अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*डॉक्टर लोहिया का राजनीतिक कर्म प्रभावी. जुझारू और अकेले चलने की ताकत से भरा पूरा*

Share

*रामस्वरूप मंत्री*

महापुरूषों की स्मृति और मूल्यांकन से ही कोई समाज ऊर्जा ग्रहण कर निखर सकता है.  हालांकि मौजूदा उपभोक्तावादी दौर में इन चीजों के प्रति अनास्था है. ऐसी परिस्थिति में डॉक्टर राममनोहर लोहिया के शब्दों में कहें तो ‘निराशा के कर्त्तव्य’ ही इस राष्ट्रीय-समाज को नयी राह दिखा सकते हैं।गांधी जी के बाद डॉक्टर राममनोहर लोहिया ही सबसे प्रखर विचारक चिंतक लगते हैं.जो अपनी धरती, मिट्टी, उसकी सुगंध से जुड़े हुए है। आज जब देश विभिन्न समस्याओं से जूझ रहा है तब डॉक्टर लोहिया ही ऐसे विचारक चिंतक हैं जिन की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है तथा भविष्य में भी उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी । लोहिया ने भी गैर कांग्रेसवाद की कल्पना को 1967 में मूर्त रूप में कामयाब तो देखा, पर जीवन की सांध्य बेला में निराश और हताश हो गए ।

डा.राम मनोहर लोहिया अक्सर कहा करते थे कि ‘सत्ता सदैव जड़ता की ओर बढ़ती है और निरंतर निहित स्वार्थों और भ्रष्टाचारों को पनपाती है. विदेशी सत्ता भी यही करती है. अंतर केवल इतना है कि वह विदेशी होती है, इसलिए उसके शोषण के तरीके अलग होते हैं. किंतु जहां तक चरित्र का सवाल है, चाहे विदेशी शासन हो या देशी शासन, दोनों की प्रवृत्ति भ्रष्टाचार को विकसित करने में व्यक्त होती है’. उन्होंने कहा था कि ‘देशी शासन को निरंतर जागरुक और चौकस बनाना है तो प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों को समझे और जहां कहीं भी उस पर चोट होती हो, या हमले होते हों उसके विरुद्ध अपनी आवाज उठाए।

 डा. लोहिया की कही बातें वर्तमान भारतीय शासन व्यवस्था पर सटीक बैठती हैं. आज देश में गैर-बराबरी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण, जातिवाद, क्षेत्रवाद और आतंकवाद जैसी समस्याएं गहरायी हैं और शासन सत्ता अपने लक्ष्य से भटका हुआ है तो इसके लिए सरकार की नीतियां और भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था ही जिम्मेदार है।

 नैतिक और राष्ट्रशील मूल्यों में व्यापक गिरावट के कारण अमीरी‌ गरीबी की खाई चौड़ी होती जा रही है. सरकारें बुनियादी कसौटी पर विफल हैं और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से निपटने में नाकाम हैं. नागरिक समाज के प्रति रवैया संवेदहीन है. 

सांप्रदायिकता, हिंदू-मुसलमान एकता, भारत-पाक महासंघ जैसे विचारों के बाद भी सांप्रदायिकता की आंच से सारा देशसमाज झुलस रहा है. उनके ऐसे मौलिक विचारों में ताकत तो है, पर उनके अनुयायी संगठन ने इसे नहीं बढ़ाया.मोटे तौर पर ये कुछ मौलिक अवधारणाएं हैं. यहीं वे नीतियां भी हैं, जिनके संदर्भ में लोहिया ने कहा था कि ‘उनके आदर्शों को मान कर चलने वाली पार्टी भले ही खत्म हो जाए, उनकी नीतियां खत्म नहीं होगी.’  ‘आज नहीं तो कल कोई पार्टी खड़ी होगी और इन्हीं नीतियां के ईद गिर्द मुल्क को आगे ले जायेगी.’ क्योंकि दूसरा कोई पथ नहीं हैं. आज यह पथ न केवल सुनसान है, बल्कि जोखिम भरा भी. इस पर चलने से लोग डर रहे हैं, पर पथ कहीं हैं, तो पथिक आयेंगे ही। लोहिया महज नेहरू खानदान के आलोचक, गैर कांग्रेसवाद के जनक या कुछ विवादास्पद नीतियों के प्रतिपादक नहीं थे.. नवजागरण की पश्चिमी चकाचौंध पीड़ित भारतीय धारा के खिलाफ देशज समाजवाद व्यवस्था का एक अस्पष्ट खाका उन्होंने दिया ।

