– तेजपाल सिंह ‘तेज’
इस लेख में भाजपा सरकार के 2014 से 2025 तक के कार्यकाल में दलितों और आदिवासियों की राजनीतिक नियुक्तियों की समीक्षा की गई है। यह विश्लेषण यह समझने में मदद करेगा कि भाजपा ने इन समुदायों को किन पदों पर नियुक्त किया और किन पदों पर नहीं, और इसके राजनीतिक निहितार्थ क्या हो सकते हैं।
विदित हो कि भाजपा सरकार ने अपने 11 वर्ष की साशन काल में अधिकार रहित अक्सर तमाम पदों यानी राष्ट्रपति जैसे पदो पर दलितों/ आदिवासियों को चुना जाता रहा है, किसी ऐसे पद पर नहीं जिनके पास कार्यकारी अधिकार होते हैं… आप इसके निहितार्थ क्या समझते हैं। यह प्रश्न राजनीतिक सत्ता और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है। इसे समझने के लिए हम इसे चरणबद्ध तरीके से देख सकते हैं–
1. सांकेतिक (सांकेतिक ) बनाम कार्यकारी पद:
दलितों और आदिवासियों को अक्सर सांकेतिक या प्रतिनिधि पद—जैसे राष्ट्रपति, राज्यपाल, या उच्चायोग के पद—पर नियुक्त किया गया है, जिनके पास प्रत्यक्ष कार्यकारी शक्तियाँ नहीं होती।
· सांकेतिक पद: सम्मान और दृश्य प्रतिनिधित्व, लेकिन नीति बनाने या प्रशासनिक निर्णय लेने की क्षमता सीमित।
· कार्यकारी पद: जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, या उच्च प्रशासनिक पद; इन पदों पर वास्तविक शक्ति होती है—नीति निर्धारण, बजट नियंत्रण, और फैसलों को लागू करने की क्षमता।
यह फर्क महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्ता का असली प्रभाव उन पदों पर होता है जिनके पास कार्यकारी अधिकार हैं।
2. निहितार्थ:
इस रणनीति के पीछे कुछ संभावित निहितार्थ हो सकते हैं:
1) दिखावटी समावेशिता
· दलित/आदिवासी नेतृत्व का संदेश देते हुए भी, सत्ता का केंद्र असली नीति और निर्णय-making में नियंत्रण में रहता है।
· यह एक तरह से सांकेतिक प्रतिनिधित्व है, जो सामाजिक संतुलन का संदेश देता है, लेकिन वास्तविक शक्ति पर असर नहीं डालता।
3 . राजनीतिक संतुलन
· यह सरकार को दलित/आदिवासी वोट बैंक को सम्मान देने जैसा दिखाने का मौका देता है, बिना सत्ता साझा किए।
4. .सत्ता संरचना का संरक्षण
· कार्यकारी निर्णय लेने वाले पद पर बहुसंख्यक जातियों या राजनीतिक समर्थकों को बनाए रखना, राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति हो सकती है।
5 . सामाजिक संदेश बनाम वास्तविक सुधार
· यह संकेत देता है कि “हमने प्रतिनिधित्व दिया,” लेकिन सत्ता-संबंधी असमानताएँ वही रहती हैं।
· अक्सर दलित और आदिवासी वर्गों को नीति निर्माण में सीधे शामिल नहीं किया जाता, जिससे संरचनात्मक असमानता बनी रहती है।
6. राजनीतिक दृष्टिकोण
· यह रणनीति अक्सर सांकेतिक राजनीति (Symbolic Politics) कहलाती है, जिसमें समाज को दिखाया जाता है कि “विकास और प्रतिनिधित्व हो रहा है,” जबकि वास्तविक शक्ति केवल सीमित वर्ग या समूह के पास रहती है।
· अगर यही पैटर्न जारी रहा, तो सत्ता में वास्तविक समानता या नीतिगत प्रभाव दलित/आदिवासी वर्गों के लिए कम रहेगा।
यह नीति प्रतिनिधित्व का भ्रम पैदा करती है—दलित और आदिवासी शीर्ष पदों पर दिखाई देते हैं, लेकिन असली निर्णय लेने की शक्ति उनके हाथ में नहीं होती। यह दिखावटी समावेशिता के अंतर्गत आती है, न कि वास्तविक सत्ता-समानता के।
दलितों और आदिवासियों की नियुक्तियाँ
1. राष्ट्रपति पद:
· रामनाथ कोविंद (2017): भा.ज.पा. ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया, जो एक दलित समुदाय से आते हैं।
· द्रौपदी मुर्मू (2022): द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद पर नियुक्त किया गया, जो भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनीं। The Washington Post
कार्यकारी पदों पर नियुक्तियाँ:
भा.ज.पा. ने दलितों और आदिवासियों को कार्यकारी पदों पर नियुक्तियाँ सीमित की हैं, जैसे कि:
· केंद्रीय मंत्री पद: केंद्रीय मंत्रिमंडल में दलित या आदिवासी समुदाय से किसी सदस्य की नियुक्ति की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
· मुख्यमंत्री पद: किसी राज्य में दलित या आदिवासी समुदाय से मुख्यमंत्री की नियुक्ति की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
