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नोटबंदी : भारतीय लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के इतिहास की काली रात

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अनजाने में हुई भूल नहीं, सोच समझकर लिया गया निर्णय 

सुनील कुमार

8 नवम्बर, 2016 को 500 और एक हजार के नोट पर लाई गई पाबंदी की नीति ने पूरे भारत में मानो भूचाल सा ला दिया था। इसकी घोषणा खुद प्रधानमंत्री मोदी ने की। नोटबंदी के निर्णय को सुनाने वाली यह नीति भारतीय अर्थव्यवस्था में ही नहीं, इसकी राजनीति में भी एक बड़े बदलाव को जन्म दिया।लंबे समय तक यह बहस होती रही कि इस निर्णय को सुनाने का अधिकार किसे है और किसे नहीं है। लेकिन, आने वाले समय में यह तय हो चुका था कि नीति-निर्णय हो या उद्घाटन सभी कुछ प्रधानमंत्री के निर्णयों से ही तय होना है। इसने भारतीय राजनीति की कार्यशैली में एक बड़ा बदलाव ला दिया था।

8 नवंबर 2016 की रात भारतीय लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के इतिहास की उन रातों में शामिल है, जब एक प्रशासनिक निर्णय ने करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन को अचानक और गहराई से बदल दिया। मैं उस दिन एक दोस्त के घर जा रहा था। रास्ते में बाज़ार में सब्ज़ी बेचने वाले बेहद परेशान थे।

एक सब्ज़ीवाले ने कहा — “सारे के सारे ग्राहक 500 रुपये का नोट लेकर आ रहे हैं, मेरे पास अब कोई छुट्टा नहीं बचा।” कई लोगों से बात करने पर पता चला कि नोटबंदी लागू कर दी गई है। जब मैं दोस्त के घर पहुँचा और उसे बताया, तो वह भी एटीएम से पैसे निकालने दौड़ पड़ी, लेकिन निराशा हाथ लगी, एटीएम पर पहले से ही भीड़ थी और पैसे खत्म हो चुके थे। लोग एक एटीएम से दूसरे एटीएम की ओर भाग रहे थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस रात ठीक 8 बजे टीवी पर आकर अचानक घोषणा की कि 500 और 1000 रुपये के नोट अब अवैध होंगे।

उन्होंने कहा  “आज आधी रात से ये करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे। ये मुद्राएं कानूनन अमान्य होंगी। भ्रष्टाचार, काले धन और जाली नोट के कारोबार में लिप्त देश-विरोधी और समाज-विरोधी तत्वों के पास मौजूद 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट अब केवल काग़ज़ के टुकड़े रह जाएंगे। हमारे इस कदम से देश में भ्रष्टाचार, काला धन और जाली नोटों के खिलाफ चल रही लड़ाई को ताकत मिलेगी। जो लोग मेहनत और ईमानदारी से संपत्ति अर्जित करते हैं, उनके हक की पूरी रक्षा की जाएगी।”

मोदी की इस घोषणा के साथ ही देश में चलन में मौजूद लगभग 86 प्रतिशत मुद्रा अचानक बंद हो गई। यह निर्णय जितना प्रशासनिक था, उतना ही मनोवैज्ञानिक भी। सिर्फ 43 दिनों में नोटबंदी से जुड़े नियम 60 बार बदले गए

यह सिर्फ मुद्रा परिवर्तन नहीं था; बल्कि भारतीय आर्थिक संरचना के धड़कते हृदय पर लगी गहरी चोट थी। इसके कारण व्यापार-धंधे ठप पड़ गए, लाखों छोटे उद्योग लॉकडाउन से कई वर्ष पहले ही नोटबंदी के झटके से डगमगा गए थे। हजारों मज़दूर रोज़गार छोड़ गाँव लौट गए, उत्पादन घटा, और रोजगार में भारी कटौती हुई।

जीडीपी की वृद्धि दर में गिरावट आई, और लोगों की सामाजिक ज़िंदगी तक ठहर गई — यहाँ तक कि कई परिवारों की शादियाँ तक टालनी पड़ीं। विडंबना देखिए, जब आम लोगों के घरों में शादियाँ रुक रही थीं, उसी समय 16 नवंबर 2016 को भाजपा के पूर्व मंत्री जनार्दन रेड्डी ने अपनी बेटी की शादी में 500 करोड़ रुपये खर्च किए।