 ‘निराशा के कर्तव्य’ और 300- 400 बरसों तक पिटनेवाली पार्टी की कल्पना उन्होंने की  साम्यवाद की विफलता और पूंजीवादी व्यवस्था की आतंरिक रूग्णता के बाद आज लोहिया की प्रासंगिकता ब़ढी है।

 उनकी दृष्टि में समाजवादी आंदोलन आर्थिक राजनीतिक परिवर्तनों से अधिक एक नयी संस्कृति पैदा करने का आंदोलन रहा है. समता, आजादी, बंधुत्व पर आधारित.डॉक्टर लोहिया का राजनीतिक रूप निश्चित रूप से प्रभावी. जुझारू और अकेले चलने की ताकत से भरा पूरा था. अनोखा और साहसपूर्ण वह दौर तो ऐसा रहा कि शब्दिक अर्थों में अकेले ही दर्शकों तक चट्टान की तरह निर्विकार भाव से वह राजसत्ता से जूझते रहे।

विलक्षण ऊर्जा और ताकत के साथ, लोकसभा के अंदर और बाहर,  संवेदनशील, चिंतक, विचारक और भारतीय संस्कृति के व्याख्याता के रूप में उनके व्यक्तित्व का सम्यक मूल्यांकन नहीं हुआ. भारत के तीर्थ, भारत की नदियां, इतिहासचक्र, हिमालय, भारत की संस्कृति, भाषा, भारतीय जनकी एकता, भारत का इतिहास लेखन और विश्व एकता के सपने पर उन्होंने मौलिक और अनूठे ढंग से विचार किये।

डॉ लोहिया के अनुसार इतिहास में जाति और वर्गों में संघर्ष होता रहता है। इसी से इतिहास को गति मिलती है। जातियों का रूप सुनिश्चित होता है किन्तु वर्गों की आन्तरिक रचना शिथिल होती हैं। इन दोनों के बीच घड़ी के पेन्डुलम के समान आन्तरिक क्रियाएं होती रहती है। इन्ही से इतिहास को गति मिलती है। डॉ. लोहिया के अनुसार जातियों में सामान्यतः गतिहीनता और निष्क्रियता पाई जाती है। जब कि वर्ग सामाजिक गतिशीलता की प्रचण्ड शक्तियों के प्रतिनिधि होते हैं। वर्ग संगठित होकर जातियों का रूप धारण कर लेते है। और जातियों वर्गों में परिणत हो जाती है। मानव जाति का अब तक का इतिहास जातियों ओर वर्गों के बीच आंतरिक संघर्षो का इतिहास है। परम्परागत तरीके से सोचने पर रोटी की समस्या के समाधान हेतु हमें पूंजीवादी अथवा साम्यवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना ही अनिवार्य दिखाई देने लगती है किन्तु वोनों की अर्थव्यवस्था एक जैसी ही है। दोनों में अंतर केवल इतना है कि पूंजीवाद यदि निजी सम्पति को प्रोत्साहन देता है तो साम्यवाद सार्वजनिक सम्पति को। पूंजी एवं सत्ता का केन्द्रीकरण दोनों में समान रूप से है। आर्थिक विक्रेन्दीकरण अन्ततः बेकारी को बढ़ा देता है।

डॉ. लोहिया मानते थे कि युरोप का मशीनी समाजवाद एशिया के देशों के लिए उपयुक्त नहीं हैं, क्योकि यहाँ गरीबी अधिक है। उनका कथन था कि परम्परागत आर्थिक विकेन्द्रीकरण से एशिया की गरीबी दूर नहीं हो सकती है। यहाँ बड़ी मशीनों के स्थान पर गांधी जी के विचारों का अनुसरण करते हुए छोटी-छोटी मशीनों का प्रयोग करना चाहिये। इस प्रकार कुटीर उद्योगों में धन भी कम लगेगा तथा बेकारी भी घटेगी। डॉ लोहिया सहकारी कृषि को प्रोत्साहित करने के पक्ष में थे। वे पाश्चात्य समाजवाद को संवैधानिक एवं विकासवादी निरूपित करतें हुए उसे एशिया के लिए अनुपयोगी मानते थे। उनके अनुसार प्रशासन का प्रजातंत्रीकरण करके कम पूंजी से लगने वाली छोटी मशीनों को लगाकर, सम्पति का समाजीकरण करके एवं आर्थिक तथा राजनीतिक समाजीकरण करके एशियाई समाजवाद के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

