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*डॉ. अंबेडकर: दलितों के ही नहीं, ओबीसी अधिकारों के भी शिल्पकार थे*

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तेजपाल सिंह ‘तेज’

          भारत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिनकी छवि समय के साथ अधूरी या सीमित रूप में प्रस्तुत की गई है। डॉ. भीमराव अंबेडकर भी उन्हीं में से एक हैं। आम धारणा यही रही है कि अंबेडकर केवल दलितों के नेता थे, उन्होंने केवल दलित समाज की मुक्ति और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। यह बात निस्संदेह सच है कि अंबेडकर ने दलित समाज को आत्मसम्मान, शिक्षा और समान अधिकार दिलाने के लिए महान संघर्ष किया, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि उनकी दृष्टि दलित प्रश्न से कहीं आगे तक जाती थी। वे उस व्यापक सामाजिक ढाँचे को समझते थे जिसमें केवल दलित ही नहीं, बल्कि अन्य पिछड़ी जातियाँ भी शोषण और वंचना की शिकार थीं। उनके संघर्ष का एक बड़ा हिस्सा ओबीसी समाज को संवैधानिक मान्यता और अधिकार दिलाने की दिशा में समर्पित था। यह पहलू दशकों तक दबा दिया गया और सत्ता ने सुनियोजित ढंग से उनकी छवि को केवल “दलितों के मसीहा” तक सीमित कर दिया। किंतु अब समय है कि इतिहास के इस दबे हुए सत्य को सामने लाया जाए।

          भारत के आधुनिक इतिहास में डॉ. भीमराव अंबेडकर को प्रायः केवल दलितों के मसीहा और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह बात निस्संदेह सत्य है कि उन्होंने दलित समाज के लिए अद्वितीय योगदान किया। किंतु यह अधूरा सत्य है। दरअसल, अंबेडकर की दृष्टि कहीं अधिक व्यापक थी। उन्होंने केवल दलितों के लिए नहीं, बल्कि भारत की सबसे बड़ी सामाजिक श्रेणी – अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) – के लिए भी संवैधानिक रास्ता खोला। यह पहलू दशकों तक दबा दिया गया। राजनीति ने अंबेडकर की छवि को केवल “दलितों के नेता” तक सीमित कर दिया। लेकिन अगर हम ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और संविधान सभा की बहसों को ध्यान से पढ़ें, तो एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती है।

शुरुशुआती पृष्ठभूमि: अंबेडकर और सामाजिक प्रश्न:

          अंबेडकर का जीवन ही शोषण, अपमान और भेदभाव से भरा था। बचपन में छुआछूत झेलने वाले इस बालक ने शिक्षा के बल पर वह ऊँचाई हासिल की, जहाँ से उन्होंने पूरे समाज के शोषित वर्गों की आवाज़ बनने का संकल्प लिया।

लेकिन यहाँ एक अहम बात समझनी होगी – अंबेडकर केवल “दलित प्रश्न” तक सीमित नहीं थे। उनकी नजर उस पूरे सामाजिक ढाँचे पर थी जिसमें जाति-आधारित भेदभाव की जड़ें गहरी थीं। यही कारण था कि 1920 के दशक में ही वे “शोषितों” की व्यापक श्रेणी की बात करने लगे थे।

1928: “स्टार्ट कमेटी” और “अन्य पिछड़ी जातियों” शब्द का जन्म:

          1928 में ब्रिटिश सरकार ने “स्टार्ट कमेटी” (Simon-Stuart Committee के रूप में भी संदर्भित) का गठन किया। इसका उद्देश्य शिक्षा और समाज में पिछड़ी जातियों की स्थिति का आकलन करना था। इसी समिति के सामने एक युवा वकील और विद्वान – डॉ. अंबेडकर – उपस्थित हुए। यहाँ उन्होंने पहली बार “Other Backward Classes” यानी “अन्य पिछड़ी जातियाँ” शब्द का प्रयोग किया। यह ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि इससे पहले भारतीय समाज को केवल “सवर्ण” और “अस्पृश्य” (दलित) जैसी श्रेणियों में ही देखा जाता था। अंबेडकर ने समिति के सामने यह स्पष्ट किया कि भारतीय समाज को तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है:

1.     सवर्ण (जो सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से अग्रणी थे),

2.     अनुसूचित जाति (जो छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार का शिकार थे),

3.     अन्य पिछड़ी जातियाँ (जो न तो सवर्ण थी और न ही अनुसूचित जाति, लेकिन शिक्षा, रोजगार और सामाजिक स्थिति में पिछड़ी हुई थी)।

यही “ओबीसी” की वैचारिक नींव थी।

 

संविधान सभा और अनुच्छेद 340:

          भारत के संविधान-निर्माण के दौरान अंबेडकर संविधान सभा की मसौदा समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष थे। यह वही मंच था जहाँ उन्होंने पिछड़ी जातियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए जोरदार पैरवी की।

संविधान में अनुच्छेद 340 जोड़ा गया। यह अनुच्छेद सरकार को यह अधिकार देता है कि वह “सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों” की पहचान करने और उनके लिए आयोग गठित करने का काम कर सके।

यही अनुच्छेद भविष्य में दो ऐतिहासिक आयोगों की नींव बना:

·        काका कालेलकर आयोग (1953) – पहला ओबीसी आयोग।

·        मंडल आयोग (1979) – जिसने विस्तृत सर्वेक्षण के बाद 27% आरक्षण की सिफारिश की।

अगर अंबेडकर अनुच्छेद 340 को संविधान में न जोड़ते, तो शायद ओबीसी अधिकारों का रास्ता ही बंद हो जाता।