500 और 1000 रुपये के नोटों की जगह 2000 रुपये का नोट चलन में लाया गया। इस पर भी कई सवाल उठे। इसे सही ठहराने के लिए गोदी मीडिया ने यह तक कहा कि “2000 के नोटों में चिप लगी है जिससे कहीं भी नोट होंगे, उनका पता चल जाएगा।” लेकिन असलियत यह थी कि 2000 के नोट आने के बाद भी लोगों की जेब में पैसे तो थे, पर छोटे-मोटे सामान खरीदने की स्थिति नहीं थी। छोटे दुकानदारों के लिए बिक्री लगभग असंभव हो गई थी।

लंबी लाइनों में लगने के दौरान कम से कम 150 लोगों की मौतें हुईं जो विभिन्न समाचार पत्रों में रिपोर्ट किया गया, पर सरकार आज तक इस आंकड़े को मानने से इंकार करती रही। सरकारी रिकॉर्ड में नोटबंदी से एक भी मौत दर्ज नहीं है।

मोदी सरकार का यह फैसला अंततः एक तुगलकी फ़रमान साबित हुआ।

रिज़र्व बैंक के अनुसार, 500 और 1000 रुपये के कुल 15.417 लाख करोड़ रुपये चलन में थे, जिनमें से 15.310 लाख करोड़ रुपये वापस बैंकों में लौट आए। यानी, काला धन लगभग पूरी तरह सफेद कर दिया गया। देश को इस प्रक्रिया में लगभग 9 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ।

सामान्यतः करेंसी से जुड़े ऐसे निर्णय रिज़र्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, लेकिन नोटबंदी का निर्णय सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से लिया गया। रिज़र्व बैंक ने भी अपनी बैठक (घोषणा से लगभग ढाई घंटे पहले) में यह स्पष्ट कर दिया था कि इससे देश में भारी अव्यवस्था उत्पन्न होगी, और काले धन या नकली नोटों पर कोई वास्तविक रोक नहीं लगेगी। नोटबंदी के तुरंत बाद ही गुजरात के सूरत में लाख रुपये के नकली नोट पकड़े गए थे।

प्रधानमंत्री मोदी का यह निर्णय किसी मायने में “दिल्ली से दौलताबाद” की यात्रा जैसा साबित हुआ। 19 मई 2023 को रिज़र्व बैंक ने आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर घोषणा की कि 2000 रुपये के नोटों को भी प्रचलन से वापस लिया जा रहा है, हालाँकि वे “वैध मुद्रा” बने रहेंगे।

नोटबंदी के बाद नकली नोटों की संख्या में और भी तेज़ी आई। 2016-17 में जहाँ 500 रुपये के 199 और 2000 रुपये के 638 नकली नोट पकड़े गए थे, वहीं 2017-18 में यह संख्या बढ़कर क्रमशः 9,892 (500 रू.) और 17,929 (2000 रू.) हो गई। सात वर्षों बाद, 2023-24 में पकड़े गए जाली नोटों की कुल संख्या 2,22,639 रही।

इसमें 500 रू. के 85,711 और 2000 रू. के 26,035 नोट शामिल थे। 2024-25 में यह संख्या 2,17,396 जाली नोटों तक पहुँच गई, जिनमें अकेले 500 रू. के 1,17,222 नोट थे। यह तो सिर्फ पकड़े गए नोटों की संख्या है असल में कितने नकली नोट चलन में हैं, इसका कोई अनुमान नहीं।

भ्रष्टाचार और वास्तविकता

भ्रष्टाचार उन्मूलन के दावे भी ढह गए। 2016 में भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत 176 देशों में 79वें स्थान पर था, 2023 में 93वें, और 2024 में 180 देशों में 96वें स्थान पर पहुँच गया। यानी, भ्रष्टाचार घटने के बजाय और बढ़ गया।

8 नवंबर 2016 को मोदी ने कहा था- “देश को भ्रष्टाचार और काले धन रूपी दीमक से मुक्त कराने के लिए एक और सशक्त कदम की आवश्यकता है। समाज-विरोधी तत्वों के पास मौजूद 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट अब केवल काग़ज़ के टुकड़े समान रह जाएंगे। 50 दिन में सब ठीक हो जाएगा। अगर नहीं हुआ तो जिस चौराहे पर चाहो, सज़ा दे देना।”