2. राज्यपाल पद:
· लक्ष्मण प्रसाद आचार्य (2023): उ.प्र. के पूर्वी क्षेत्र से आदिवासी समुदाय के लक्ष्मण प्रसाद आचार्य को राज्यपाल नियुक्त किया गया।
· रामनाथ कोविंद (2015-2017): उ.प्र. के राज्यपाल के रूप में रामनाथ कोविंद की नियुक्ति भी दलित समुदाय से थी।
· थावर चंद गहलोत (2021): कर्नाटक के राज्यपाल के रूप में थावर चंद गहलोत की नियुक्ति, जो एक दलित समुदाय से आते हैं।
· सी. पी. राधाकृष्णन (2023): झारखंड के राज्यपाल के रूप में सी. पी. राधाकृष्णन की नियुक्ति, जो एक दलित समुदाय से आते हैं।
3. गवर्नर पद:
· अजय कुमार भल्ला (2025): मणिपुर और नागालैंड के गवर्नर के रूप में अजय कुमार भल्ला की नियुक्ति, जो एक दलित समुदाय से आते हैं। Wikipedia
अगर राज्यपाल नियुक्त किए भी जाते हैं तो उन प्रदेशों में जहाँ विपक्षी दलों की सरकारें होती हैं ताकि चुनी हुई सरकारों के सामने बाधा उत्पन्न की जा सके, क्या ऐसा नहीं है? इसके उदाहरण सुप्रीम कोर्ट के सामने भी है। यहां जिस बिंदु को उठाया है, वह भारतीय राजनीति में बहुत संवैधानिक और राजनीतिक जटिलता से जुड़ा है। इसे समझने के लिए हम विस्तार से देख सकते हैं।
1. राज्यपाल का संवैधानिक पद और शक्तियाँ
भारतीय संविधान के तहत राज्यपाल एक राज्य का संवैधानिक प्रमुख है।
· वह मुख्य रूप से गवर्नर के रूप में कार्य करता है।
· संविधान में उन्हें कुछ विशेष कार्यकारी अधिकार दिए गए हैं, जैसे:
· मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की नियुक्ति
· विधानसभा भंग करने या चुनाव की तारीख तय करने की सिफारिश
· विधायिका के विशेष सत्र बुलाना
· इनमें से कुछ शक्तियाँ विवादास्पद और विस्तृत विवेकाधिकार (discretionary powers) के अंतर्गत आती हैं।
संक्षेप में: राज्यपाल का पद “सांकेतिक ” तो है, लेकिन वास्तविक राजनीतिक निर्णयों में बाधा डालने की शक्ति भी है, खासकर विपक्षी सरकार वाले राज्यों में।
2. वास्तविक राजनीतिक परिदृश्य:
जब भाजपा जैसी केंद्र की सरकार राज्यपाल नियुक्त करती है, तो अक्सर ये राज्यपाल विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों में नियुक्त होते हैं। इसका उद्देश्य कई बार देखा गया है:
· मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की कार्रवाई पर प्रभाव डालना
· विधानसभा भंग करने या राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश
· विपक्षी नीतियों में देरी या बाधा उत्पन्न करना
यह सत्ता का राजनीतिक रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
3. सुप्रीम कोर्ट के मामले:
वास्तविक उदाहरणों में, कई बार राज्यपाल के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। उदाहरण:
1. कर्नाटक 2018: विधानसभा चुनाव में कोई भी पार्टी पूर्ण बहुमत नहीं पाई थी। राज्यपाल ने कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को सरकार बनाने का मौका देने की बजाय भाजपा को आमंत्रित किया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया।
2. मणिपुर 2022: भाजपा केंद्र में होने के बावजूद विधानसभा चुनाव में हारे विपक्षी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुलाने में देरी। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया।
3. उत्तर प्रदेश/मध्य प्रदेश: कई राज्यों में विपक्षी सरकारों के गठन या विश्वासमत के मामलों में राज्यपाल के “विवेकाधिकार” पर कोर्ट ने स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा कि राज्यपाल का विवेकाधिकार सीमित होना चाहिए और उन्हें “सार्वजनिक हित और संविधान की भावना” के अनुरूप काम करना चाहिए।
4. राजनीतिक निहितार्थ:
· यह दिखाता है कि सांकेतिक पद भी राजनीतिक शक्ति का साधन बन सकता है, खासकर विपक्षी राज्यों में।
· दलित या आदिवासी राज्यपालों को नियुक्त करना, यदि वह केंद्र की सत्ता के पक्ष में हो, तो सांकेतिक सम्मान और राजनीतिक नियंत्रण दोनों का संयोजन बन जाता है।
· इसका अर्थ है कि सत्ता और प्रतिनिधित्व का संतुलन सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि कभी-कभी राजनीतिक रणनीति के लिए भी उपयोग किया जाता है।