अनुच्छेद 15(4) और 16(4): शिक्षा और रोजगार में आरक्षण:

          संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 मूलतः समान अवसर और गैर-भेदभाव के सिद्धांत को स्थापित करते हैं। लेकिन अंबेडकर ने इसमें विशेष प्रावधान जोड़े –

·        अनुच्छेद 15(4): शिक्षा संस्थानों में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था।

·        अनुच्छेद 16(4): सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान।

इन प्रावधानों के बिना ओबीसी समाज शिक्षा और रोजगार के अवसरों में बराबरी की लड़ाई नहीं लड़ पाता।

 

अंबेडकर का त्याग: ओबीसी के लिए मंत्री पद छोड़ना:

          1947 में अंबेडकर भारत के पहले कानून मंत्री बने। लेकिन उनकी दृष्टि केवल पद की शोभा तक सीमित नहीं थी। वे चाहते थे कि सरकार अनुच्छेद 340 के आधार पर तुरंत ओबीसी आयोग बनाए। जब सरकार ने इसे टालना शुरू किया, तो अंबेडकर बेहद व्यथित हुए। उन्होंने महसूस किया कि सत्ता राजनीतिक समीकरणों के दबाव में ओबीसी अधिकारों को पीछे धकेल रही है। और तब उन्होंने एक ऐतिहासिक कदम उठाया – अपने कैबिनेट मंत्री पद से इस्तीफा

यह घटना भारतीय राजनीति के इतिहास में अनूठी है। एक दलित पृष्ठभूमि का नेता, सत्ता की ऊँचाइयों पर बैठा हुआ, अपने पद की परवाह किए बिना, ओबीसी समाज के अधिकारों के लिए त्याग कर देता है। यह प्रमाण है कि अंबेडकर केवल दलितों के ही नहीं, बल्कि पूरे पिछड़े समाज के संरक्षक थे।

 

राजनीति की साज़िश: अंबेडकर को “केवल दलित नेता” क्यों बनाया गया?

          यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। अगर अंबेडकर ने ओबीसी की अवधारणा दी, संविधान में प्रावधान रखे और उनके लिए मंत्री पद छोड़ा, तो क्यों आज उन्हें केवल दलित नेता तक सीमित कर दिया गया?

इसका जवाब है – सामाजिक-राजनीतिक साज़िश

          दलित और ओबीसी मिलकर भारत की आबादी का बहुमत हैं। अगर ये दोनों समूह एकजुट हो जाते, तो राजनीतिक समीकरण हमेशा के लिए बदल जाते। इसलिए सत्ता ने सुनियोजित ढंग से अंबेडकर की छवि को केवल “दलितों के मसीहा” तक सीमित कर दिया। ओबीसी समाज को यह सच्चाई बताई ही नहीं गई कि उनके संवैधानिक अधिकारों के पीछे अंबेडकर की निर्णायक भूमिका थी।

 

मंडल आयोग और अंबेडकर की दूरदृष्टि:

          1979 में जब मंडल आयोग का गठन हुआ और बाद में 1990 में उसकी सिफारिशें लागू हुईं, तब पूरे देश में व्यापक आंदोलन हुआ। लेकिन बहुत कम लोगों ने यह याद किया कि मंडल आयोग का आधार संविधान का अनुच्छेद 340 था – वही अनुच्छेद जो अंबेडकर ने डाला था।

दूसरे शब्दों में, मंडल आयोग की सफलता दरअसल अंबेडकर की दूरदृष्टि का परिणाम थी।

 

आलोचना और गलतफहमियां:                                                                    

        कुछ आलोचक कहते हैं कि अंबेडकर ने “जातिवाद को संस्थागत रूप दिया”। लेकिन यह आरोप अधूरा है। अंबेडकर का उद्देश्य जाति व्यवस्था को तोड़ना था। आरक्षण और विशेष प्रावधान उनके लिए “अस्थायी साधन” थे ताकि सदियों से शोषित समाज बराबरी पर खड़ा हो सके। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “आरक्षण स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में अस्थायी उपाय है।”

 

वर्तमान की प्रासंगिकता:

          आज भी भारत की राजनीति में दलित और ओबीसी का सवाल सबसे बड़ा है। सत्ता में हिस्सेदारी, शिक्षा में अवसर, नौकरियों में प्रतिनिधित्व – ये प्रश्न अभी भी पूरी तरह सुलझे नहीं हैं। ऐसे समय में अंबेडकर की यह सच्चाई और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे केवल दलितों के नहीं, बल्कि ओबीसी के भी संवैधानिक शिल्पकार थे।

        सारांशत: जब भी कोई कहे कि अंबेडकर केवल दलितों के नेता थे, तो उन्हें यह तथ्य बताइए:

·        “ओबीसी” शब्द का प्रयोग सबसे पहले अंबेडकर ने किया।

·        अनुच्छेद 340 के जरिए उन्होंने ओबीसी आयोग का रास्ता खोला।

·        अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के जरिए शिक्षा और रोजगार में आरक्षण सुनिश्चित किया।

·        और सबसे बड़ी बात – उन्होंने ओबीसी अधिकारों के लिए अपने मंत्री पद का त्याग किया।

          इसलिए, डॉ. भीमराव अंबेडकर दलितों के मसीहा तो थे ही, लेकिन उससे कहीं आगे बढ़कर वे ओबीसी और समग्र समाज के भी संवैधानिक पिता और सबसे बड़े संरक्षक थे। अब समय आ गया है कि इस सच्चाई को दबाया न जाए। दलित और ओबीसी समाज को यह जानना चाहिए कि उनके अधिकारों की जड़ें एक ही व्यक्ति के संघर्ष में निहित हैं – डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर।

Ramswaroop Mantri

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