अब 50 दिन नहीं, 3288 दिन बीत चुके हैं न तो भ्रष्टाचार कम हुआ, न जाली नोट बंद हुए, न ही 500 और 1000 के नोट काग़ज़ के टुकड़े बने। बल्कि, इन सबमें और इज़ाफ़ा हुआ है। और न ही प्रधानमंत्री मोदी किसी चौराहे पर पहुँचे। बल्कि वे इस निर्णय का जश्न मनाते रहे। जब जनता बैंक की कतारों में खड़ी थी,मोदी जी जापान के टोक्यो में  बोल रहे थे “कल तक गंगा में चवन्नी तक न डालने वाले लोग अब नोट बहा रहे हैं।” भाजपा प्रवक्ता इसे “काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक” कह रहे थे। विपक्ष इसे आर्थिक आपदा बताता रहा, जबकि भाजपा ने इसे “भ्रष्टाचार-विरोधी प्रतीक दिवस” घोषित करने की कोशिश की।

अर्थशास्त्रियों की राय

भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा था- “मोदी सरकार का नोटबंदी का फैसला ‘गुड इकोनॉमिक्स’ कतई नहीं था। इसके फायदों से कहीं अधिक, नुकसान हुए हैं।”

नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रूगमैन ने कहा था – “बड़े नोटों को बंद करने से भारत की अर्थव्यवस्था को कोई बड़ा फायदा नहीं होगा। इससे सिर्फ भ्रष्ट लोग भविष्य में ज़्यादा सतर्क हो जाएंगे और अपने पैसे को सफेद करने के नए तरीके ढूंढ लेंगे।”

अमर्त्य सेन ने कहा था- “नोटबंदी का फैसला मनमाना है। यह न केवल नोटों की अहमियत को, बल्कि बैंकिंग प्रणाली और भरोसे पर चलने वाली पूरी अर्थव्यवस्था की अहमियत को भी कम कर देता है।”

बिजनेस मैगज़ीन फोर्ब्स के एडिटर-इन-चीफ़ स्टीव फोर्ब्स ने लिखा- “नोटबंदी जनता के पैसे पर डाका डालने जैसा फैसला है।”

यही कारण है कि आज मोदी बिहार के किसी चुनावी रैली में नोटबंदीकाले धन या भ्रष्टाचार की बात नहीं कर रहे। बल्कि घुसपैठिया, कट्टा और अन्य बनावटी मुद्दों की बात करते हैं। नोटबंदी हो या घरबंदी (लॉकडाउन) दोनों हमें 14वीं शताब्दी की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाते हैं, जब दिल्ली से दौलताबाद की राजधानी स्थानांतरण का निर्णय लिया गया था एक ऐसा निर्णय जो जल्दबाज़ी, अव्यवस्था और जनता के असहनीय कष्टों से भरा हुआ था।

नोटबंदी और घरबंदी, दोनों उसी परंपरा के विस्तार थे  जहाँ सत्ता के मन की तुष्टि तो हुईऔर अपने छिपे एजेंडा को लागू कर पाई पर जनता के श्रमखून और पसीने की कीमत चुकानी पड़ी। आज भारत की मेहनतकश जनता के लिए नोटबंदी एक आर्थिक आपदा और ऐतिहासिक त्रासदी के रूप में दर्ज है, जो इतिहास कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

ऐसा ही एक निर्णय महज तीन साल के अंदर ही, जब कोविड-19 की महामारी तेजी से फैल रही थी, प्रधानमंत्री ने देश के नाम संबोधन किया और पूरे देश में लाॅकडाउन लगा दिया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री एक सर्वोच्च सरकार की तरह खुद को स्थापित का चुके थे। बाकी आम जन ही नहीं, उसके ऊपर बैठे मध्यवर्ती लोगों को भी उनका निर्णय सुनना था और उसे मानने के लिए विवश होना था। कल्ट का निर्माण राजसी वैभव हासिल हो चुका था और निर्माण में नीचे तबाही का मंजर चारों तरफ बिखरा हुआ था।

आमतौर पर भारत में हुए नोटबंदी को कालाधन से उलझा दिया जाता है। जिस समय नोटबंदी की गई, उसके उद्देश्य को लेकर खुद केंद्र की भाजपा सरकार के मंत्री तक स्पष्ट नहीं थे और कई तरह के बयान दे रहे थे। कुछ इसे कालाधन से, कुछ आतंकवाद से, कुछ सट्टेबाज और सटोरियों आदि से जोड़ रहे थे।

