चंद्रशेखर शर्मा
यदि पूछा जाए कि आपको आईपीएल में सबसे ज्यादा भद्दा क्या लगता है तो आपका जवाब क्या होगा ? जाहिर है यह सवाल उन्हीं से है जो आईपीएल देखते हैं और देख रहे हैं।
आईपीएल देखने वाले लोगों के इस सवाल के अलग-अलग जवाब हो सकते हैं। बहुत लोग पहले चीयर लीडर्स को लेकर अपनी नाक-भौं बांकी करते थे ! कुछ लोग हिंदी कमेंटेटरों की कमेंट्री पर नाना टिप्पणी करते हैं। अपन इन्हीं कमेंटेटरों की बात करेंगे। बात बहुत गौरतलब है।
हिंदी कमेंट्री की बात करें तो चलते मैचों में कमेंट्री बॉक्स या स्टूडियों का वातावरण सबसे ज्यादा सजधज वाला होता है। अकसर वहां फिल्मी कलाकार और सेलेब्रिटी भी तशरीफ़ लाते रहते हैं। सो वहां की एक अलग ही चकाचौंध होती है। अब तो ज्यादातर हिंदी कमेंटेटर पूर्व खिलाड़ी हैं और क्रिकेट को भद्रजनों का खेल कहा गया है। सो स्टूडियों में लोग भद्रलोक भी देखते हैं।
बहरहाल इस आईपीएल में एक खास बात पर अपना ध्यान गया। आपने भी गौर किया होगा कि कई हिंदी कमेंटेटर मैच में अनेक मौकों पर अलग-अलग एक स्पेसिफिक जुमला उचरते हैं। नमूने के लिए मैच में छक्का लगने पर वो कहते हैं ‘अनएकेडमी क्रेकिंग सिक्स !’ इसी तरह जब चौका लगता है तो कहते हैं एफर्टलेस रुपे ऑन द गो ! कई बार स्क्रीन पर टाटा की नई गाड़ी दिखाई जाती है और वो बाकायदा उसका नाम बोलते हैं, बल्कि कई बार तो उसकी खूबियों का भी बखान करते हैं। साफ है कि वो अनएकेडमी, रुपे और टाटा की गाड़ी आदि का विज्ञापन करते हैं। ऐसे और भी नमूने हैं ! अब जरा आंकड़े देखिए। इस आईपीएल में अभी तक करीब दो हजार छक्के-चौके लग चुके हैं ! यानी कुछ कमीबेशी के साथ इतनी ही बार वो स्पेसिफिक अनएकेडमी और रुपे वाले जुमले दर्शकों के कानों पर डाले गए। जानकारी के अनुसार कल सोमवार तक आईपीएल में सैंतालीस मैच हो चुके हैं। गणित लगाएं तो इसका मतलब यह हुआ कि हर मैच में औसतन करीब चालीस बार यह जुमले सप्रयास उचरे गए या कहें कि आपके कानों में डाले गए। वो भी सिर्फ छक्के-चौके के बहाने ! इसमें टाटा की नयी गाड़ी का नाम और दूसरे नमूने अलग हैं।
सवाल है कि क्या है ये ? ये कैसी कमेंट्री है ? जवाब यह है कि यह कमेंट्री के बहाने कानों के जरिये दर्शकों के दिलो-दिमाग पर एक तरह की चालाक हैमरिंग है ! जी हां। इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि विज्ञापन अब ब्रेक के मोहताज नहीं रहे। हालांकि कायदे से ऐसा बहुत पहले शुरू हो गया था। असल में यह तभी शुरू हो गया था जब मैच में खिलाड़ियों के बल्ले पर कम्पनियों के नाम आने लगे थे। उसके बाद खिलाड़ियों की टोपी से लेकर जूते तक सब विज्ञापन के टूल हुये, यह भी हम सबने देखा। गोया मैच में विज्ञापन या बाजार तब भी ब्रेक का मोहताज नहीं था। यानी बाजार ने मैदान पर खेलते खिलाड़ियों को तभी अपना टूल बना लिया था ! लेकिन यह क्या ? अब कमेंटेटर भी टूल बन गए ?
गोया मैच को इन्होंने मस्जिद समझ लिया है और कमेंटेटर मुल्ला हैं, जो हर मैच में औसतन चालीस बार कम्पनी के लिए ‘अजान’ देते हैं ! क्या यह भी एक तरह का प्रदूषण नहीं ? वो भी भद्रजनों के खेल में और खासकर कमेंट्री में ? अपना निजी अनुभव है कि यह बहुत इरिटेटिंग होता है। फिर आंख और कान में एक खास फर्क यह है कि आंख कहीं से हटाई जा सकती है। कान का इलाज आसान नहीं !
आप कहेंगे रिमोट हाथ में हो तो मैच को म्यूट करके भी देखा सकता है। यह बिलकुल हो सकता है, लेकिन अपन उस पीढ़ी से हैं, जिसने क्रिकेट को शुरू से ही कानों से देखा है ! सो अपने लिए क्रिकेट, बिना कमेंट्री के वैसे ही है जैसे कोई मूक या गूंगी फ़िल्म देखे। यद्यपि असल बात तो वो प्रदूषण है, जिससे कमेंट्री की निर्मल और निष्पाप नदी मैली हो रही है और मजबूर कमेंट्री रसिक दर्शक कुछ नहीं कर सकता। कारण यह कि आखिर वो बेचारा उपभोक्ता भी तो है ! कमेंटेटरों के पक्ष में कोई तर्क दे सकता है कि जब खिलाड़ी चलते मैच में विज्ञापन की वस्तु बन सकते हैं तो कमेंटेटरों के ऐसा करने में क्या आपत्ति है ? सही बात है और अब तो तकरीबन सभी कमेंटेटर भी पूर्व खिलाड़ी हैं। अलबत्ता एक अहम फर्क है कि खिलाड़ी अपने बैट और अन्य साजोसामान से विज्ञापन करते हैं और उनका सारा फोकस खेल पर होता है, लेकिन कमेंटेटरों के मामले में विज्ञापन को उनके कमेंट्री के फोकस में बलात घुसेड़ दिया गया है। यह नहीं पता कि कमेंटेटर इस बदफेली के लिए अलग से भुगतान प्राप्त कर रहे हैं या यह कमेंट्री करने की ऐसी कोई अनिवार्य शर्त हो गयी है। यह जो भी हो, अपना जवाब यह है कि आईपीएल में अपन को यही सबसे ज्यादा भद्दा लगता है ! कहते हैं कि इस साल आईपीएल की टीआरपी घटी है। क्या पता यह कमेंट्री भी उसकी वजह हो ! ऐसी बेहूदगी किसे सुहाएगी ? ऐसे तो फर्ज करो कभी यह भी हो सकता है कि छक्का लगने पर कमेंटेटर कहे, “वाह, क्या मोदी मैक्सिमम शॉट है !” चौका लगने पर कहे, “यह आला अमित शाह फोर है या बल्लेबाज के बोल्ड होने पर कहे, “यह योगी बुलडोजर बॉल थी !” कम से कम कोई स्टैंड अप कॉमेडियन ऐसी कोई पैरोडी तो रच ही सकता है।
–चंद्रशेखर शर्मा