शायद यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में राज्यपालों की नियुक्तियाँ अक्सर विपक्षी दलों की सरकारों वाले राज्यों में की गई हैं, जिससे यह प्रश्न उठता है कि क्या इन नियुक्तियों का उद्देश्य चुनी हुई सरकारों के सामने बाधा उत्पन्न करना था। आइए इस विषय पर विस्तार से विचार करें।
5. राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति:
भारतीय संविधान के तहत, राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। हालांकि, संविधान में राज्यपाल को कुछ विवेकाधिकार (discretionary powers) प्रदान किए गए हैं, जैसे:
· विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को राष्ट्रपति को भेजने की सिफारिश करना (धारा 200)
· मंत्रियों की नियुक्ति और उनके इस्तीफे की स्वीकृति देना
· राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना
इन शक्तियों का प्रयोग संवैधानिक दायरे में और राज्य सरकार के सलाह पर होना चाहिए। CCAL
6. राज्यपाल की नियुक्तियाँ और राजनीतिक संदर्भ:
भा.ज.पा. सरकार ने कई राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारों के खिलाफ राज्यपालों की नियुक्तियाँ की हैं। उदाहरण के लिए:
· ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल): राज्यपाल जगदीप धनखड़ के साथ उनके संबंधों में तनाव रहा है, विशेषकर विधानसभा सत्रों के संचालन और विधेयकों की स्वीकृति को लेकर।
· अरविंद केजरीवाल (दिल्ली): दिल्ली के उपराज्यपाल के साथ कई मामलों में मतभेद उत्पन्न हुए हैं, जैसे विधायिका के अधिकारों का सीमित करना।
· शिवराज सिंह चौहान (मध्य प्रदेश): राज्यपाल लालजी टंडन के साथ भी कुछ मुद्दों पर मतभेद सामने आए थे, विशेषकर विश्वास मत के मामलों में।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि राज्यपाल की नियुक्तियाँ और उनके कार्यों का राजनीतिक संदर्भ महत्वपूर्ण होता है।
7. सुप्रीम कोर्ट की भूमिका:
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के विवेकाधिकारों के प्रयोग पर कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं:
· राज्यपाल विधेयकों को राष्ट्रपति को भेजने में देरी नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल को विधेयकों को लंबित रखने का अधिकार नहीं है। Institute of Systems Science
· राज्यपाल का विवेकाधिकार सीमित होना चाहिए: कोर्ट ने यह भी कहा है कि राज्यपाल का विवेकाधिकार केवल उन्हीं मामलों में होना चाहिए, जो संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेखित हों। Supreme Court Observer
इन निर्णयों से यह संकेत मिलता है कि राज्यपाल के विवेकाधिकारों का प्रयोग संवैधानिक दायरे में होना चाहिए और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उनका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
निष्कर्षत: राज्यपाल की नियुक्तियाँ और उनके कार्यों का राजनीतिक संदर्भ महत्वपूर्ण होता है। हालांकि, संविधान में राज्यपाल को कुछ विवेकाधिकार प्रदान किए गए हैं, उनका प्रयोग केवल संवैधानिक दायरे में और राज्य सरकार के सलाह पर होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यपाल के विवेकाधिकारों के प्रयोग पर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनका प्रयोग संवैधानिक दायरे में और निष्पक्ष रूप से हो।
विश्लेषण और निहितार्थ
भा.ज.पा. ने दलितों और आदिवासियों को सम्मानजनक और प्रतीकात्मक पदों पर नियुक्त किया है, जैसे राष्ट्रपति और राज्यपाल, जो मुख्य रूप से सांकेतिक होते हैं और इन पदों पर कार्यकारी शक्तियाँ सीमित होती हैं। इसके विपरीत, कार्यकारी पदों पर इन समुदायों की उपस्थिति नगण्य है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सत्ता के वास्तविक निर्णय लेने वाले पदों पर इन समुदायों का प्रतिनिधित्व सीमित है। यह रणनीति भाजपा की “सांकेतिक समावेशन” की नीति को दर्शाती है, जिसमें इन समुदायों को सम्मान देने का दिखावा किया जाता है, जबकि वास्तविक सत्ता संरचनाओं में उनका प्रतिनिधित्व न्यूनतम होता है।