मुद्रा बाजार और परिचालन से दो नोटों के अचानक चलन से बाहर कर देने से लोग जगह-जगह फंसे हुए थे। बस स्टैंड, हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों से लेकर अस्पतालों तक भुगतान की समस्या ने लोगों को उलझा दिया था। मजदूरों की मजदूरी फंस गई और खेतों में उग रहे पौधों के खाद-पानी खरीदने, भुगतान करने और पाने की समस्या से किसान त्रस्त हो रहे थे। व्यापारी अफरा-तफरी में इधर उधर भाग रहे थे।

अचानक लाये गये 2000 के गुलाबी नोटों की अदला बदली और एटीएम से निकालने की सीमा की वजह से आम लोगों के लिए जीना ही चुनौती बन गया था।

इसका सीधा असर उद्योगों की गतिविधि पर पड़ा। पहले से धीमी पड़ी हुई आर्थिक वृद्धि दर 2 प्रतिशत से अधिक गिरी। महज महीने भर के अंदर 15 लाख लोग रोजगार से बाहर हो गये। उस समय सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार 2016-17 में रोजगार की संख्या लगभग 43.97 करोड़ थी जो 2017-18 में घटकर 42.61 करोड़ रह गई।

नकद पर आधारित खेती पर गहरा असर पड़ा। उड़ीसा, बिहार, उत्तराखंड, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में कुल खेती के क्षेत्रफल में 2015-16 से 2017-18 की समयावधि में गिरावट देखी जा सकती है। भोजन पर होने वाले खर्च तेजी से कम हुए। 2017-18 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि कुल रोजगार की संख्या में तीव्र गिरावट है।

इसके कुछ समय बाद ही कोविड-19 महामारी में किया गया लाॅकडाउन इसे और भी भयावह बनाने की ओर ले गया।

नोटबंदी और उसके बाद लाॅकडाउन का सीधा असर खेती पर निर्भर आबादी में हुई वृद्धि में देखा जा सकता है। यह दुनिया की विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की मौलिक प्रकृति के उलट गति थी। इसे मूलतः अर्थव्यवस्था का सामंतीकरण कहा जाता है।

भारत में इस काम को पहले अंग्रेजों ने अंजाम दिया था। भारत की मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों को तबाह कर शहरी आबादी को गांव में जाने के लिए मजबूर किया और एक नियंतित्र शहरी उत्पादन व्यवस्था को जन्म दिया। इसी तरह उसने खेती को भी अपने हितों के साथ नियंत्रित किया। इसका सीधा नतीजा हम गांवों में अकाल और भुखमरी से होने वाली मौतों में देखते हैं और चंद शहरों में बेहद धीमी गति से चल रही उद्योगिक गतिविधियों को देखते हैं जिसमें मजदूरों को रोजगार देने और उचित मजदूरी और आवास तक देने की क्षमता नहीं थी।

नोटबंदी ने बडे़ पैमाने पर डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा दिया और इससे जुड़े उद्यमों को एकदम से उछाल पर ला खड़ा किया। अनौपचारिक आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाया। मुद्रा से संबंधित बाजार और रीयल स्टेट को अग्रिम कतार में ला खड़ा किया।इसका सीधा नतीजा काले धन का बाजार फिर से खड़ा हुआ और बैंक डिफाल्टर्स की संख्या में तेज वृद्धि हुई।

इस सबके साथ राजनीति का गहरा रिश्ता बना रहा। और, इसका सीधा फायदा भाजपा को मिला। 2017 में विधानसभा चुनावों भाजपा और उसकी सहयोगी गठबंधन को 7 राज्यों में सफलता मिली। कुछ राज्यों में खरीद-फरोख्त से इनकी सरकार बना ली गई।

नोटबंदी और उसके बाद के समय में लिये गये निर्णय एक दूसरे के साथ जुड़े हुए दिखते हैं। इन निर्णयों का नतीजा हम केंद्र और राज्य की सरकार निर्माण में भाजपा का दबदबा बढ़ता जाता है। भाजपा मोदी को और मोदी खुद को, मीडिया और उसकी व्यवस्था के साथ कदम बढ़ाते हुए एक ईश्वरी रूप में पेश किये जाते हैं।

