ही जलवायु मानव की मानसिक तथा शारीरिक क्रियाओं पर प्रभाव डालती हैं..समझा जाए तो सबसे गहरी राजनीति प्रकृति और इंसानों के बीच ही होती है, पता भी नहीं चलता लेकिन प्रकृति इंसानों की हर क्रियाओं पर चुपचाप प्रतिक्रिया देती रहती है.

.2 वर्ष पूर्व के लगभग, “यूनाइटेड नेशन” से ताल्लुक रखने वाली एक संस्था “इंटेरगवर्मेंटल साइंस पॉलिसी प्लेटफार्म ऑन बायोडायवर्सिटी इकोसिस्टम सर्विस” (IPBES) ने 1800 पेजों की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी जिसमे तकरीबन 80 लाख प्रजातियों में से 10 लाख से अधिक पादप प्रजातियाँ और जंतु प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी हैं..इसका मुख्य कारण जंगलों का सिकुड़ना, मैदानी इलाकों का सिकुड़ना आदि हैं जिसके कारण जल-जमीन पर रहने वाली प्रजातियां समुन्द्र में रहने वाली प्रजातियां अधिक विलुप्त होती जा रहीं हैं..ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुन्द्र के पानी का तापमान बढ़ना और ग्लेशियर का तेजी से पिघलना, जिसकी वजह से समुन्द्र के पानी का तेजी से बढ़ना..

समुन्द्र के पानी का अपना तापमान और ग्लेशियर का तापमान मिलकर साइक्लोन (समुंद्री तूफ़ान) को अधिक बल देने लगा है..यही कारण है कि सर्दी-गर्मी के बदलते मौसम में गाँव और शहरों पर मानव ही नहीं अन्य जीवों पर भी नकरात्मक प्रभाव डाल रही है..जल-जंगल-जमीन को औद्योगिकी की व्यावसायिक होड़ की जद्दो-जहद जिस तरह से सिकोड़ती चली आ रही है उससे गाँव खत्म हो रहे हैं..हम अपने विकाशील और कृषिप्रधान देश भारत को ही लें तो देखते हैं कि गर्मियों में आग लग जाती है, बिहार बाढ़ त्रासदी से कभी निपट ना सका, उड़ीसा में फैनी तूफ़ान तांडव करता है तो बंगाल, तमिलनाडु या समुंद्री किनारों के नजदीक के दक्षिण भारतीय राज्य भयंकर नए-नए चक्रवातों से जूझते रहते हैं..वही वायु प्रदुषण उत्तर भारत के कई क्षेत्रों सहित राजधानी दिल्ली का मुद्दा है..लेकिन सत्ता की पिपासा इतनी ज्वलंत हो रखी है कि इस ओर कोई सोचता तक नहीं केवल बेबुन्यादि बकवास को उछालकर चर्चा और बहस करवाई जाती है और प्रसार भारती मूक होकर अपने चौथे स्तम्भ की इस करतूतों पर खामोश रहकर समर्थन करता है..बल्कि प्रकृति मानव जीवन में कितना महत्व रखती है.

.जिसके बिगड़ने से मानव जाति ही विलुप्त हो जायेगी, आज जरुरत है इस अभियान को चलाने की इस गंभीर विषय को राजनैतिक मुद्दा बनाने की, हर नागरिक को जागरूक करने हेतू गंभीर जागरण चलाने की, तभी हम जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को संरक्षण दे पाएंगे..!!
(लेखक-राजनैतिक सामाजिक चिंतक है)

Ramswaroop Mantri

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