डॉ. विकास मानव
_मानव मन कितना अद्भुत और रहस्यमय है। असीम गति, असीम दिशा, असीम रूप। विश्व का कोई ऐसा स्थान नहीं, जहाँ उसकी पहुँच न हो। ऐसा कोई विषय नहीं जो उसकी परिधि में न आता हो और न ऐसा कोई समय ही है जो उसकी गति से परे हो।_
मानव मन की इन समस्त भूमिकाओं को मनोविज्ञान कहा जाता है। इसके मुख्यरूप से तीन रूप हैं--स्वाभाविक, अस्वाभाविक और परास्वाभाविक।
इनमें प्रथम दो को वैज्ञानिक अध्ययन का स्थान प्राप्त है, लेकिन परास्वाभाविक अपने मूल रूप में ही अभी तक वैज्ञानिकों के लिए माथा-पच्ची का विषय बना हुआ है और यही परामनोविज्ञान का विषय है। मनोविज्ञान जहाँ समाप्त होता है, वहीँ से परामनोविज्ञान शुरू होता है।
इस समय विश्व के सभी प्रमुख देशों में परामनोविज्ञान पर शोध और अनुसन्धान हो रहा है। रूस में सरकारी तौर पर दो सौ वैज्ञानिक इस विषय पर गवेषणा कर रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले आरटेक्ट विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय परामनोविज्ञान पर सभा बुलाई गयी थी।
भारत प्राचीन काल से इस पर विश्वास रखता रहा है। यदि यह कहा जाय कि भारतीय संस्कृति और साधना की मूल भित्ति ही एकमात्र परामनोविज्ञान है, तो अतिशयोक्ति न होगी।
इस समय परामनोविज्ञान के तीन मुख्य शोध-विषय हैं–
1–इन्द्रियातीत अनुभव (एक्स्ट्रा सेंसरी परसेप्शन),
2–मानसिक शक्ति का बाह्य प्रकाश (साइको किनेसिस) और
3– देहहीन व्यक्ति का प्रतिनिधित्व (इन्कोपोरेल पर्सनल एजेंसी)।
देहहीन व्यक्ति से मतलब है–स्थूल शरीर रहित व्यक्तित्व। स्थूल शरीर की रचना दो विपरीत मूल प्राकृतिक तत्वों के संयोग से होती है। इन दोनों तत्वों को शुक्रबिन्दु और रजोबिन्दु के नाम से जाना जाता है। शुक्रबिन्दु और रजोबिन्दु में दो अतिरिक्त भौतिक तत्व भी होते हैं जो गर्भ में शरीर रचना के साथ साथ विकसित होते हैं और वासना शरीर और सूक्ष्म शरीर की रचना करते हैं।
तीनों शरीरों की रचना जब पूरी हो जाती है तब उसमें ‘जीवात्मा’ प्रवेश करती है। मनुष्य एक साथ इन तीनों शरीरों में जीता है। तीनों शरीर एक समान होते हैं। प्राणों के माध्यम से वे तीनों एक दूसरे पर आश्रित रहते हैं।
मृत्यु के समय जीवात्मा स्थूल शरीर को तो यहीं छोड़ जाती है, किन्तु अन्य दोनों को अपने साथ ले जाती है। शरीर आत्मा का वाहक है।
स्थूल शरीर रहित व्यक्तित्व दो प्रकार का होता है--पहला वासना शरीर का और दूसरा सूक्ष्म शरीर का। वासना वेग के समाप्त होने पर जीवात्मा स्थूल शरीर की तरह वासना शरीर को भी छोड़ देती है।
_वासना शरीर को ही प्रेत शरीर कहते हैं और उसमें रहने वाली आत्मा को प्रेतात्मा कहा जाता है। प्रेतात्माओं की मति-गति पागलों जैसी होती है। उनको अँधेरे में ही शान्ति मिलती है। मरघट, कांटेदार पेड़, सुनसान खँडहर उनके प्रिय स्थान हैं। लेकिन वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकतीं।_
अपनी वासना को सन्तुष्ट करने के लिए बराबर इधर-उधर भटकती रहती हैं और जब कभी किसी जीवित व्यक्ति की वासना को अपनी वासना के अनुकूल देखती हैं तो उसके द्वारा अपनी मनमानी कर लेती हैं।
_प्रेतात्माओं को शरीर के प्रति मोह बहुत होता है। अपनी वासना के अनुरूप शरीर देखते ही वे तत्काल उसमें प्रवेश कर जाती हैं। इसी को प्रेतबाधा कहते हैं।_
*☄️चेतना विकास मिशन* : 