मुद्रा की व्यवस्था पर सीधा नियंत्रण कायम किया जाता है और चंद उद्योगपतियों को तेजी से बढ़ावा दिया जाता है। संगठित क्षेत्र की उद्योगिक संरचना क्षरित होते हुए दिखती है, वहीं अनौपचारिक और सेवा क्षेत्र में तेज वृद्धि को देखा जा सकता है। शहर से आबादी गांव की ओर बढ़ती है जिससे न सिर्फ खेतों पर दबाव बढ़ता है, ग्रामीण जीवन भी प्रभावित होता है। शहरों से आबादी को भगाने के लिए बड़े पैमाने पर बुलडोजर नीति अपनाई जाती है जो कोरोना काल के दौरान भी जारी रहती है और बाद के समय में और भी यह भयावह हो गया।

मजदूरों के न्यूनतम अधिकार बड़े पैमाने छीने गये और उनकी वास्तविक आय घोषित किये गये न्यूनतम मजदूरी से काफी नीचे चली गई। संगठित होने का अधिकार तक या तो उसे कम कर दिया गया या उसे खत्म कर दिया गया। एक तबाह हो रही अर्थव्यवस्था में मोदी ने पांच किलों अनाज की गारंटी स्कीम जारी की।

सामंती मूल्यों से भरे भगवा ब्रिग्रेड के कार्यकर्ताओं ने सनातन के उद्घोष को और हिंसक बना दिया। जाति, वर्ण, धर्म, शुचिता, सेवा, पैरपूजन जैसे शब्द आम होते चले गये और उतने ही ग्रहणीय भी हो गये। बाबाओं का साम्राज्य गांव से लेकर बंगलौर जैसे शहरों तक फैलता चला गया।

दरअसल, नोटबंदी आरएसएस और भाजपा की राजनीतिक आकांक्षाओं का ही परिणाम था, यह उनके राजनीति-अर्थशास्त्र के दर्शन की जमीनी सच्चाई थी। इससे आरएसएस देश का सबसे बड़ा संगठन, भाजपा देश की सबसे धनी पार्टी और अडानी-अंबानी, बाबा रामदेव, रामरहीम जैसे समूहों का उत्थान हुआ।

दूसरी ओर बेरोजगारी से जूझते युवा, आवास की तलाश में तबाह होते कामगार, प्रवास-अप्रवास की चक्रीय गति में फंसे करोड़ों रोजगार की तलाश करते लोग, लालफीताशाही में फंसे छोटे उद्यमी और व्यापारी और तबाही के लिए अभिशप्त किसान पैदा हुए हैं। भूख, भय, अस्थिरता, आशंका, असुरक्षा जैसे वे तत्व हैं जो भारत के हर कोने में फैले हुए हैं। आत्महत्या, मानसिक अस्थिरता, हिंसा के जघन्य रूप भारत के हर कोने में फैल गये हैं।

व्यवस्था के नाम पर आरएसएस और उनके सहयोगी संगठन सनातन धर्म की वकालत कर रहे हैं और वर्णव्यवस्था को चलाये रखने के लिए आये दिन हमलावर हो रहे हैं। हमें यहां एक बार याद कर लेना होगा कि एक झटके से सिर्फ नोटबंदी ही नहीं लाया गया, लाॅकडाउन भी लाया गया।

यह कोई अपरिपक्व निर्णय नहीं था, यह एक परिपक्व निर्णय था जिसके नतीजे तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही सामने आते जा रहे हैं और आगे आएंगे। यह सब कुछ भारत जैसे देश के लिए भयावह है और आम नागरिक के लिए एक चुनौती भी है।

इसलिए जरूरी है कि चरम प्रतिक्रियावाद की इस फासीवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र को ध्यान से देखा और परखा जाए और इसे समझा जाए। समाज की गति कई बार पीछे जाती हुई दिखती है। दरअसल, वह पीछे की ओर नहीं वर्तमान को सड़ांध में ठेलती हैं जिससे एक बेहतर जिंदगी जीने का सपना खत्म हो जाए और संड़ांध पर पलने वाले बने रहें। इस संड़ांध से अपने समाज को बाहर ले आने के लिए जिस तरह के प्रयास की जरूरत हैं उसमें नीहित जोखिम से इंकार नहीं किया जा सकता। अभिव्यक्ति के खतरे तो उठाने ही होंगे।

Ramswaroop Mantri

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