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*दीनदयाल विरद संभारी….*

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कनक तिवारी 

 दीनदयाल उपाध्याय के बौद्धिक और सांगठनिक वंशजों का देश की सत्ता पर कब्जा है। सत्तामूलक सपने की बुनियाद दीनदयाल उपाध्याय ने रखी थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सांस्कृतिक समझे जाते संगठन के तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर उर्फ गुरूजी तथा हिन्दू महासभा के मुखिया डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचार विमर्श ने संघ विचार का राजनीतिक चेहरा भारतीय जनसंघ के रूप में तराशा। संस्थापक अध्यक्ष डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी के रूप में संघ ने बौद्धिक तथा सांगठनिक दीनदयाल उपाध्याय को महासचिव बनाकर भेजा। सबसे ज्यादा वक्त और परिमाण में उपाध्याय ने जनसंघ के सियासी रास्ते का सर्वे, निर्माण और रखरखाव किया। 

दीनदयाल उपाध्याय ने संघ की विचारधारा की बौद्धिक और सांगठनिक क्षमता का फैलाव किया। उपाध्याय की बुनियादी समझ थी कि हिन्दुत्व विचारों से ओतप्रोत जनसंघ को सत्तामूलक राजनीति के लिए एकला चलो का रास्ता छोड़ना पड़ेगा। सबसे पुरानी पार्टी को सत्ता से बेदखल करने के लिए कांग्रेस से गांधी के प्रभाव को हाईजैक कर नेहरू विचार पर सीधा आक्रमण करना होगा। 

दक्षिणपंथी राजनीति के नियामक उपाध्याय धुर वामपंथियों की खिलाफत करते देश की राजनीति के मध्य मार्ग के पूरे दाएं हिस्से को जनसंघ का स्पेस बनाने में जुट गए। पांचजन्य, राष्ट्रधर्म, आर्गनाइजर तथा अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में संपादन और लेखन भी किया। उन्होंने किसी सिद्धांत का ढांचागत प्रतिपादन नहीं किया। उनके बारे में कोई धारणा बौद्धिक विचारक के रूप में नहीं बनाई जा सकी। उपाध्याय ने सत्ता निरपेक्ष रहकर अवधारणाएं सूत्र रूप में विकसित कीं। हिन्दुत्व की अवधारणाओं को लेकर शीर्ष विचारकों और बुद्धिजीवियों में आकर्षण नहीं है। दक्षिपंथ लगातार प्रहार करता रहा कि देश का इतिहास वामपंथियों को सिर चढ़ाकर लिखाया गया है। यही आरोप लगाते दीनदयाल उपाध्याय ने औसत भारतीय समझ के विन्यास, विकास और विस्तार में जाकर भारत की हिन्दूवादी सोच को राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय समझ के साथ स्थिर करते हुए आश्वस्त किया कि यह विचारधारा धीरे-धीरे लेकिन अंततः हुकूमत में पैठ जाएगी। 

एकात्म मानववाद पर चार लगातार व्याख्यान उनकी समझ को सीमाबद्ध अनुशासन में रखने का आंतरिक संयोजन है। गांधी से प्रभावित उपाध्याय उनसे समानांतर रहते जुड़ते अलग हो जाते थे। दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद की हाईपोथीसिस को लेकर विश्लेषण, व्याख्या और विमर्श किया लेकिन नई सैद्धांतिकी नहीं गढ़ी। उनका इंटीग्रल ह्यूमेनिज़्म वैचारिक मानवेंद्रनाथ राॅय के रेडिकल ह्यूमेनिज़्म की अनुकृति, निरंतरता या अगला संस्करण नहीं है। दीनदयाल ने दावा किया कि वे कुछ नया नहीं कर रहे। उपलब्ध भारतीय विचार को देश की समझ के केवल गले उतार रहे हैं। उपाध्याय ने गांधी की आलोचना भी की है। उपाध्याय को लेकर उनके अनुयायियों ने कोई महत्वपूर्ण लेखन नहीं किया। भाजपा का शीर्ष बुद्धिजीवियों से अलगाव है। हिन्दुत्व के विचार समूह का एक जिदनामा है। वह विपरीत, विसंगत और आलोचक अभिव्यक्तिकारों से विमर्श के ज़रिये अपनी समझ और अपने विचारों का प्रवर्तन नहीं करेगी। 

उपाध्याय पर डाॅ. महेश चंद्र शर्मा की पी0एच0डी0 की थीसिस ही जानकारी का मुख्य स्त्रोत है। दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने दूसरों के लेखों के संग्रह केवल प्रकाशित किए हैं। 1968 में दिवंगत दीनदयाल उपाध्याय पर लगभग 15-20 वर्षों तक कोई महत्वपूर्ण लेखन नहीं हो पाया। आर.एस.एस. विचारकों में से कुछ ने स्वीकार किया है कि शुरुआत में संघ के स्वयंसेवकों को पढ़ने लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। 1942 के बाद बाबा साहब आप्टे ने प्रचारकों में पढ़ने, लिखने, पुस्तकें सुझाने, पुस्कालयों में जाने आदि का आग्रह प्रारंभ किया। बाबा साहब ने दीनदयाल की अध्ययन प्रतिभा को पहचाना। कभी-कभी समीक्षात्मक भाषा बहुत सावधानी नहीं बरतने के कारण द्विअर्थी हो जाती है। डाॅ. महेश चंद्र शर्मा के अनुसार राष्ट्रीय संदर्भ में हिन्दू राष्ट्र की उनकी अवधारणा व हिन्दू मुस्लिम समस्या की ओर देखने का उनका नजरिया पर्याप्त विवादास्पद रहा है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसके कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा आंदोलन ही विवादास्पद रहा है। 

दीनदयाल ने महत्वपूर्ण दस्तावेज डाॅ. राममनोहर लोहिया के साथ गैर कांग्रेसवाद पर लिखा। वह 1967 के चुनाव में कांग्रेस की असफलता का आधार बना। उसमें लोहिया की प्रखरता और उपाध्याय की भवितव्यता एक साथ झांकती है। हिन्दुत्व समर्थक कुछ लेखकों और किताबों ने महात्मा गांधी के साथ दीनदयाल की समझ को जबरिया समन्वित करने की कोशिश की है। सच है कि गांधी हर विचारधारा के लिए केवल सीढ़ी हैं। उस पर चढ़कर कोई भी अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है। बाद में यह सावधानी भी रखता है कि लात मारकर उस सीढ़ी को गिरा दे।

Ramswaroop Mantri

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