सत्याग्रह, सिविल नाफरमानी, घेरा डालो, दाम बांधो, सप्तक्रांति, नर नारी समता, रंगभेद, चमड़ी सौंदर्य, जाति प्रथा के खिलाफ, मानसिक गुलामी, सांस्कृतिक गुलामी, दामों की लूट, शासक वर्ग की विलासिता, खर्च पर सीमा,पन्द्रहआने बनाम 3 आने, संगठन सरकार के बीच का रिश्ता, जैसे असंख्य सवाल मुद्दे कार्यक्रम उन्होंने उठाये और लड़े पहली बार केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. धारा के खिलाफ चलने की राजनीति की परंपरा डाली और अपने निकट के लोगों को सही मुद्दे उठा कर चुनाव हारने के लिए खड़ा किया. उन्हें शानदार हार पर बधाई दी।

 ‘इस कसौटी पर उनके उत्तराधिकारियों को आप कस सकते हैं. और इसके लिए उन्होंने ‘निराशा के कर्तव्य’ निरूपित किये कहा. पिछले 1500 बरस में हिंदुस्तान की जनता ने एक बार भी किसी अंदरूनी जालिम के खिलाफ विद्रोह नहीं किया. बगावत करते हैं. कानून तोड़ते है. इमारतों वगैरह को तोड़ते हैं, या उन पर कब्जा करते हैं, जालिम को गिरफ्तार करते हैं, फांसी पर लटका देते है.’ मरने से एक माह पूर्व बिहार (गिरिडीह) में अपने अंतिम भाषण में कहा मुझे इतना धीरज है कि अपने सपनों को अपनी आंखों से सच होते न देख पाऊं और फिर भी मलाल नहीं करूं’ पर आश्वस्त कि* लोग मेरी बात सुनेंगे जरूर, पर मेरे मरने के बाद ।*

द्रौपदी को आदर्श बतानेवाले डॉ लोहिया ‘ईश्वर’ और ‘औरत’ को जीवन में सबसे महत्वपूर्ण मानते थे. गांधी के रामराज्य के स्थान पर ‘सीताराम राज’ की कल्पना की. राधा के चरित्र के नये व्याख्याकार. मीरा के सात्विक सौंदर्य-भक्ति से प्रभावित. हिंदी के नये शब्दों-मुहावरों के प्रणेता. उस दौर की पूरी की पूरी सृजनशील पी़ढी को झकझोरनेवाले ‘कल्पना’ ‘जन’ ‘मैनकाइंड’ और ‘दिनमान’ के माध्यम से हिंदी जगत को वैचारिक रूप से उद्वेलित करनेवाले लोहिया, इतिहासचक्र के रचनाकार उनका व्यक्तित्व एक बंधे-बंधाये सोचे में निरूपित नहीं किया जा सकता इसी नयी सभ्यता की आवश्यकता के संदर्भ में आज लोहिया की प्रासंगिकता गांधी के बाद सबसे अधिक है. तीसरे विकल्प की तलाश में बेचैन उनकी पूरी राजनीति और विचारयात्रा, इस नये विकल्प, नये मनुष्य, नयी व्यवस्था और नये सपने के ईद गिर्द हो रही.और इस भटकती दुनिया(सिर्फ भारत में नहीं) साम्यवाद और पूंजीवाद के विफल होने के बाद की बेचैन दुनिया को आज सबसे अधिक एक नये विकल्प, नयी सभ्यता और संस्कृति की तलाश है. और इसी कारण आज भी लोहिया बहुत प्रासंगिक है।

(*लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और समाजवादी पार्टी  की मध्यप्रदेश इकाई के महासचिव है*)*

*रामस्वरूप मंत्री* 

प्रदेश महासचिव 

समाजवादी पार्टी,मध्य प्रदेश 

9425902303

7999952909

Ramswaroop Mantri

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें